सात हज़ार रूपए में मक्का और मदीना शरीफ .......
शेख मौला खान(89 वर्ष) ने बीते दिनों को याद करते हुए अपनी हज यात्रा को याद किया और पोरों पे ढलक आये आसूओं के सैलाब को पौंछ लिया।जब हमने पूंछा कि ये आंसूं किस बात के?तो जवाब मिला सात हज़ार रूपए में अल्लाह का दीदार करने की याद आ गई जब पानी के जहाज से वर्ष 1951 में मक्का-मदीना शरीफ का दीदार किया था।आज 90 वर्ष की आयु में सात हज़ार रूपए में हाजी बनाना असंभव है।जमाना कितना बदल गया है और अब तो हज करना बस गरीब का ख्वाब बन कर रह गया है।काश वह दिन लौट आयें जब गुढ़ा गाँव से महोबा बस से गया था एवम महोबा से झाँसी और झाँसी से बम्बई की रेल गाड़ी की यात्रा।फिर चालीस दिन की पानी के जहाज से मक्का-मदीना शरीफ की यात्रा।और मदीना शरीफ में 2 महीने रुकना फिर वतन वापसी।
अब तो बस रहमत की यादें है।आमीन आमीन आमीन।।
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शेख मौला खान(89 वर्ष) ने बीते दिनों को याद करते हुए अपनी हज यात्रा को याद किया और पोरों पे ढलक आये आसूओं के सैलाब को पौंछ लिया।जब हमने पूंछा कि ये आंसूं किस बात के?तो जवाब मिला सात हज़ार रूपए में अल्लाह का दीदार करने की याद आ गई जब पानी के जहाज से वर्ष 1951 में मक्का-मदीना शरीफ का दीदार किया था।आज 90 वर्ष की आयु में सात हज़ार रूपए में हाजी बनाना असंभव है।जमाना कितना बदल गया है और अब तो हज करना बस गरीब का ख्वाब बन कर रह गया है।काश वह दिन लौट आयें जब गुढ़ा गाँव से महोबा बस से गया था एवम महोबा से झाँसी और झाँसी से बम्बई की रेल गाड़ी की यात्रा।फिर चालीस दिन की पानी के जहाज से मक्का-मदीना शरीफ की यात्रा।और मदीना शरीफ में 2 महीने रुकना फिर वतन वापसी।
अब तो बस रहमत की यादें है।आमीन आमीन आमीन।।
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