Tuesday, December 30, 2014

एक जाता हुआ साल..... कुछ....... चंद....

एक जाता हुआ साल....

कुछ बीते हुए लम्हे....
चंद बिसरे हुए पल छिन...

कुछ खट्टी मीठी यादें......
चंद सोंधी सोंधी बातें....

कुछ ज़िन्दगियों का जाना.....
चंद बिछड़ों का मिल जाना....

कुछ कड़वे कड़वे बोल....
चंद मीठी मीठी बातें...

कुछ जीवन के कटु अनुभव....
चंद जीवन के सफल अनुभव....

कुछ को उनकी मोहब्बतों का मिलना...
चंद की वफाओं का बिछड़ना और टूटना..

और..... आखिर में...

हर बनते बिगड़ते.... टूटते सम्भलते... मिलते बिछड़ते.... रोते बिलखते.... समय के पलों के साथ....
अपने भगवान पर अगाध विश्वास....

जाते हुए पलों को सलाम -दिल से.....
आने वाले पलों का स्वागत -दिल से...

गौरव!

Monday, December 29, 2014

सबक!

बाप पतंग उड़ा रहा था  बेटा ध्यान से देख रहा था

थोड़ी देर बाद बेटा बोला पापा ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है इसे तोड़ दो

बाप ने धागा तोड़ दिया

पतंग थोडा सा और ऊपर गई और उसके बाद निचे आ गई

तब बाप ने बेटे को समझाया

बेटा जिंदगी में हम जिस उचाई पर है,
     हमें अक्सर लगता है ,
       की कई चीजे हमें
          और ऊपर
           जाने से 
         रोक रही है,
जैसे
            घर,
          परिवार,
        अनुशासन,
           दोस्ती,

और हम उनसे आजाद होना चाहते है,
मगर यही चीज होती है
जो हमें उस उचाई पर बना के रखती है.

उन चीजो के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे
मगर
बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो पतंग का हुआ.

इसलिए जिंदगी में कभी भी
          अनुशासन का,
           घर का ,
           परिवार का,
           दोस्तों का,
     रिश्ता कभी मत तोड़ना..�� अगर आप सहमत हो तो औरों को भी बताऐं । ����

Wednesday, December 24, 2014

अटल बिहारी वाजपेयी!

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ|

-अटलबिहारी वाजपेेई

Monday, December 22, 2014

बदलता शहर!

कुछ अजीब सा माहौल हो चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है....

ढूंढता हु उन परिंदों को,
जो बैठते थे कभी छज्ज़ो पर मेरे,
शोर शराबे से आशियाँना अब उनका भी उजड़ चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है.....

होती थी इमाम बाडे से
कभी तांगे की सवारी,
मंज़िल तो वही है
मुसाफिर अब आई बस में
चढ़ चला है
मेरा शहर अब बदल चला है...

भुट्टे, कबीट, ककड़ी, इमली
खाते थे कभी हम स्कूल कॉलेजो के प्रांगण में,
अब तो बस मैकडोनाल्ड, पिज़्जाहट और
कैफ़े कॉफ़ी डे का दौर चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो स्टारलिट, बेम्बिनो,
एलोरा के दीवाने थे आप हम,
अब आइनॉक्स, बिग सिनेमा,
और पीवीआर का शोर चला है
मेरा शहर अब बदल चला हैै....

कभी कभी रुक कर
किसी चौराहे पर बतिया
लेते थे दो दोस्त घंटो,
अब तो बस शादी, पार्टी या
उठावने पर मिलने का ही दौर
चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो टेलीफोन का काला चोगा उठाकर खेर खबर
पूछ लेते थे,
अब तो स्मार्टफोन से फेसबुक, व्हाटसऐप और
ट्वीटर का रोग चला है
मेरा शहर अब बदल चला है.....

वो नेहरूपार्क और
शिवाजी वाटिका में
सेव परमल का जायका,
अब तो सेन्डविच, पिज़्ज़ा, बर्गर और पॉपकॉर्न की और चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो साइकिल पर बैठकर
दूर की डबल सवारी,
कभी होती उसकी, कभी
हमारी बारी,
अब तो बस फर्राटेदार
बाइक का फैशन चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

जाते थे कभी ट्यूशन
पढ़ने माट साब के वहाँ,
बैठ जाते थे फटी दरी पर भी
पाँव पसार,
अब तो बस कोचिंग क्लासेस
का धंधा चल पड़ा है,
मेरा शहर अब बदल चला है.....

