"वो मेरा बचपन था !
वो मेरा इलाका था!
जहां चलता था ...
सिर्फ मेरा हुकुम !
हाँ ! मैं तानाशाह था ...
अपने दौरे बचपन के ..
राजपाट का !
मैं ही नूरचश्म था और
मैं ही ..
चाँद के रथ पे सवार राजकुमार !
जरा सी ..
मौसम ने हवा क्या बदली ..
जरा सी चेहरे पे ..
झाईयां क्या आईं ..
न वो बचपन रहा न मैं ..
सरहदों का सुलतान !
बचपन तो बखूबी याद है !!
बेशरम जवानी ...
न जाने कब गुज़र गई ;
पता ही नहीं चला !
आज जब ..
शीशे में अक्स देखा तो झाईयों के साथ ..
चेहरे में दिखे ..
सैकड़ों नुक्स
और फिर याद आया ..
हक़ीक़तों का पुलिंदा ..
कि ..
बुढ़ापे ने अंगड़ाई ली है !
अब न वो ..
नूरचश्म का खिताब ..
नवाज़ने वाले ..
अपने रहे और ...
न वो दौर ए मोहब्बत !
बस ..
इक हलकी सी याद है ..
अपने बचपन की ..
जब माँ की गोद में ..
रो लेने से ..
पिताजी की ऊँगली पकड़ कर ..
मुझे जलेबी की दूकान तक ...
ले जाया जाता था !"