Monday, September 22, 2014

भस्म!




"जब उस उम्र में  ……
जब उस जिस्म में  ........
जब उस किस्म में  ......
जब उस तिलिस्म में  ......
तुझे -
प्यार न आया मुझ पे -
तो ;
अब क्या आएगा -
इस भस्म में !"

जब उस अर्जी पे   ....
न चली मेरी मर्जी   ....
खुदा को लगी मेरी मोहब्बत -
मेरी खुदगर्जी।
तो अब इस वक़्त ढलते जीवन सूर्य के साथ  .....
कैसे बन जाऊँ अपना दर्जी ?

बीत गए दिन ऊष्मा के   ……
गुज़र गए पल करिश्मा के   ....

अब आया वक़्त गरिमा का   …
समय है दवा का  …

जब्त आंसुओं को सुखो कर सो जाओ।
दफ़न जज्बातों को कफ़न कर सो जाओ।

मिलेंगे अगले जनम में कहीं किसी समुन्दर में  .....
जहाँ लहरें किसी वीरान टापू पे हमें ढकेल कर मिला देंगी। 

Monday, September 15, 2014

आहिस्ता आहिस्ता!

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं,
जिसे भी देखिए यहां हैरान बहुत हैं,,

करीब से देखा तो है रेत का घर,
दूर से मगर उनकी शान बहुत हैं,,

कहते हैं सच का कोई सानी नहीं,
आज तो झूठ की आन-बान बहुत हैं,,

मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी,
यूं तो कहने को इन्सान बहुत हैं,,

तुम शौक से चलो राहें-वफा लेकिन,
जरा संभल के चलना तूफान बहुत हैं,,

वक्त पे न पहचाने कोई ये अलग बात,
वैसे तो शहर में अपनी पहचान बहुत हैं।।

Saturday, September 13, 2014

कल युग की -"सेल "

कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देता है..
मिले अगर भाव अच्छा, जज भी कुर्सी बेच देता है,

तवायफ फिर भी अच्छी, के वो सीमित है कोठे तक..
पुलिस वाला तो चौराहे पर वर्दी बेच देता है,

जला दी जाती है ससुराल में अक्सर वही बेटी..
के जिस बेटी की खातिर बाप किडनी बेच देता है,

कोई मासूम लड़की प्यार में कुर्बान है जिस पर..
बनाकर वीडियो उसका, वो प्रेमी बेच देता है,

ये कलयुग है, कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं इसमें..
कली, फल फूल, पेड़ पौधे सब माली बेच देता है,

किसी ने प्यार में दिल हारा तो क्यूँ हैरत है लोगों को..
युद्धिष्ठिर तो जुए में अपनी पत्नी बेच देता है...!!

अजीब है न हमारे देश का संविधान !
'गीता' पर हाथ रखकर कसम खिलायी जाती है सच बोलने के लिये....
मगर 'गीता' पढ़ाई नहीं जाती सच को जानने के लिये..!!

यथार्थ गीता।

धन से बेशक गरीब रहो
पर दिल से रहना धनवान,
अक्सर झोपडी पे लिखा होता है"सुस्वागतम"और महल वाले लिखते है "कुत्ते से सावधान"

अंत में केवल हम दोनों ही होंगे!

Nice one dedicated to all married people..

अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.

भले ही झगड़े, गुस्सा करे,
एक दूसरे पर टूट पड़े
एक दूसरे पर दादागिरि करने के
लिये, अन्त में हम दोनों ही होंगे

जो कहना हे, वह कह ले,
जो करना हे, वह कर ले
एक दुसरे के चश्मे और
लकड़ी ढूँढने में,
अन्त में हम दोनों ही होंगे

मैं रूठूं तो तुम मना लेना,
तुम रूठो ताे मै मना लूँगा
एक दुसरे को लाड़ लड़ाने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे

आँखे जब धुँधली होंगी,
याददाश्त जब कमजोर होंगी
तब एक दूसरे को एक दूसरे
मे ढूँढने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे

घुटने जब दुखने लगेंगे,
कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे

"मेरी हेल्थ रिपोर्ट एक दम नॉर्मल
है, आइ एम आलराईट
ऐसा कह कर ऐक दूसरे को
बहकाने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे

साथ जब छूट जायेगा,
बिदाई की घड़ी जब आ जायेगी
तब एक दूसरे को माफ करने के लिए, अन्त में हम दोनों ही होंगे...

Thursday, September 4, 2014

मेरा गाँव!

बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है

वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ

वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है

यहाँ कोठी है बंगले है और कार है
वहां परिवार है और संस्कार है

यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है

यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ,

यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है

मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है,

वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है
चल आज हम उसी गाँव में चलते है
............. उसी गाँव में चलते है |

Monday, September 1, 2014

ना तुम बेवफा न हम !

 ना तुम बेवफा न हम !

"तुम अपनी मोहब्बत के साथ  ……
मैं अपनी के साथ।

तुम अपनी वफाओं के साथ  .......
मैं अपनी के साथ।

निभाते उन कसमों-वादों को  .......
जो खाई थीं हमने बिछड़ते वक़्त  .......
फिर न कभी मिलने की  ……
और न कभी साथ साथ चलने कीं।

मजा आ रहा है न   ……
बिना मिले  ……
मोहब्बत के वादे निभाने में ?

तुम अपने सात फेरों के जीवन साथी के साथ और -
मैं अपने सात वचनों की जीवन संगिनी के साथ।

तुम भी अपने जीवन साथी से वफादार और -
मैं भी ;मेरे नाम की मांग भरने वाली ज़िन्दगी के साथ पूरी शिद्दत के साथ।

ईश्वर साक्षी है  ……
न तुम अपनों से बेवफा और
न मैं अपनों से।

बस  ……
निभाना उन रिश्तों को
जो हमारी मोहब्बत को पाक और सलामत रखें।

साबित करना की  .....
मोहब्बत जन्मों जन्मों का रिश्ता है जो -
शादी से मुकाम पे नहीं पहुँचता बल्कि ,
बिन मिलन के भी   ……
चल सकता है   ……
निरर्थक   ……
बिना रुके बिना थमे   …
कई जन्मों के लिए।

इक ज़िन्दगी सिर्फ हमारे प्यार के वास्ते।
इक ज़िन्दगी सिर्फ बिछड़ने के वास्ते।
इक ज़िन्दगी सिर्फ हमारी चाहत के वास्ते।
और -
सिर्फ बड़ी बेतक़ुल्लफ़ी से -
दिल का हाल छुपाने के वास्ते।

निभाना अपनी जिम्मेदारियों को
पूरी वफाओं से  …
जिससे -
अगले जनम में -
हमारा दावा ;
कमजोर न पड़ जाये-
ऊपर वाले के सामने।

कथानक जैसा है
उसे स्वीकार करना भी
मोहब्बत है।

बस इक आँसूं की बूँद भी नहीं कभी मेरे नाम की या याद की   ……
निभाना उन किरदारों को जो बड़े जहीन अंदाज़ में-
पिरोकर भेजे हैं हमारी झोली में
ऊपर वाले ने। "