Monday, September 22, 2014

भस्म!




"जब उस उम्र में  ……
जब उस जिस्म में  ........
जब उस किस्म में  ......
जब उस तिलिस्म में  ......
तुझे -
प्यार न आया मुझ पे -
तो ;
अब क्या आएगा -
इस भस्म में !"

जब उस अर्जी पे   ....
न चली मेरी मर्जी   ....
खुदा को लगी मेरी मोहब्बत -
मेरी खुदगर्जी।
तो अब इस वक़्त ढलते जीवन सूर्य के साथ  .....
कैसे बन जाऊँ अपना दर्जी ?

बीत गए दिन ऊष्मा के   ……
गुज़र गए पल करिश्मा के   ....

अब आया वक़्त गरिमा का   …
समय है दवा का  …

जब्त आंसुओं को सुखो कर सो जाओ।
दफ़न जज्बातों को कफ़न कर सो जाओ।

मिलेंगे अगले जनम में कहीं किसी समुन्दर में  .....
जहाँ लहरें किसी वीरान टापू पे हमें ढकेल कर मिला देंगी। 

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