खों-खों, सितोलिया, क्रिकेट, गुल्लिडंडा, डिब्बाडाउन
खेलते थे गलियो और
मोहल्लों में कभी,
अब तो न वो गलियाँ रही
न मोहल्ले न वो खेल,
सिर्फ और सिर्फ कंप्यूटर गेम्स का दौर चला है,
मेरा शहर अब बदल चला हैं.....

सुनते थे खालिस संगीत
कभी कभी सांघी के मुक्त आकाश तले रात भर,
अब तो पब, और डीजे का रोग   चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है....

कॉलेज की लड़कियो से
आँख मिलाना तो दूर,
बात करना भी एक कला थी
अब तो हाय ड्यूड, हाय बेब्स का रिवाज़ चल पड़ा है
मेरा शहर अब बदल चला है....

साइकिल घर में एकाद ही
होती थी और था
बाबुजी के पास स्कूटर,
अब तो हर घर में कारो और बाइक का काफिला चला हैै
मेरा शहर अब बदल चला है....

खाते थे फ़क्त समोसे,
कचोरी, जलेबी, गराडू,
मालपुए सराफे में,
अब वहाँ भी चाउमिन, नुडल्स, मन्चूरियन का स्वाद चला हैं
मेरा शहर अब बदल चला है....

सहेज लो पुरानी यादो
को धरोहर की तरह मुट्ठी में यारो
कि मेरा शहर अब बदल चला हैैं....

Monday, December 15, 2014

हकीकत ज़िन्दगी की!

नंगे पाव चलता इन्सान को लगता है
.
कि "चप्पल होते तो कितना अच्छा होता"
.
बाद मेँ,
"साइकिल होती तो कितना अच्छा होता"
.
उसके बाद,
"मोपेड होता तो थकान नही लगती"
.
बद मेँ सोचता है
"मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँ
रास्ता कट जाता"
.
फिर ऐसा लगता है,
"कार होती तो धुप नही लगती"
.
फिर लगता है कि,
"हवाई जहाज होती तो इन ट्राफिक कि जंजट
नही होती"
.
जब हवाई जहाज मेँ बेठकर नीचे हरे-भरे घास के
मैदान
देखता है तो सोचता है,
कि "नंगे पाव घास मेँ चलता तो दिल
को कितनी तसल्ली मिलती"
.
.
""जरुरत के मुताबिक जिंदगी जिओ - ख्वाहिशों के
मुताबिक नहीं।
.
क्योंकि जरुरत
तो फकीरों की भी पूरी हो जाती है;
और
ख्वाहिशें
बादशाहों की भी अधूरी रह
जाती है""

Friday, December 12, 2014

मेरे पापा!

जब मम्मी डाँट रहीं थी तो कोई
चुपके से हँसा रहा था, वो थे पापा. . .
.
जब मैं सो रही थी तब कोई
चुपके से सिर पर हाथ
फिरा रहा था , वो थे पापा. . .
.
जब मैं सुबह उठी तो कोई बहुत
थक कर भी
काम पर जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
खुद कड़ी धूप में रह कर
कोई मुझे
एसी में सुला रहा था , वो थे पापा. . .
.
सपने तो मेरे थे पर उन्हें
पूरा करने का रास्ता कोई और
बताऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
मैं तो सिर्फ अपनी खुशियों में हँसती हूँ
पर मेरी हँसी देखकर कोई अपने
गम भुलाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
फल खाने की
ज्यादा जरूरत तो उन्हें है पर कोई मुझे
सेब खिलाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
खुश तो मुझे होना चाहिऐ कि
वो मुझे मिले , पर मेरे जन्म लेने की खुशी कोई और
मनाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
ये दुनिया पैसों से चलती है पर
कोई सिर्फ मेरे लिऐ
पैसे कमाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
घर में सब अपना प्यार दिखाते हैं पर
कोई बिना दिखाऐ भी इतना ‪#‎प्यार‬ किऐ
जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
पेड़ तो अपना फल खा नही सकते
इसलिऐ हमें देते हैं...पर कोई अपना पेट
खाली रखकर भी
मेरा पेट भरे जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
‪#‎विदा‬ तो मैं हो रही थी पर मुझसे भी
अधिक आंसू कोई और
बहाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
मैं अपनी "‪बेटी‬" शब्द को
सार्थक बना सकती या नही...
पर कोई बिना स्वार्थ के
अपने "‎पिता‬" शब्द को सार्थक
बनाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .!! एक लाइक  अपने पापा जी के लिये बनता है

Feelings and Friendship!

