Saturday, September 26, 2015

बीतते हुए लम्हें!

"जवानियाँ बीतती गई...
नसें सिमटती गई.....
झुर्रियां लिपटती गई....
सलवटें पड़तीं गई.....
कराहटें कचोटती गई...
और
उम्र ढलती गई.... "

"हर रोज़ देख लेता हूँ....
बाँध कर कोने में पटक दी गई...
हसरतों की पोटली..
ढलती उम्र में... अक्सर
डूबता सूरज अच्छा लगने लगता है! "

Wednesday, September 23, 2015

Honesty!

"जीवाश्म कुछ ही बचे हैं -
ईमानदारी के...
खुद्दारी के...
और जवाबदारी के...

इनको सहेज कर रख लो साहिब...
सैकड़ों सालों बाद...
जब फिर रचना करोगे नवमानवता की...
तो यह काम आएंगे!"

Thursday, September 17, 2015

तुम और तुम्हारी रातें


तुम और तुम्हारी रातें !

बयाबान,घटाटोप,अँधेरी  रातें ...
नरगिसी,महकती,चांदनी रातें....

बोझिल,भारी,उमस भरी रातें....
तड़पती,सुलगती,बहकती रातें. ...

लजाती,शर्माती,सिमटती मुंदती रातें..

बिछड्ती,खिसकती सिसकती,पिघलती
रातें....

अकेली,रोती,तड़पती करवटें बदलती रातें.....

आज भी...
सिर्फ तुम और तुम्हारी यादें ! "

"रातें गुजरतीं गईं...
रातें कटती गई...
रातें फिसलती गई...
और
तुम बिछड्ती गईं!

(शानू!)

Tuesday, September 15, 2015

इस वर्ष समूचे बुंदेलखंड में पानी न बरसने का प्रमुख कारण -ग्रेनाइट!

 "चलो दिल्ली... अपने-
   'नमो' को दुखड़ा सुनाएंगे इन पत्थरों से निकलते आंसूं दिखाएंगे! "

[नीचे दिया गया आलेख पूर्णतः व्यक्तिगत विचार हैं ; जिनका उद्देश्य परम आदरणीय मीडिया और  जागरूक युवाओं को  ज्ञात करवाना है की -उनसे ... उनकी सरजमीं कुछ मांगती है और वे चैतन्य अवस्था में रहें... बहुत कुछ अच्छा और बुरा हो रहा है ;यहाँ -लवकुशनगर में ; जिसका खामयाजा आगे आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी!]

 आलेख /विचार                                            
 (नहीं किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप!) 

लवकुशनगर के आसपास कुछ खनन कंपनियां पैदा हो गई हैं जो चंद सालों में ही करोड़ों के टर्नओवर पर पहुँच गईं हैं!
इस क्षेत्र में ग्रेनाइट कारोबार जबरदस्त तरीके से फलफूल रहा है और हम मूल वासी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं!
इन कंपनियों ने कौन से जनहित के कार्य स्वयं करवाये? यह जांच का विषय है?

सिर्फ एक विषय -"वृक्षारोपण" पर  चर्चा हो जाये तो इन सम्मानीय ग्रेनाइट मालिकों को साबित करना पड़ेगा की कटहरा और आसपास में जितनी जल जंगल और जमीन उपयोग की गई है... क्या हकीकत में
इन्होने -वृक्षारोपण कर और पूरे पेड़ उगा कर- अपना राज्य शासन और नियमों के तहत किये गए  वादे या कर्तव्य  निभाया है?

सनद रहे की -लवकुशनगर के आसपास इस वर्ष पानी न बरसने का प्रमुख कारण -ग्रेनाइट
उद्योग द्वारा हो रहा जल  जंगल और जमीन के साथ तय शुदा मापदंडों से ऊपर  जा कर प्रकृति के  साथ खिलवाड़/दोहन भी है!
कटहरा से लवकुशनगर तक की सड़क तोड़ें यह और बनवाएं राज्य शासन और कष्ट भुगते आम जनमानस- क्यों?
क्या नवीन सी-सी रोड  जो लवकुशनगर में करोड़ों की लागत से बना है ;उसमें इन बीस चक्का  लोडेड ठेलों के चलने /निकलने की पात्रता है?
क्या जो रॉयल्टी यह शासन को देते हैं ; क्या उसमें-
हमारी सड़क तोड़ने का टैक्स, 
गाँव में धुल उड़ाने का टैक्स, 
ट्रैफिक जाम करने का टैक्स और
गौऊ माता कुचलने का टैक्स समाहित है?

