"दरख्तों के साए में बीतती जा रही है ज़िन्दगी !
बहुत होले होले से -बहुत धीरे-धीरे से !
आहिस्ता आहिस्ता मगर …।
प्यार से धीरे धीरे !
प्यार की बारिश!
बिछडन की तपन !
वफाओं की सौगंध और -
हक़ीक़त ए ज़िन्दगी का सामना !
सब कुछ तो सीखा -झेला-
धीरे धीरे .......
माँ -पापा का बिछड़ना लगा-
जैसे दरख़्त गिर गए हों!
भूचाल आ गया हो !
रात ने अमावस्या का रूप धर लिया हो !
और किसी लंगड़े की बैसाखी छिन गई हो !
सब कुछ तो सीखा -झेला!
धीरे धीरे ……
बिन माँ -पापा के शादी-
बिन माँ-पापा के नौकरी-
'बिन माँ-पापा के पढाई-
और बिन माँ -पापा के जीवन की भरपाई-
सब कुछ तो हुआ -
धीरे धीरे ……
बच्चों का ज़िन्दगी में आना-
उनकी परवरिश -उनके सपने -उनके अपने-
उनके प्रश्न -उनके उत्तर और मै निरुत्तर?
सब कुछ हुआ-
धीरे धीरे ……
अपनों का दूर जाना-धीरे धीरे.....
उनका फोन न आना -धीरे धीरे .......
दीपावली दशहरा होली घर न आना ……।
ऊपर से इतराना .......
सब कुछ तो हुआ-
धीरे धीरे ……
लेकिन धीरे धीरे के बीच-
वो मेरे साथ थे-और हैं- जिसे -
मै भगवान! भी कहता हूँ तो कभी अपने प्यारे पापा!
जिन्होंने-
अपने "शानू" की "शान" को संभाला और-
जिस "गर्व" से उन्होंने मेरा नाम "गौरव" रखा था!
उस "गरिमा" और "गर्व" को बनाये रखने का-
आशीर्वाद दिया-साथ दिया।
ये सब भी हुआ -बिना माँ -पापा के हुआ
मगर धीरे धीरे।
हलकी सी आँखों में झुर्रियाँ,
हलकी सी बालों की सफेदी,
कभी कभी घबराहट होना-रात में खांसना ,
ज़ुखाम का एक दम से ठीक न होना-कफ़ से दोस्ती ,
और शक्कर का कम खाना,
ये भी हो रहा है -
मगर धीरे धीरे …।
अब गाड़ी संभल कर धीमा चलाना
किसी के गाड़ी उट -पटांग चलाने पे लड़ाई न लड़ना
फिजूलखर्ची न करना
किसी के सुख -दुःख में जरूर जाना और ....
रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों पे "हॉर्न "बजाना -
सब कुछ करने लगा हूँ -
मगर धीरे धीरे .......
गाय को रोटी डालना,
चीटीं को शक्कर खिलाना,
चिड़ियों को दाना डालना,
कुत्तों को रोटी डालना।
ये भी करने लगा हूँ मगर -
धीरे धीरे ……
शायद वो सब कर रहा हूँ धीरे धीरे-
जो कभी प्यारे पापा ने किया होगा -धीरे धीरे …।
क्या करूँ अब समझ में आने लगा है -
जीवन का सत्य मगर-
धीरे धीरे !"
बहुत होले होले से -बहुत धीरे-धीरे से !
आहिस्ता आहिस्ता मगर …।
प्यार से धीरे धीरे !
प्यार की बारिश!
बिछडन की तपन !
वफाओं की सौगंध और -
हक़ीक़त ए ज़िन्दगी का सामना !
सब कुछ तो सीखा -झेला-
धीरे धीरे .......
माँ -पापा का बिछड़ना लगा-
जैसे दरख़्त गिर गए हों!
भूचाल आ गया हो !
रात ने अमावस्या का रूप धर लिया हो !
और किसी लंगड़े की बैसाखी छिन गई हो !
सब कुछ तो सीखा -झेला!
धीरे धीरे ……
बिन माँ -पापा के शादी-
बिन माँ-पापा के नौकरी-
'बिन माँ-पापा के पढाई-
और बिन माँ -पापा के जीवन की भरपाई-
सब कुछ तो हुआ -
धीरे धीरे ……
बच्चों का ज़िन्दगी में आना-
उनकी परवरिश -उनके सपने -उनके अपने-
उनके प्रश्न -उनके उत्तर और मै निरुत्तर?
सब कुछ हुआ-
धीरे धीरे ……
अपनों का दूर जाना-धीरे धीरे.....
उनका फोन न आना -धीरे धीरे .......
दीपावली दशहरा होली घर न आना ……।
ऊपर से इतराना .......
सब कुछ तो हुआ-
धीरे धीरे ……
लेकिन धीरे धीरे के बीच-
वो मेरे साथ थे-और हैं- जिसे -
मै भगवान! भी कहता हूँ तो कभी अपने प्यारे पापा!
जिन्होंने-
अपने "शानू" की "शान" को संभाला और-
जिस "गर्व" से उन्होंने मेरा नाम "गौरव" रखा था!
उस "गरिमा" और "गर्व" को बनाये रखने का-
आशीर्वाद दिया-साथ दिया।
ये सब भी हुआ -बिना माँ -पापा के हुआ
मगर धीरे धीरे।
हलकी सी आँखों में झुर्रियाँ,
हलकी सी बालों की सफेदी,
कभी कभी घबराहट होना-रात में खांसना ,
ज़ुखाम का एक दम से ठीक न होना-कफ़ से दोस्ती ,
और शक्कर का कम खाना,
ये भी हो रहा है -
मगर धीरे धीरे …।
अब गाड़ी संभल कर धीमा चलाना
किसी के गाड़ी उट -पटांग चलाने पे लड़ाई न लड़ना
फिजूलखर्ची न करना
किसी के सुख -दुःख में जरूर जाना और ....
रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों पे "हॉर्न "बजाना -
सब कुछ करने लगा हूँ -
मगर धीरे धीरे .......
गाय को रोटी डालना,
चीटीं को शक्कर खिलाना,
चिड़ियों को दाना डालना,
कुत्तों को रोटी डालना।
ये भी करने लगा हूँ मगर -
धीरे धीरे ……
शायद वो सब कर रहा हूँ धीरे धीरे-
जो कभी प्यारे पापा ने किया होगा -धीरे धीरे …।
क्या करूँ अब समझ में आने लगा है -
जीवन का सत्य मगर-
धीरे धीरे !"




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