एक बहुत ही सुंदर कविता;

एक काम करना,थोड़ी सी मिट्टी लेना,
उससे दो प्यारे से दोस्त बनाना।

इक तुझ जैसा....एक मुझ जैसा....
फिर उनको तुम तोड़ देना।

फिर उनसे दोबारा दो दोस्त बनाना,
इक तुझ जैसा...एक मुझ जैसा...

ताकि तुझ में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ
और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ।

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा......

Sunday, December 7, 2014

बाबूजी क्षितिज की ओर .......

बाबूजी  क्षितिज की ओर  .......

इस शरणागत की उम्र में  …
एक और ज़िम्मेवारी माथे पर   …

पार्षद बन लवकुशनगर को नया रास्ता दिखाना  ....
नेतृत्व दे कर युवा पीढ़ी को " कर्मवीर" बनने का सन्देश देना   ……

आभार  जिन्होंने बाबूजी  माथे लगाया   …।
आभार उनको जिन्होंने लवकुशनगर के बुजुर्ग के स्पंदन को समझा   …
आभार उनका जिन्होंने  रिश्तों की परिभाषा को समझा   ……
आभार जनता का   ……
और
आभार उस ऊपर वाले भगवान और ख्वाजा का
जिसने
आशीर्वाद  दिया जीत का। 

Thursday, December 4, 2014

अम्मा!

मां को समर्पित एक कविता

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा
दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा
इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा
जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा
बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा
बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा
बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा
सभी साड़ियाँ छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा
अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा
घर में चूल्हे मत बाँटो रे
देती रही दुहाई अम्मा
बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा
रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा
लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा
बेटी की ससुराल रहे खुश
सब ज़ेवर दे आई अम्मा
अम्मा से घर, घर लगता है
घर में घुली, समाई अम्मा
बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई अम्मा
दर्द बड़ा हो या छोटा हो
याद हमेशा आई अम्मा
घर के शगुन सभी अम्मा से,
है घर की शहनाई अम्मा
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई अम्मा

Tuesday, December 2, 2014

शाकाहार!

गर्व था भारत-भूमि को
कि महावीर की माता हूँ।।

राम-कृष्ण और नानक जैसे
वीरो की यशगाथा हूँ॥

कंद-मूल खाने वालों से
मांसाहारी डरते थे।।

पोरस जैसे शूर-वीर को
नमन 'सिकंदर' करते थे॥

चौदह वर्षों तक वन में
जिसका धाम था।।

मन-मन्दिर में बसने
वाला शाकाहारी राम था।।

चाहते तो खा सकते थे
वो मांस पशु के ढेरो में।।

लेकिन उनको प्यार मिला
' शबरी' के झूठे बेरो में॥

चक्र सुदर्शन धारी थे
गोवर्धन पर भारी थे॥

मुरली से वश करने वाले
'गिरधर' शाकाहारी थे॥

पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम
चोटी पर फहराया था।।

निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥

सपने जिसने देखे थे
मानवता के विस्तार के।।

नानक जैसे महा-संत थे
वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर
देखो गौरवमयी इतिहास को।।

आदम से गाँधी तक फैले
इस नीले आकाश को॥

दया की आँखे खोल देख लो
पशु के करुण क्रंदन को।।

इंसानों का जिस्म बना है
शाकाहारी भोजन को॥

अंग लाश के खा जाए
क्या फ़िर भी वो इंसान है?

पेट तुम्हारा मुर्दाघर है
या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं
जब उंगली अपनी जलती है।।

सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥

बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नही।।

जीते जी तन काटा जाए,
उस पीडा का पार नही॥

खाने से पहले बिरयानी,
चीख जीव की सुन लेते।।

करुणा के वश होकर तुम भी शाकाहार को चुन लेते॥

शाकाहारी बनो...!