Tuesday, September 27, 2011

Babujee ka dard!

"कैसा जमाना आ गया है 
अपना बेटा सयाना हो गया है1

पहले बड़े आदर से पापा या बाबूजी कहता था 
और अब -
दोस्तों से मुझे डुकर या बापजी कहता है1 
चलो इतना तो है कि-
श्रवण कुमार के इंतकाल के सैकड़ो साल बाद भी 
बच्चो मे इतने तहजीब तो बरकरार है कि -
अपने बाप के आगे 'जी' लगाते है !"

-ईश्वर सभी को सदबुधी दे !शांती दे और प्रेम दे !! 

HAPPY WORLD TOURISM DAY & TRIBUTES TO SAHEED-E AZAM!

"तुम्हारे मौन का मै अर्थ क्या समझूँ ???
-कि तुम हूँ पाषण से भी दो चार डग आगे .....
अरे ;पाषण मे भी -
मिलन की चाह होती है,
अटल विश्वास होता है,
कहे कि लाज होती है,
अगर न हूँ विश्वास- तो पलट कर देख लो तिरछी निगाहों से--
आज भी ताज से मुमताज की  आवाज आती है !!" 

          'HAPPY WORLD TOURISM DAY!'
"DEEP TRIBUTE TO SAHEED-E-AZAM BHAGAT SINGH WHOSE TODAY IS BIRTH-DAY!"

Sunday, September 25, 2011

Pain of Khajuraho on World Tourism Day!

कैसे मनाऊ विश्व पर्यटन दिवस खजुराहो में  ???

"अमीरों ने बसा के आलिशान होटल इस गाँव मे,
किया है मजाक हम गरीबों के साथ l 
खाते और खिलाते हैं वी.आइ.पी थाली  और,
कहतें है हम गरीबों से कि-
परसो वेटर बन इन थालीओं को  और, 
'अतिथी- देवो- भव' की विआख्या  को चरितार्थ करो l

सच मे वेटर बन-
हम सौ-सौ बार मरते और जीते हैंl 
ये अमीर हमे देते है दिलासा  कि-
शुक्र करो कि हमने तुम्हें नौकरी देकर, 
एहसान किया है उन बुन्देल्खंडियो पे,
जो अपने आप  को बताते  है-
वीर  छत्रसाल  के   वंशज l   

काश बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण समझे हमारे दर्द को?
दे दे कोई ऐसी राहत के सौगात जहाँ,
हम लोग  भी  इज्ज़त से थाली खा सकेंl 
वर्ना -
वो दिन दूर नहीं जब 
इस महान पर्यटन दिवस पे-
हमारे अतिथी ही हमको दया कर 
थाली देंगेl

देखो ऐ बुन्देल्खंडियो तुम ये काम न करो, 
अपनी धरा का नाम बदनाम न करो,
लक्ष्मीबाई को समझो-
वीर छत्रसाल को जानो-
अपने पूर्वजो की फितरत को पहचानो?
जीवन नाम है -इज्ज़त का 
पूर्वजो का सम्मान करोl

जागो बुंदेलखंड जागो !
जय वीर छत्रसाल !
जय महारानी लक्ष्मी बाई 
जय बुंदेलखंड!
जय जय बुंदेलखंड !"

Love is not a business!

मैने  मुहब्बत की थी तेरी सूरत देख के-
तूने ठुकराया मुझे मेरा हुनर देख के !
काश ! मेरी मुहब्बत मे तुझे,मेरा हुनर दिखता?

तूने मुझे छोड़ा जब मेरा कोई नहीं  था,
मै तुझे जब अपनाऊंगा जब मेरा सब कोई होगा !  

कभी तो तुम भी  समझोगी कि-
मुहब्बत मे हुनर नहीं गहराई देखी जाती है ,
सुन्दरता के साथ पवित्रता देखी जाती है !"




Sunday, September 18, 2011

Changing faces of my Khajuraho!

