Friday, August 17, 2012

"शिद्दतों में जमा होते, सांसों में खर्च"


"शिद्दतों से जमा किया था पूरी ज़िन्दगी भर-
सोच था बच्चों के काम आयेगा !
-कभी उनकी पढाई या परवरिश पे या
-कभी उनकी शादी या रहवारिश पे!
पर......
उम्र के इस पड़ाव पे इक हवा का झोंका आया-
बुढ़ापे ने दस्तक दी और लाठी ने खट-खटाया-
तब अहिसास हुआ ...
ऊपर वाले का बुलावा आया!
पर....
बेटों ने कहा -अभी नहीं पापा प्लीज अभी नहीं जाना !
और इस तरह -"साँसों पे खर्च"होने का मुकाम आया !
फिर क्या था-
हरे हरे नोटों की हरी हरी भीड़ ने,
अपोलो अस्पताल में मेरे चेहरे पे हरियाली का शुमार लाया !
दोस्तों !
औलाद मुनासिब निकली तभी तो ये मुकाम आया वर्ना-
"शिद्दतों में जमा होते, सांसों में खर्च" किस किस को नसीब होती है?

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