Friday, August 31, 2012

अम्मा तुम चली गईं .....

अम्मा तुम चली गईं .....
अम्मा तुम चलीं गईं ....

पर
तुम हमेशा याद आओगी
जन्मों जन्मों तक ...
हमसब में समाओगी
अनवरत-अनवरत- अनवरत !

आपके चरणों को सिर रख के प्रणाम!
आपके उन स्नेहिल हाथों को प्रणाम जिन्होंने लाखों बार हम सब को आशीष दी!
आपके उन आंसूओं को भी प्रणाम जो सैकड़ों बार हमसब के भले के लिए भगवान् के सामने निकले!
उस प्यारे मुखड़े को बार बार प्रणाम जिसने सैकड़ों बार अपने बच्चों को चूमा
और
क्या कहूँ???
बस इक बच्चा अपनी सदैव को बिछ्ड्ती माँ से क्या कहे?
आप सिर्फ हमारी माँ नहीं थी!
दरअसल आप हम सब की "अम्मा' थीं सिर्फ "अम्मा"!

आप चिंता मत करना बिलकुल मत करना-
क्यूँ कि -
आप तो हमेशा हम सब के पास रहोगी -
तन में - मन में;लहू में -साँसों में -
इस जन्म में -उस जन्म में -जन्म -जन्मों में
हर जनम में ...
हमें मार्गदर्शन देने के लिए,संबल देने के लिए और सहारा देने के लिए !
पर अम्मा .....
हम बहुत रोएँगे भी ...
क्यों कि ...
अब हमें आपका आँचल कैसे मिलेगा?
आँचल का वो छोर कैसे मिलेगा जिससे हमारी अम्मा हमारे आंसूं पौंछती थी?

बस अम्मा भगवान् से यही कहना कि -
जन्मों जन्मों तक हमारी अम्मा-
हमारी अम्मा ही रहें !

अम्मा अम्मा अम्मा
मेरी अम्मा -हम सबकी अम्मा !
शत शत वंदन !
चरण स्पर्श!
अश्रुं पूरित श्रधांजलि!


Friday, August 24, 2012

क्यूँ भूलता जा रहा हूँ ?




क्यूँ भूलता जा रहा हूँ -
दीवाल पे टंगी उन अपनों की तस्वीरों को-
जिन्होने एक ज़िन्दगी गुजारी हमारे साथ?
जो हमें इस दुनिया में लेकर आये -
संघर्ष कर के, हमें बड़ा और होनहार बनाया!
और.....
अपने बहुत कुछ सुनहरे सपनों और ख्वाबों को त्याग कर
हमारे सपनों को हकीकत बनाया !

क्यूँ भूलता जा रहा हूँ -
उनको- जिनकी फोटो पे हर बरस दीवाली पे;माला बदलना अब भारी लगने लगा है ?
जिनकी फोटो और यादों पे जमी धूल को साफ़ करना अब पुरानी आदत हो गई है?
और अब उनके चित्र के सामने दीया और अगरबत्ती लगाना औपचारिकता बन कर रह गई है?
और....
उनके सामने जा के उनसे मन की मुराद मांगना तो बीते दिनों की बात हो चुकी है ?
और और....
न जाने कब से उनकी याद में,उनके प्यार में,उनके दुलार में और बिछोह में मेरी आँखों में आँसूं नहीं झिलमिलाये?
पता नहीं क्यों?
न जाने क्यों???

भूलने की आदत तो देखिये-
-भूल गया घर के उस पहले 'ब्लैक एंड वाईट' टी.वी.को जो कभी प्यारे पापाजी बड़े जतन से अपने बच्चों के लिए लाये थे!
-भूल गया उस फिलिप्स के रेडियो-टेप- रेकॉर्डर 'टू -इन वन ' को;जो कभी पापा हमें गाना सुनाने को लाये थे!
-भूल गया उस टूटी हुई 'रेवोल्विंग चेएर' को जिसपे बैठ के पूज्य पापा ने जीवन की 'ऊँच-नीच' अपने बेटों को सिखाई-पढाई थी!
भूल गया अलमारी के उन 'हैंगरों' को जिनपे कभी पापा की शर्ट्स-पैंट टंगती थी!