हमने  बदलते  हुए खजुराहो को देखा है-
इक जंगल को शहर बनते देखा है-
इक पिछड़े गाँव को क़स्बा बनते देखा है- 
हमने अपने खजुराहो को शनै शनै सवरते देखा है,
हमने अपने खजुराहो को शनै शनै मरते देखा है, 
हमने खजुराहो को बदलते देखा है ll 

टी.एस.बर्ट को खजुराहो खोजते देखा है,
मुन्ना राजा,नाती राजा को नेतृत्तव करते देखा है, 
अपने ब्रिजेन्द्र सिंह मामाजी को मंदिरों पे बोलते देखा है, 
स्व.महाराज जी को खजुराहो बसाते देखा है,
छोटे बच्चों को गाईड बनते देखा है ,उनका संघर्ष देखा है, 
पांच सितारा होटलें बनते देखी है, 
चंदेला होटल की नीव के पत्थर देखें है, 
चार्टरड फ्लीट को उतरते देखा है, 
हमने खजुराहो को बदलते देखा है ll

हमने खजुराहो को संवरते देखा है-
रैडिसन, क्लार्क्स और चंदेला को बनते देखा है,
शिल्पग्राम और कन्दारिया को सजते देखा है,
एअरपोर्ट पे हवाई जहाज उतरते देखा है, 
साइलेंट जोन के लिए चारो दिशाओं से गेट बंद होते देखे हैं ,
टूरिस्ट पुलिस को मुस्तैद देखा है,
यहाँ की सूनी आँखों में विदेश जाने के सपने पलते देखा है,
हमने खजुराहो को संवरते देखा है ll

और अंत मे -
हमने अपने खजुराहो को शनै-शनै  धीरे-धीरे मरते  देखा है- 
खजुराहो मे सड़को को उखड़ते देखा है,
शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन का इंतज़ार करते यात्री देखें हैं, 
रोजगार के लिए पलायन करते युवाओं को देखा है, 
स्टेट बैंक मे ग्राहकों की भीड़ को देखा है, 
ख़राब ए.टी .ऍम . मशीन को देखा है, 
और अपनी मूछों को नुकीली कर बुन्देली जनता को  पांच सितारा होटलों मे चौकीदार बन "सलाम-साहिब" बोलते देखा है, 
सच म़े -
हमने अपने खजुराहो को शनै-शनै  धीरे-धीरे मरते  देखा है ll









Wednesday, September 7, 2011

Lost Moments!

"ज़िन्दगी की  फिसलती रेत पर -
जब चलते चलते-
थक जाते है पैर-
चिपक जाते है बालू के कुछ कण,
साथ में कुछ काटें भी देते है दस्तक, 
तब जीवन साथी के साथ- 
लगता है कहीं बैठ कर, 
सुकून से सुस्ता कर-
पलटें अपने  जीवन के उप्पनयास  को !

दस्तक आती है-
उन पथरीले रेगिस्तानो से-
जिसके धूल भरे अंधड़,
इस तूफ़ान मे,
पार नहीं कर सका मै!

आहट आती है-
उन अधूरी उमंगो की, 
जो पूरी नहीं हो पाई 
प्रयास के बावजूद !

याद आते है वे माँ पापा-
जिनके लिए मै शानू से शनोली था;
बेटा होते हुए भी बेटी था;
आख़ों का स्वप्न था;
स्वप्नों की हकीकत था;
बुढ़ापे की लाठी था!

याद आते हैं वे दोस्त -
जिनके साथ मैने-
दोड़ना, कूदना, हँसना, मस्ती, करना सीखा!
प्यार, वफ़ा, ज़िन्दगी, भरोसा, अफसाना, जैसे शब्दों के माइने सीखे !
और रिश्तों की परिभाषा सीखी !

और अब जब आख़ों मे झुर्रियन पड़ने लगी हैं,
बाल सफ़ेद होने लगे हैं,
गालों पे गड्डे पड़ने लगें हैं,
याद आते हैं-
फिर वो सिमटे बिछड़े हुए पल-छिन-
जो हमने माँ-पापा भाई-बहिन के साथ गुजारे थे, 
दोस्तों के साथ ख्वाब देखते हुए गुजारे थे, 
जीवन साथी के साथ भविष्य के ताने-बाने बुनते हुए बिताये थे,
और बच्चों के साथ ऊँच-नीच समझाते हुए गुजारे थे !

आओ उन स्वर्णिम पलों के लीये ,
उस ऊपर वाले को धन्यवाद दें-
जिसकी कृपा से 
यह ज़िन्दगी गुज़री !
आओ -
जो अधूरा है, उसे पूरा करैं ;
सपनों को हकीकत बनाएँ ;
नवीन परिभाषाएँ लिखें 
और जीवन सत्य के
चरम पे पहुचें !!"