बहुत हो गया भर्रा ;अब जागो  लवकुशनगर के सीधे-सादे भोले भाले रहवासी!
जब निकटवर्ती रेलवे स्टेशन डुमरा है ; तो कटहरा और अन्य खदानों का माल /पत्थर डुमरा से
क्यों न जाये और लवकुशनगर से ठेले क्यों गुजरें?
कटहरा से निकटवर्ती रेलवे स्टेशन अथवा गुजरात पोर्ट ले जाने हेतु लवकुशनगर की बीच बस्ती से यह बीस चक्का वायुदूत ठेले -बेख़ौफ़ धड़ल्ले से निकलते हैं! क्यों? और कैसे?
क्या हमारी नगर पंचायत इन "बड़े भगवानों" पर कोई -लवकुशनगर की सडकों से गुजरने का टैक्स लगाने का प्रस्ताव नहीं ला  सकती ;जिससे कसबे का भी भला हो और इस सडकतोड़ व्यापार पर कुछ तो लगाम लगे!
मित्रो! यह कंपनी वाले इतने निष्ठुर हैं की -हम गरीबों के लिए ३० टन पास सड़क पर यह ७० टन के ठेले दिन हो या रात... निकालते हैं और एक नहीं.... तीन और चार वो भी एक साथ! फिर चाहे जननी हो या एम्बुलेंस.... इन्हें कोई मतलब नहीं... रोड पर डिलवरी करवाओ या मरो.... कोई मतलब नहीं!

जागो  सम्मानीय भाइयो बहनो... जागो!
चलो शिकायत करें माननीय कलेकटर महोदय से और दुखड़ा रोएँ उनसे जो हमारे जनप्रतिनिधि है!

"लपट उठी है -मोदी की!
"न खाऊंगा और न खाने दूंगा! "
आओ अमल करें माननीय प्रधानमंत्री जी के सद्वाक्य पर!
और 
बदलें लवकुशनगर की सोच को!
[दिल आहत हो तो माफ़ करें... 
दिल उद्देलित हो तो -जुट जाएँ कुछ अनूठा इस धरती के लिए करने को... जिससे जब कभी हम अकेले में -अपनेआप से बात करें -मन वचन कर्म से -तो नाज़ हो हमें -अपने आप से! ]

धन्यवाद! 
 (bundelidhamaka.blogspot.in)

Sunday, September 13, 2015

रेत पर रोक ग्रेनाइट बेरोकटोक! बारूद के ढेर पर बैठा है बुंदेलखंड!

बुंदेली धमाका! (bundelidhamaka.blogspot.com)

करोड़ों नहीं... अरबों रूपए के ग्रेनाईट पत्थर का उत्खनन और निर्यात लवकुशनगर अनुविभाग के अंतर्गत प्रतिवर्ष होता है!
पहाड़ों से पत्थर निकाल कर पत्थर के सौदागर  कर रहे है जबरदस्त खिलवाड़ छत्तरपुर जिले के प्राकृतिक सम्पदाओ,  जीव प्रौद्यिगिकी एवं वानस्पतिक संतुलन के साथ!
हम छतरपुरिया; व्यस्त हैं -रेत की अवैध ट्रेक्टर ट्राली पकड़वाने में या रेत के कारोबारी बन कुछ कमाने में..
और
वहीँ ग्रेनाइट पत्थर को खुलेआम बीस बीस चक्का ट्रकों में भर कर कल के "आम आदमी" आज के "बड़े सौदागर" बन गए!
हम गरीब बेरोजगार छत्तरपुरिया इसी बात पर खुश हैं की -हमारी कटहरा में नौकरी लग गई!
हम कब जागेंगे की -तीस टन पास सड़क पर सत्तर टन का ग्रेनाइट से "लोडेड" ठेला बिना किसी रुकावट के कैसे निकल जाता है?
जब NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने रेत के दोहन पर बुंदेलखंड में रोक लगाई है -की इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है तो फिर ग्रेनाइट पहाड़ों से निकालने पर -क्या पर्यावरण सुधर रहा है?
हम नदी से बालू निकालें तो धरती का नुक्सान और वे पहाड़ों से पत्थर निकालें तो धरती का फायदा?
याद करो दोस्तों! अंग्रेजों ने हमें नौकरियां दीं पर हमारा कोहिनूर लन्दन ले गए... वैसे ही.. हमारा ग्रेनाइट पत्थर बाहर ले जाया जा रहा है!
जरूरत है.. जागने की और जगाने की!
छतरपुर जिले में -ग्रेनाइट  और क्रेशर संचालन में  -प्रतिवर्ष कितना बारूद पहाड़ों को काटने और तोड़ने में उपयोग किया जाता है?
बारूद का प्रकार?
बारूद के लाइसेंस का प्रकार?
साइट पर बारूद रखने के सुरक्षा इंतज़ाम?
क्या पहाड़ों को काटने में और चट्टानों को उड़ाने में -डाइनामाइट, जिलेटिन जैसे विस्फोटकों का उपयोग किया जाता है?
कोन है इन विस्फोटकों का थोक विक्रेता?
कैसे पहुँचता है यह विस्फोटक -पत्थर खदानों पर?
किस वाहन से, कितनी सुरक्षा से और राह पे पड़ने वाले थानों को क्या सूचित किया जाता है?
यह विस्फोटक लवकुशनगर अनुविभाग में कहाँ से लाये जाते हैं और कहीं खजुराहो जैसे संवेदनशील विश्व धरोहर मार्ग से अथवा एयरपोर्ट मार्ग से अथवा विदेशियों के भ्रमण के दौरान तो नहीं लाये जाते?
मध्य प्रदेश के झाबुआ में हुई दुर्घटना से जागना होगा छतरपुर को! क्यूंकि माइनिंग से अछूता नहीं है हमारा छतरपुर!
दुर्घटना से सुरक्षा बड़ी!
बहुत हो चूका शोषण!
चलो अब कोर्ट चलते हैं और माननीय न्यायालय से गुहार लगाते हैं की...
रेत की तरह ग्रेनाइट ढुलाई पर भी रोक लगे!
काश कोई नेता जनहित में कहता की -
"रेत नहीं तो पत्थर भी नहीं! "