जीवन की आप-धापी में भूल गया सब कुछ पर....
नहीं भूला सिर्फ अपने माँ -पापा को-
उनके जज्बे को,उनके संघर्ष को और उनके जतन को -
जिसके कारण आज मेरा अस्तित्व है वर्ना ....
मेरा क्या होता ?

आओ याद करें उन्हें जिन्हें हम धीरे धीरे भूलते जा रहे हैं !
हाँ !हम व्यस्त हैं -हम भी अपने बच्चे पाल रहें हैं ,पर इसका मतलब यह तो नहीं कि-
-हम अपनी जड़ों को बिसरा दें?
-हम अपनी उर्वरा शक्ती को भूल जायें ?
-हम अपनी दुआओं को भूल जाएँ?
-हम अपनी छाया को भूल जाएँ जिसकी ठंडक और उस छाँव को बिसरा दें जिसने
-अपने दामन और आँचल में हमें पाला और इस लायक बनाया कि
आज हम हैं!






Friday, August 17, 2012

"शिद्दतों में जमा होते, सांसों में खर्च"


"शिद्दतों से जमा किया था पूरी ज़िन्दगी भर-
सोच था बच्चों के काम आयेगा !
-कभी उनकी पढाई या परवरिश पे या
-कभी उनकी शादी या रहवारिश पे!
पर......
उम्र के इस पड़ाव पे इक हवा का झोंका आया-
बुढ़ापे ने दस्तक दी और लाठी ने खट-खटाया-
तब अहिसास हुआ ...
ऊपर वाले का बुलावा आया!
पर....
बेटों ने कहा -अभी नहीं पापा प्लीज अभी नहीं जाना !
और इस तरह -"साँसों पे खर्च"होने का मुकाम आया !
फिर क्या था-
हरे हरे नोटों की हरी हरी भीड़ ने,
अपोलो अस्पताल में मेरे चेहरे पे हरियाली का शुमार लाया !
दोस्तों !
औलाद मुनासिब निकली तभी तो ये मुकाम आया वर्ना-
"शिद्दतों में जमा होते, सांसों में खर्च" किस किस को नसीब होती है?

Wednesday, August 15, 2012

मेरा जीवट अभी जिंदा है !



  • तुम्हारे जाने के बाद-
धीरे धीरे बदलता जा रहा है ज़िन्दगी का रास्ता ......
सीधी सपाट सड़के तब्दील हो गई हैं पथरीली पगडण्डीईयों मे
और ......
दुनिया बदल सी गई है !

  • जानती हो ....
-जिन बेटों के लिए तुम मुझ से लड़ जातीं थी आज वो 'हमारी आँखों के तारे' अपनी बीवीओं के लिए मुझ से लड़ जाते हैं ...
-रात को जब जीवन की 'पचत्तर दोपहरियाँ' देख के कभी शरीर मे दर्द से कराह निकल जाती है तो पोरों में आंसूं आ जाते हैं क्यों की-
-तुम बहुत दूर चली गई हो और तुम्हारे संस्कारित बेटों के लिए मै बहुत दूर चला गया हूँ !
काश!कोई पलट के आता और मेरे 'सिर पर हाथ फेर के कहता-'बाबूजी' पैर दबा दै और मेरे न कहने पर भी तुम्हारे दो बेटे मेरे दो पैर और दो बेटे मेरे दो हाथ दबाते?
पर....
अब ऐसा नहीं है!

