Tuesday, July 29, 2014

मेरी बेटी!

एक प्यारी
बेटी का अपने  पापा को  खत.....................

शाम हो गयी....
घूमने चलो न पापा.......

चलते चलते थक गयी.....
कंधे पे बिठा लो न पापा!

अँधेरे से डर लगता है.....
सीने से लगा लो न पापा....

मम्मी तो सो गयी......
आप ही थपकी देकर सुला दो न पापा......

स्कूल तो पूरी हुई -
कॉलेज जाने दो न पापा...

जब डोली में बिठा ही दिया .....
तो आंसू तो मत बहाओ न
पापा......

आपकी मुस्कराहट अच्छी है  -
एक बार मुस्कुराओ न पापा.....

आपने मेरी हर बात मानी......
एक बात और मान भी जाओ न पापा .....

इस धरती पे बोझ नहीं हूँ मैं
दुनिया को समझाओ न पापा  !!!

Sunday, July 27, 2014

मेरे पापा!

मेरे प्यारे पापा!

"शिद्दत से ढूंढ़ता हूँ आपको अपने अंदर.....
आपके जाने के इतने साल बाद भी....
आपका बेटा हूँ न!

जब जब कोई नीचा दिखाता है आपका कन्धा आपके बाजू याद आते हैं जहाँ अक्सर मैं चिपक कर सबकुछ भूल जाता था!

जब जब कोई ऊँचा उठाता है, सम्मान और इज़्ज़त देता है और कहता है -डाक्टर रूपेंद्र का बेटा है तो बरबस आँखों के बिनबुलाये आंसू आपको तलाशते हैं कि - काश आप होते!

जब गुस्से में झल्लाता हूँ तो सब कहते हैं कि - गुस्सा पापा पे गया है!

जब कोई चुनौती देता है तो कह देता हूँ कि -मेरी वल्दियत देख लेना ;टूटना मंजूर हैं झुकना नहीं!

और
जब लिखता हूँ.....
बोलता हूँ..... या
किसी के सामने झुक कर पैर छूता हूँ तो सब कहतें हैं कि-अपने पापा पे गया है!

मेरे प्यारे पापा!
आपके जाने के बीस साल बाद भी.....
रंगीला बन.......
रंगा हुआ हूँ
उन्हीं रंगों में -
जो आपने उकेरे थे ;
अपने 'शानू 'के अंतर्मन में!

हर 'पिता ' घबराता है जब बच्चे बड़े होते हैं,
क्यों कि-
यह पाठ तो पापा ने बताया नहीं था....
क्या करें?
उस पल.....
इस पल....
सच......
आप याद आतें हैं!

गिरुं तो आप?
टूटूं तो आप?
दुखी तो आप?
परेशान तो आप?

प्यार तो आप!
माँ तो आप!
पापा तो आप!
दिलासा तो आप!

ख़ुशी तो आप!
सफलता तो आप!
हंसी तो आप! और
सुख तो आप!

मन घबराता है....
आप जो नहीं हो......

बस....
हिम्मत देना की वो कर जाऊँ
जिससे कभी -
मैं भी......
आपके जैसा याद किया जाऊँ! "

Saturday, July 26, 2014

आहिस्ता चल ऐ ज़िन्दगी!

आहिस्ता चल ज़िन्दगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है,
कुछ दर्द मिटाना बाकी है, कुछ फ़र्ज़ निभाना बाकी है;

रफ्तार में तेरे चलने से कुछ रूठ गए, कुछ छुट गए ;
रूठों को मनाना बाकी है, रोतो को हसाना बाकी है ;

कुछ हसरतें अभी अधूरी है, कुछ काम भी और ज़रूरी है ;
ख्वाइशें जो घुट गयी इस दिल में, उनको दफनाना अभी बाकी है ;

कुछ रिश्ते बनके टूट गए, कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए;
उन टूटे-छूटे रिश्तों के ज़ख्मों को मिटाना बाकी है ;

तू आगे चल में आता हु, क्या छोड़ तुझे जी पाऊंगा ?
इन साँसों पर हक है जिनका , उनको समझाना बाकी है ;

आहिस्ता चल जिंदगी , अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है ।

Friday, July 25, 2014

शहादत बेकार न जाएगी !


