'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
Saturday, May 19, 2012
Wednesday, May 9, 2012
"दया- कैलाश"-इक कहानी अपनों की !

आज हमलोग फिर इक्कठा हुए हैं-
उन बीते हुए लम्हों को पुनः याद कर जीवंत करने के लिए-जब आज से साठ बरस पहले-
"रूद्र-पार्वती"ने मिलकर इक अनूठे कन्यादान के माध्यम से,
"दया को कैलाश" के समर्पित क़र दिया था !
हाँ !हमारे परम पूज्य दादा-दादी-
स्वर्गीय श्री रूद्र प्रसाद जी वैद्य ने हमारी दादी स्वर्गिया श्रीमती पार्वती देवी के साथ-
मोहरी खानदान की इकलौती सबसे प्यारी रोशनी को-
'चि.कैलाश को सौंप दीया था !
कल्पना कीजिए....
जब देश को आज़ाद हुए मात्र पांच साल हुए थे,
संविधान और गणतंत्र की परिभाषा को गढे हुए मात्र दो वर्ष बीते थे ,
देश की कमान पंडित नेहरु के हाथों मे थी,
और......
देश प्रेम का जज्बा नस नस मे समाया हुआ था!
कैसे उस समय और दशक मे-
एक नव-युगल ने परिस्थितिओं से समझौता करते हुए-
एक देश,एक परिवार,एक समाज,एक करियर की उम्मीदों को सार्थक किया होगा?
अपने माता-पिता के सपनों को पूरा किया होगा?
और...
अपने से छोटों को दिशा दी होगी?
मै जानता हूँ कि-
अपने बुआ-फूफाजी के जीवन सफ़र पे प्रकाश डालना-
- सूरज को रोशनी दिखाने के समान होगा!
- चाँद को शीतलता का एहसास कराना होगा!
- सत्य को आइना दिखाना होगा?
यह मेरी और मेरे सभी भाईओं -बहनों की कोशिश है क्योंकी-
आदर्श हमेशा आदर्श होतें है!
स्तम्भ हमेशा स्तम्भ होतें हैं!
मेरा मतलब है-
'Idols are always idols and
Milestones are always Milestones......'
ज़िन्दगी के पन्ने पलटना आसान है-
पर.......
- उस फलसफे को बांटना मुश्किल है!
- उस अनुभव को सांझा करना मुश्किल है!
- उन लम्हों को याद करना मुश्किल है!
- उन बिछड़े अपनों को स्मृति मे लाना मुश्किल है!
- उन दोस्तों के याराने की यारी को निभाना मुश्किल है !
- अपने आंसुओं को पलकों पे न आने देना मुश्किल है!
- आंसू से भीगी पोरों को पोंछना मुश्किल है
- अपने बच्चों के लिए संबल और सहारा बनना मुश्किल है!
पर आप दोनों ने वो सब कुछ किया है जिस कारण आप आज भी हमारा संबल हैं,ताक़त है!
दिल्ली,आगरा,मेरठ,बुलंद-शहर,झाँसी,हापुड़,इलाहाबाद और हमीरपुर
और भी न जाने कहाँ कहाँ .....
महोबा,मोहरी,कुलपहाड़,मौरानीपुर,बांदा और लौंडी ....
हर जगह आपके काम,आपका नाम और आपका स्नेह और रिश्ते,
साक्षी है उस आसाधारण कर्मठता और शाश्वत स्नेह -वात्सल्य के,
जो आप दोनों ने बड़ी ही संजीदगी से निभाया !
प्रेम को पम्मू कभी कभी -बाज़ी आप ही कहती थी !
छोटे पापा को महिंद्र ;बड़े पापा को महाराज!
और दद्दा को भैया ,बाज़ी आप ही कहती थी!
और सभी भाइयों को -'भैया' कहना कोई आप से सीखे!
दिल्ली,एम्स,सिटी-मजिस्ट्रेट,प्रेम-कमला-नर्मदा..
मेरी ज़िन्दगी के कुछ ऐसे शब्द हैं जो हमेशा अपने स्वर्गीय पापा से सुने थे!
इन शब्दों मे मेरे पापा के संघर्ष की कहानी बयां होती थी पर
दो शब्द और भी थे जो उस कठिन दौर में मेरे पापाजी का संबल थे -ताक़त थे -दिलासा थे -सहारा थे ......
वो दो शब्द हैं और हमेशा रहेंगें -जीया/दीदी और जीजाजी .....
वो आप हैं -बाज़ी वो आप हैं!
वो आप हैं फूफाजी वो आप हैं !
और क्या लिखूं आप के लिए?
आप दोनों तो स्वयं इक इबारत हैं -
- इबारत सफलता की,
- इबारत इम्तिहान की,
- इबारत आदर्श की,
- इबारत अनुशासन की,
- इबारत इक सफल विवाहिक,सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की!
आप दोनों हमारी,हम सभी की धरोहर हैं,
हम सभी के 'बट-वृछ' हैं जिसकी छाया और आशीर्वाद सदा....
हम सभी को मिल रहा है और हमेशा मिलता रहेगा !
शत शत वंदन!
शत शत वंदन !
आपके चरण सेवक...
शानू,वंदना,
सव्यसांची और यश्वी
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