Saturday, September 12, 2015

बिहार और विहार … (यात्रा बुद्धतत्व की !)

"इक पकी हुई सफ़ेद दाढ़ी वाले से... 
कितना परेशान है -महा+गठ+बंधन...

कितने ख़ौफ़ज़दा हैं यह दोनों.. इक 'अदने' से चाय वाले से!

ऐसा लगता है की कहीं चाय की दूकान -
पूर्वी भारत में भी न खुल जाए..
.
वो आज भी सिपहसालार हैं;
मगर 'डर' उनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है!
ऐसा लगता है की चमकती आँखों में -मोतियाबिंद उत्तर आया है....

वहीँ -
लगभग 'रिटायर' हो चुके -पुराने मुखिया तो  .... 
दहशत में रिश्तेदारों -को याद दिलाने में जुट गए हैं कि -
वो उनके खासमखास  हैं। 

अरे कभी कभी अपने अंदर भी झाँकने की दम किया करो !

समाजवाद के रहस्यवाद को समझने के  … 
मंथन वाले शिखर वक़्त में  …
जब -जय प्रकाश नारायण  की क्लास में;
सबसे पीछे वाली बैंचों में बैठ कर 
तुम लोग 'मटरगश्ती' किया करते थे  … 
उस वक़्त यह छात्र  … 
संघ की  कक्षाओं में  … 
स्वावलम्बन का '-क ख ग ' समझ रहा था और 
किसी कमरे में 
अपनी विचारों की नीँव को -
मजबूती प्रदान कर रहा था। 

कभी कभी  .... 
डर लगता है कि -
तुम लोगों के साथ -
भारत में ;
समाजवाद की पीढ़ी, 
समाप्त न हो जाये। 
और 
तुम लोगों को भी -
आखिरी ध्वज वाहकों 
के रूप में -
याद किया जाये। 

अँधेरा सब जगह आता है  … 
दुनियां का कोई कौना नहीं है ,जहाँ -
गलत लोग चुन कर न आये हों।  
परन्तु ;
 कठोर सच यही है की -
नेपोलियन से हिटलर तक हों या 
तुगलकों से लेकर औरंगज़ेबों तक  … 
अंत या पतन सभी का हुआ। 

फिर 'हम और तुम' तो 
किस खेत की अमर मूली हैं ?

अरे बात सड़कों की करो ,शिक्षा की करो ,रोजगार की करो  … 
सपनों की करो ,पर्यटन की करो या 
अपराध ख़त्म करने की करो। 
और तुम बात  … 
धर्म की करते हो , निरपेक्षता की करते हो या  न जाने कौन से वहमों की करते हो 
जिनसे 
जनता को कोई 
लेने देना नहीं है। 

अरे !तुम लोग तो गौतम बुद्धा के सरजमीं के हो  .... 
जिसने शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाया ;सारे विश्व को ?
तो फिर -
तुम लोग क्यों नहीं  … 
दान कर देते हो  
अपनी सारी जमीन जायदाद ;
जन कल्याण में -
धर्म निरपेक्षता के बड़े मंदिर के निर्माण हेतु ?