"कोशिश तो मैंने भी करी थी   ……
मारना तो मैं भी चाहता था   …………
जज्बा देश के खातिर मेरा भी था   .............
पर
नसीब न हुई वो मौत
जो
तेरे सर का ताज बनीं। "

"मनपसंद मोहब्बत और मौत नसीब वालों को मिलती है मेरे भाई   …………
तू खुशकिस्मत था कि -
तेरी 'मोहब्बत' देश था और 'मौत 'देश की लाज खातिर हुई। "

"सलाम उस मिटटी को -जहाँ तू दफ़न है।
सलाम उस मोहब्बत को जहाँ तू आज भी जनम जनम के लिए कैद है।
सलाम उन माँ -बाप को जिनकी तू ख्वाईश था।
सलाम उस झंडे को जिसकी खातिर तूने सीने पे गोली खाई। "


कारगिल और काल !

"मुझे नहीं मालूम-
उन ऊँची चोटियों की बुलंदी ........
जिसे फतह करने के लिए  ………
पंद्रह साल पहले -
तुमने अपने आप को -
निछावर कर दिया था !

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
उस मिट्टी की गंध ओ खुशबू कैसी है -
जिसे बचाने के लिए
तुमने अपने ऊपर ;अपनी छाती पे
गोली झेली थी !

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
जहाँ चोटी पे जहाँ तुम्हारा खून गिरा और बहा था ;
अब वहां
क्या है ?

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
उन चूड़ियों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से टूटीं ?
उन सपनों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से खंडित हुए ?
उन हसरतों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से अधूरी रह गयीं ?

बस मुझे यह मालुम है कि -
आज  …… सारा देश
तुम्हारे सम्मान में
नतमस्तक है।

आज   …… सारा देश
तुम्हारी शहादत पे
बलिहारी है।

उन बुलंद ऊँची चोटियों पे  ……
तिरंगा लहरा रहा है।

उन ऊँची चोटियों पे   ……
तुम्हारे चर्चे हैं।

उन गर्वित चोटियों पे  ……
तुम्हारी खुशबू है।

तुम चिंता मत करना  ……

तुम्हारी चूड़ियाँ -पथरा कर संकल्प बन गईं हैं।
तुम्हारे सपनें -हक़ीक़त का जामा पहन चुके हैं।
और   ....
हसरतें सच में   ……
हसरतें बन कर रह गई हैं  ....
अगले जन्म में   …
पूरी होने के लिए। "

नमन सहित   …
एक भारतवासी !




Thursday, July 24, 2014

द्रोपदी!

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद
ना आएंगे। 

छोड़ो मेहंदी खड़ग संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाए बैठे शकुनि,
... मस्तक सब बिक जाएंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद
ना आएंगे।


| कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए
अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं?
वे क्या लाज बचाएंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद
ना आएंगे।


कल तक केवल अंधा राजा, अब गूंगा-
बहरा भी है......
होंठ सिल दिए हैं जनता के, कानों पर
पहरा भी है........
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझाएंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद
ना आएंगे....

Tuesday, July 22, 2014

Gaurav!

प्रभू को भी पसंद नहीं सख्ती बयान में...
इसी लिए हड्डी नहीं दी,
जबाऩ में..|।।

Sunday, July 20, 2014

Facts of Life.....

बुलंदी की उडान पर हो तो... जरा सबर रखो,
परिंदे बताते हैं कि... आसमान में ठिकाने नही होते....


चढ़ती थीं उस मज़ार पर चादरें बेशुमार;
लेकिन बाहर बैठा कोई फ़क़ीर सर्दी से मर गया।


कितनी मासुम सी ख़्वाहिश थी इस नादांन दिल की,
जो चाहता था कि.. शादी भी करूँ और ....ख़ुश भी रहूँ

छत टपकती है उसके कच्चे घर की....... .
वो किसान फिर भी बारिश की दुआ माँगता है


तेरे डिब्बे की वो दो रोटिया कही भी बिकती नहीं.......
माँ ,होटल के खाने से आज भी भूख मिटती नहीं.....

इतना भी गुमान न कर आपनी जीत पर " ऐ बेखबर"
शहर में तेरे जीत से ज्यादा चर्चे तो मेरी हार के हे....।।

सीख रहा हूं अब मैं भी इंसानों को पढने का हुनर
सुना है चेहरे पे किताबों से ज्यादा लिखा होता है!

लिखना तो ये था कि खुश हूँ तेरे बगैर भी..
पर कलम से पहले आँसू कागज़ पर गिर गया...

"मैं खुल के हँस तो रहा हूँ फ़क़ीर होते हुए !
वो मुस्कुरा भी न पाया अमीर होते हुए"..




मन की आवाज़!

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर...
क्योंकि मुझे अपनी औकात
अच्छी लगती है..




मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,
चुपचाप से बहना और अपनी मौज में
रहना ।।





चाहता तो हु की
ये दुनिया
बदल दू
पर दो वक़्त की रोटी के
जुगाड़ में फुर्सत नहीं मिलती
दोस्तों



महँगी से महँगी घड़ी पहन कर देख ली,
वक़्त फिर भी मेरे हिसाब से
कभी ना चला ...!



युं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे ..
पता नही था की, 'किमत
चेहरों की होती है!!'




अगर खुदा नहीं हे तो उसका ज़िक्र
क्यों ??
और अगर खुदा हे तो फिर फिक्र
क्यों ???


"दो बातें इंसान को अपनों से दूर कर
देती हैं,
एक उसका 'अहम' और
दूसरा उसका 'वहम'......



" पैसे से सुख कभी खरीदा नहीं जाता
और दुःख का कोई खरीदार नहीं होता।"


मुझे जिंदगी का इतना तजुर्बा तो नहीं,
पर सुना है सादगी मे लोग जीने नहीं देते।

माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती...
यहाँ आदमी आदमी से जलता है...!!"




दुनिया के बड़े से बड़े साइंटिस्ट,
ये ढूँढ रहे है की मंगल ग्रह पर जीवन है
या नहीं,
पर आदमी ये नहीं ढूँढ रहा
कि जीवन में मंगल है या नही


ज़िन्दगी में ना ज़ाने कौनसी बात
"आख़री" होगी,
ना ज़ाने कौनसी रात "आख़री" होगी ।
मिलते, जुलते, बातें करते रहो यार एक
दूसरे से,
ना जाने कौनसी "मुलाक़ात"
आख़री होगी ....।।।।

अगर जींदगी मे कुछ पाना हो तो
तरीके बदलो,....ईरादे नही....||

ग़ालिब ने खूब कहा है :
ऐ चाँद तू किस मजहब का है !!
ईद भी तेरी और करवाचौथ भी तेरा!!

Saturday, July 5, 2014

हिसाब!

कब से हिसाब लगा रहा हूँ -
बारिश में तन से चिपका तन को उकेरता कुरता अच्छा या
दोनों हाथों से तन को ढंकती लाज से दोहराती बालों को निचोड़ती ज़िन्दगी?

नग्नता अच्छी या भग्नता ?

प्रेम में डूब कर "आई लव यू " कहना अच्छा या नजरें झुका कर "लब" थरथराना?

अपने उन्मुक्त लिबास में बिना दुपट्टे के ज़िन्दगी जीना अच्छा या
अपना आँचल झीने दुपट्टे से ढँक कर रहना अच्छा?

अपने हाथ से लिख कर प्रेम की पाती देना अच्छा या इक "power point E Mail में अपना प्यार कहना?

कभी अकेले मिलने पे -
पलकें मूँद कर आँखों के रास्ते दिल में बसाना अच्छा या
मर्यादा की कुलांचे मारना?

कस्मे -वादे,
शाश्वत प्रेम,
तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी,
इस जनम में आपकी,
आपकी "सबकुछ "
मुझे भूल जाना प्लीज,
जैसी बातें सच और सार्थक या....

तुमने मुझे use किया,
सब चलता है,
so what ; it happens -shit
जैसी बातें?

बहुत दूर छत से अपना प्यार देखना अच्छा?
या छत पे मिलना?

प्यार में पर्दा अच्छा या
बेपरदिगी?

सोचना होगा?
कभी न कभी?
कहीं न कहीं!

Friday, July 4, 2014

चालीस पार के पापा!

चालीस पार का मर्द........

कैसा होता है चालीस पार का मर्द,
थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के पास,
खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद,
जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे,
जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ,
अनुभव की पूंजी हाथ में लिए,
परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में,
जो उसे नहीं मिल पाया था,
बस बहे जा रहा है समय की धारा में,
एक खूबसूरत सी बीवी, दो प्यारे से बच्चे,
पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा,
रात को घर आता है, सुकून की तलाश में,
लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे,
दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे,
पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था,
नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए,
लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए,
अब वो क्या कहे बच्चों से,
कि जेब में पैसे थोड़े कम थे,
कभी प्यार से, कभी डांट कर,
समझा देता है उनको,
एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है,
आँख के कोने में,
लेकिन दिखती नहीं बच्चों को,
उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद,
बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के,
खाने की थाली में दो रोटी के साथ,
परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं,
कभी,
तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है,
कुछ कहते ही नहीं,
कभी,
हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को,
कभी प्यार से बात भी कर लिया करो,
लड़की सयानी हो रही है,
तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता,
लड़का हाथ से निकला जा रहा है,
तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है,
पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें,
शिकवे शिकायतें दुनिया भर की,
सबको पानी के घूंट के साथ,
गले के नीचे उतार लेता है,
जिसने एक बार हलाहल पान किया,
वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया,
यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है,
जिंदा रहने की चाह में,
फिर लेटते ही बिस्तर पर,
मर जाता है एक रात के लिए,
क्योंकि सुबह फिर जिंदा होना है,
काम पर जाना है,
कमा कर लाना है,
ताकि घर चल सके,
वक्त कम है और काम बहुत,
और दुनिया वाले कहते हैं,
चालीस पार वाले मर्द
करते हैं आराम बहुत,