  • तुम्हारे जाने के बाद.....
-कोई नहीं धोता मेरे कपडे और चड्डी-बनियान!
-कोई नहीं ठीक करवाता मेरा फटा हुआ पैंट या उधड़ी हुई सिलाई या चश्मे की वो टूटी हुई डंडी जिसके बिन पिछले एक महीने से डोर बाँध के मै काम चला रहा हूँ !
-कोई नहीं लाता अपने बाबूजी की "बी.पी" की गोली;बल्कि तुम्हें याद होगा कि -बचपन में अपने इन बच्चों को पालने के लिए हम दोनों रात-रात भर जगा करते थे !
-कोई नहीं देता रात बारह बजे चाय की इक प्याली यदि मेरा मन कर जाये और संकोच लगता है मांगने मे अपने ही घर मे!
-कोई नहीं भरता इक बाल्टी पानी शौच के लिए क्यों कि-तुम्हारे बेटों को अब मेरे घुटनों का दर्द नहीं दीखता और
-कोई नहीं देता अपनी उंगलियो का सहारा जब मै लडखडाता हुआ सीढ़ी उतरता हूँ!
और बरबस लगता है कि-कहाँ कमी रह गई हमारी परवरिश और प्यार मे जो-
अपना ही पिता अपने ही बच्चों के बीच बेगाना हो गया है?
-"शायद कमी मेरी ही रही होगी वर्ना तुम्हारी परवरिश मे तो कमी हो नहीं सकती?"
  • अभी कुछ दिनों पहले तुम्हारी छोटी बेटी के यहाँ चौक में जाना पड़ा था और मेरे पास कपडे नहीं थे;अपनी 'पेंसन' की मदद से मैंने नए कपडे सिलवा लिए थे!पर तुम्हारे होनहारों को कभी अपने पिता के कपडे नहीं दिखते और दिखें भी क्यों?क्योंकि अब में वैसे भी 'एक्सपायरी डेट';का वो " चुका हुआ पिता हूँ" जिससे तुम्हारे बेटों को कोई खास फ़ायदा होने से रहा?
  • शायद तुम्हें न मालूम हो कि आज कल तुम्हारे बेटे कुछ ज्यादा ही "मेहनती और बिजनेस" वाले हो गए हैं और-"बीघा ,एकड़,आरे,स्टाम्प,इकरारनामा,शपथ-पत्र और एग्रीमेंट" जैसे बड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हैं पर बाबूजी फल खा लीजिए,सर दबा दें या चिंता न करो सब ठीक हो जायगा जैसे शब्द तुम्हारे जाने के बाद बस यादों में ही रह गए हैं!शायद वे उस इश्वर प्रदत इकरारनामे को भूल गए हैं जिसमे मै उनका पिता हूँ और वे मेरे बेटे!चलो तुम्हे ये जान कर खुशी होगी कि-तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे बेटे तुम्हें याद कर के अगरबत्ती लगा लेते हैं और चाय का कप तुम्हें चढ़ा देते हैं पर चलो देखते हैं मुझ से इस जन्म में कैसा सलूक करते हैं?
  • बहुत ऊँची ऊँची जज्बातों की बातें करने वाले तुम्हारे बेटे ... हो गए हैं बहुत खोकले ...और कभी कभी मुझे फिकरे भी कसने लगे हैं!बिचारे सोचतें हैं कि-बाबूजी ऊँचा सुनतें हैं और उन्हें कुछ भी कहने से फर्क नहीं पड़ता!"साठया गए हैं ,दिमाग ख़राब हो गया है,बहुत परेशान करे हैं -क्या करें,बाबूजी अति करें हैं और दिमाग ख़राब है";जैसे जुमले अपने बच्चे अब सुनाते हैं और मै अपमान का घूँट पी कर सह लेता हूँ और वे सोचतें हैं कि -बहरे को सुनाई नहीं देता?
और ...
  • अपनों के बीच मै ऐसे घिरा हूँ जैसे-
-भीष्म पितामह तीरों की सेज पे!
-या शाहजहाँ औरंग्ज़ेबों के चंगुल मे!

  • पर तुम चिंता मत करना...
-मेरी पेन्शन मुझे मिलती है पर...
-हाँ! बैंक मे लाइन मे खड़े होने मे थोड़ी दिक्कत जरूर होती है !
-पिछली बार तो बैंक मे चक्कर आ गया था पर..
-कुछ लोगों ने मेरी मदद कर दी थी और घर पंहुचा दिया था !
-पर उन घर पहुचाने वालों में कोई तुम्हारा बेटा नहीं था?

-बस तुम चिंता मत करना ....
मेरा आत्म-सम्मान अभी जिंदा है!
मेरा आत्मा-बल अभी जिंदा है!
मेरा जीवट अभी जिंदा है !





Tuesday, August 14, 2012

६५ साल पहले -सलाम उस जज्बे को!




६५ साल पहले -
आओ नमन करें उस गरम खून को जो बहा देश को आज़ाद करानें में!
आओ नमन करें उन गरम विचारों को जिन्होनें प्रज्वल्लित की देश प्रेम की चिंगारी!
आओ नमन करें उन गरम चीखों को जो बदल गई करुण क्रंदन मे अपनों को खोने के बाद देश की बलिवेदी पे!
आओ नमन करें उन गरम जख्मों को जो भर नहीं पाए,अपनों को खोने के बाद!