अरे कुछ ठोस यथार्थ के धरातल पर करना पड़ेगा !
तभी दाल गलेगी अन्यथा  .... 
अधपके कच्चे चावलों से ही ,
'लोकसभा' जैसा काम ;
चलाना पड़ेगा। 

काश !
आप महानुभाव समझ सकते -
आम जनमानस का क्रंदन,वंदन और निवेदन 
कि -
अब आप लोगों का ;
बुद्धतत्व के- 'विहारों ' की और प्रस्थान करने का वक़्त हो चला है ;
राजनैतिक बारिश चलायमान है और 
अब 
राजनैतिक वानप्रस्थ ;
आपका इंतज़ार कर रहा है। "

 गर्वित गौरव!




Wednesday, September 9, 2015

बिहार समर!

महाभारत के सारे पात्र  …
हो गए हैं इकट्ठे ,
बिहार समर में  …
लिए अपने अपने लट्ठे।

सब लिए हैं -
अपने अपने चापलूस पट्ठे   ....
जो लगा रहे हैं ;
राजनैतिक सट्टे और उन्हे दम्भ है कि -
बड़ी आसानी से करेंगे वे
दुश्मनों के दांत खट्टे।

दिखने में हट्टे कट्टे और निखट्टे ,
बढ़ती उम्र ; पर चलते बड़े ही सरपट्टे,
जुबान जैसे हो आटे की चक्की के पट्टे ,
तैयार खड़े हैं -कि -
कैसे मारें झपट्टे और
इस बार फिर जनता बँट जाए किसी तरह और
मार लें बाज़ी बिहार समर की  …
चाहे
अड़ाना पड़े -बच्चों के -बन्दूक और कट्टे।

समझते हैं बपौती -बिहार का सिंहासन !
बना रहे बिहार का प्रहसन !
न कोई पिछले अनेक वर्षों का यतन न जतन !
न कुछ करने की अगन और न लगन !
बस हैं अपने में मगन कि  … इस बार भी -अच्छा होगा शगुन।
जीत जाएंगे वे और
विश्व पटल के मानचित्र से कर देंगे -बिहार का पांच वर्षीय गमन और
फिर उनका होगा ;सिर्फ चमन !
सिर्फ चमन !

अरे तुम्हें नहीं पता कि -
ध्रुव से भी हिरण्यकश्यप इतने ही दम्भ से बोलता था की -
"कहाँ है -तेरा ईश्वर ?बुला उसको और बचा ले अपना दमन?"
और फिर
आएगा  "वो भी " ;जिसे तू अक्सर ललकारता है आज भी - की -
कहाँ है वो जो लाएगा बिहार में चमन ?"
देखना   … फिर होगा तेरा दमन  …

बिहार जागेगा  ....
होगा नवीन हवन
ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा और भारतीयता के संकल्पों से
बिखर जाएगा -विष वमन
चमक उठेगा -इक नया सन्देश
भारतीयता के ओतप्रोत लवण !

हाँ !
हारेगा रावण !
जीतेगा श्रवण !

हाँ !
हारेगा युद्ध !
जीतेगा बुद्ध !

बिहारी समर के बड़े और बूढ़े ताउओं... याद रखना... 

हक़ीक़त रूबरू हो तो अदाकारी नही चलती,
ख़ुदा के सामने बन्दों की मक्कारी नही चलती;

तुम्हारा दबदबा तो ख़ाली तुम्हारी ज़िंदगी तक है,
किसी की क़ब्र के अन्दर ज़मींदारी नही चलती..
(गर्वित गौरव!)

Tuesday, September 1, 2015

कहानी आसूं की!

कहानी आसूं की!

दोस्तों के बीच आँख से
ढलकता -ये -"पानी" था या
"नौटंकी" था...

जब माँ बाप थे तो ये आँख से ढलकता हुआ- पानी ; "मोती" था...

मोहब्बत हुई और आँख के पानी में "दिल और दर्द" का जायका भी मिल गया और ये -बन गया... अश्क़!

ज़िन्दगी थोड़ा आगे चली और यथार्थ के धरातल ने इस बहते अश्क़ को बना दिया -"शुष्क और रश्क... सैलाब.. "

और फिर ढलती उम्र ने -दे दिया इसे.. नया नाम और पहचान -"अनुभवों का दरिया! "
(गर्वित गौरव!)