आभार सहित :-
गौरव!

Wednesday, July 2, 2014

मुझे याद कर लेना! "

"ज़िन्दगी की दुश्गवारियों या खुशफहमियों ने हम दोनों को जुदा भले कर दिया हो;
मगर.... 
जेहन और रूह में.... 
साथ बिताये लम्हें.... 
पल छिन्न.... 
और साँसों की महक..... 
आज भी क़ैद है,
ता उम्र के लिए.... "

कभी यकायक......
जब मन घबराये ; मुझे याद कर लेना!
धड़कन बढ़ जाये ;मुझे याद कर लेना!

ज़िन्दगी की तपिश ओ गर्मी झुलसाए,
अनहोनी की आशंका से जी घबराये,
मुझे याद कर लेना! "

"अच्छे दिनों" का इंतज़ार करता लवकुशनगर का शिक्षा विभाग !


"अच्छे दिनों" का इंतज़ार करता लवकुशनगर का शिक्षा विभाग ! 
khajurahotrip@gmail.com
gs.patel@dainikbhaskargroup.com

लवकुशनगर !
नए शिक्षा सत्र के शुरू होते ही छतरपुर जिले की यह तहसील शिक्षा के क्षेत्र में अपनी बदनसीबी का पुराना रोना रोने लगी है !आलम यह है की -नगर के प्रमुख सरकारी स्कूलों एवं महाविधालय में प्राचार्य ,प्रोफेसर एवं बाबू तक "अप -डाउन " कर के मात्र कागज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं परन्तु हकीकत में शिक्षा के स्तर से  इनका कोई लेने देना नहीं है !
बालक उत्कृष्ठ उचत्तर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य आर के चौरसिया जहाँ रोज महाराजपुर से "अप -डाउन " विगत वर्ष से कर रहें हैं वहीँ शासकीय कन्या उचत्तर माध्यमिक विधालय के भी यही हाल हैं। यहां पदस्थ प्राचार्य एस के उपाध्याय भी विगत सत्र की भांति छतरपुर से प्रति दिन आते जाते हैं।
 शासकीय महा विधालय के तो और भी बुरे हाल हैं। आहरण एवं वितरण के अधिकार जहां महाराजा कालेज की वियाख्याता स्नेहलता खरे के पास हैं वहीँ प्रशासनिक अधिकार गीता पटेरिया महाराजपुर महाविद्यालय के पास हैं। एक पूर्ण रूपेण प्राचार्य की बाट आज भी लवकुशनगर शासकीय महाविद्यालय जोह रहा है। वहीँ दूसरी ओर पांच लिपिक के पद स्वीकृत होने के बावजूद एक उच्च श्रेणी लिपिक "धूरिया बाबू जी " प्रतिदिन छतरपुर से "अप -डॉउन " कर किसी प्रकार महाविधालय को खिसका रहें हैं। जब उनसे पूंछा गया की वे "आप -डाउन " क्यों करते हैं तो उनका कहना था की -महाराजा कालेज की प्रिंसिपल से अनुमोदित करवाने के लिए उन्हें छतरपुर आना पड़ता है। उसी प्रकार शासकीय बालिका हरिजन छात्रावास में पदस्थ प्रभारी लकड़ा मैडम प्रतिदिन ड्यूटी करने के उपरांत रात्रि में बालिकाओं को छोड़ लवकुशनगर ब्लॉक के पीछे स्थित अपने निवास आ जाती हैं।
जहाँ एक और पूरा राजस्व/पुलिस अमला एस.डी.एम. एवं तहसीलदार को मिला कर तहसील मुख्यालय में पदस्थ रहता है वहीँ शिक्षा के कर्ता धर्ताओं का "आप -डाउन " करना न सिर्फ छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है अपितु भाजपा के "नमो मंत्र " अच्छे दिन का भी भद्दा मजाक है।
प्रशासन ध्यान दे !