६५ साल पहले -
आओ नमन करें उस नरम इंसान को जिसका नाम 'बापू' था!
आओ नमन करें बापू के उस नरम अंदाज़ को जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिला दीं थी!
आओ नमन करें उस 'नरम दल' को जिसने ब्रिटिश सल्तनत को हिन्दुस्तान छोड़ने को मजबूर कर दिया था!
आओ नमन करें उन नरम माओं को जिन्होंने पोषित किये वो सुपूत जिन्होंने असहयोग आन्दोलन में गाँधी जी का साथ दिया!

६५ साल पहले -
आओ नमन करें उन सुहागिनों की टूटी चूड़ियों को जो टुकड़ों में बाँट गई अपनों को खो कर!
आओ नमन करें उन सूनी कलाइयों को जो सूनी ही रह गई देश के खातिर!
आओ नमन करें उन सूखी आँखों को जो पथरा गई अपने बेटों की बाट जोहते जोहते !
आओ नमन करें अधूरी ख्वाइशों को जो दफ़न हो गई देश की मिट्टी में!

सलाम उस जज्बे को!
सलाम उस सदमे को!
सलाम उस लम्हे को!





Sunday, August 12, 2012

'सत्य'-हताश,निराश और परेशान है, परन्तु पराजित नहीं !


'सत्य'-हताश,निराश और परेशान है, परन्तु पराजित नहीं !

ऐसा क्यूँ होता है कि- जब जब 'सत्य' अपने अस्तित्व के बात करता है ;
'असत्य' के बादल 'सत्य' को दबाने की कोशिश करते हैं?
अपने कुतर्कों को तर्क का जामा पहना कर कैसे 'असत्य' के महान योद्धा-
अपने आपको 'शहीद' साबित करने को उत्तावले रहते हैं?

हो सकता है कि 'अन्ना हजारे' और 'बाबा रामदेव' के कुछ राजनैतिक एजेंडे हों?
पर उस सब से परे बात तो वे सच्चाई की कर रहे हैं ?

गंगा को सारी दुनिया धरती पे लाना चाहती थी;
पर कोई इस काम के लिए 'भागीरथ' बनाना नहीं चाहता था?
पर जब .....
'भागीरथ' ने गंगा माँ को 'पृथ्वी' पे लाने के लिए तप प्रारंभ किया तो-
बहुत से मुनियों ने कहा कि -ये पागलपन है,उतवलापन है और मुर्खता है?
क्या कभी 'गंगा' को आसमान से धरती पे आते देखा है?ऐसा हो सकता है?
यह बेतुका है और कोई और कारण से मुनि भागीरथ माँ गंगा को पृथ्वी पे ला रहें हैं और
देखना कोई छुपा हुआ एजेंडा होगा?
पर......
मुनि भागीरथ ने बिना विचलित हुए तप जारी रखा और-
इतिहास गवाह है -माता गंगा शिव जी की जटाओं से पृथ्वी पे आयीं !

अब.....युग बदला - समय बदला
मनुष्यता बदली उसकी फितरत बदली .....
कहाँ मुनि 'भागीरथ' और कहाँ मुनि 'दधीचि'?
कहाँ 'बापू' और कहाँ 'सुभाष' ?
पर.....
चलो कुछ तो बात सुने उनकी जो अपने 'आदर्शों' को जिन्दा रखने की कोशिश कर रहें है?
'सत्य' के अंतिम लड़ाई के 'सिपहसलार' है?
और ....
'सत्य' के उस अंतिम 'दीये की अंतिम 'बाती' में अपनी 'जीवटता' का तेल डाल रहें है
और ......
कोशिश में लगे हैं कि-
'सत्य' अपराजित रहे !
'सत्य' शाश्वत रहे!
'सत्य' चिरंतर रहे!
'सत्य' सत्य रहे!
जरा सोचिये -
भला गरुड़ के पंखों को काट कर उसकी उड़ान को रोकने वाले हम कौन होतें हैं ?
सूरज की तपती जीवनदायनी आंच को रोकने वाले हम कौन होतें हैं?
अगर हम कुछ नहीं तो फिर .......
इतिहास इसका फैसला करेगा!
समय इसका फैसला करेगा!
प्रकृति इसका फैसला करेगी !