Saturday, November 30, 2013

बीत रही है ज़िन्दगी मगर धीरे धीरे !

"दरख्तों के साए में बीतती जा रही है ज़िन्दगी !
बहुत होले होले से -बहुत धीरे-धीरे से !
आहिस्ता आहिस्ता मगर  …। 
प्यार से धीरे धीरे !

प्यार की  बारिश!
बिछडन की तपन !
वफाओं की सौगंध और -
हक़ीक़त ए ज़िन्दगी का सामना !
सब कुछ तो सीखा -झेला-
धीरे धीरे  .......

माँ -पापा का बिछड़ना लगा-
जैसे दरख़्त गिर गए हों!
भूचाल आ गया हो !
रात ने अमावस्या का रूप धर लिया हो !
और किसी लंगड़े की बैसाखी छिन गई हो !
सब कुछ तो सीखा -झेला!
धीरे धीरे  ……

बिन माँ -पापा के शादी-
बिन माँ-पापा के नौकरी-
'बिन माँ-पापा के पढाई-
और बिन माँ -पापा के जीवन की भरपाई-
सब कुछ तो हुआ -
धीरे धीरे  …… 

बच्चों का ज़िन्दगी में आना-
उनकी परवरिश -उनके सपने -उनके अपने-
उनके प्रश्न -उनके उत्तर और मै निरुत्तर?
सब कुछ हुआ-
धीरे धीरे  ……

अपनों का दूर जाना-धीरे धीरे..... 
उनका फोन न आना -धीरे धीरे  .......
दीपावली दशहरा होली घर न आना  ……।
ऊपर से इतराना  .......
सब कुछ तो हुआ-
धीरे धीरे  ……

लेकिन धीरे धीरे के बीच-
वो मेरे साथ थे-और हैं- जिसे -
मै भगवान! भी कहता हूँ तो कभी अपने प्यारे पापा!
जिन्होंने-
अपने "शानू" की "शान" को संभाला  और-
जिस "गर्व" से उन्होंने मेरा नाम "गौरव" रखा था!
उस "गरिमा" और "गर्व" को बनाये रखने का-
आशीर्वाद दिया-साथ दिया। 
ये सब भी हुआ -बिना माँ -पापा के हुआ
मगर धीरे धीरे।

हलकी सी आँखों में झुर्रियाँ,
हलकी सी बालों की सफेदी,
कभी कभी घबराहट होना-रात में खांसना ,
ज़ुखाम का एक दम से ठीक न होना-कफ़ से दोस्ती ,
और शक्कर का कम खाना,
ये भी हो रहा है -
मगर धीरे धीरे  …।

अब गाड़ी संभल कर धीमा चलाना
किसी के गाड़ी उट -पटांग चलाने पे लड़ाई न लड़ना
फिजूलखर्ची न करना
किसी के सुख -दुःख में जरूर जाना और  ....
रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों पे "हॉर्न "बजाना -
सब कुछ करने लगा हूँ -
मगर धीरे धीरे  ....... 

गाय को रोटी डालना,
चीटीं को शक्कर खिलाना,
चिड़ियों को दाना डालना,
कुत्तों को रोटी डालना।
ये भी करने लगा हूँ मगर -
धीरे धीरे  …… 

शायद वो सब कर रहा हूँ धीरे धीरे-
जो कभी प्यारे पापा ने किया होगा -धीरे धीरे  …।
क्या करूँ अब समझ में आने लगा है -
जीवन का सत्य मगर-
धीरे धीरे !"








Monday, November 25, 2013

दुआ!






"न जाने किसकी दुआ मेरे सजदे पे कबूल हो रही है! 
डूबता भी हूँ तो समुंदर उछाल देता है!"




मतदान!


और वो उजला दिन भी पूरा हुआ-
जब कुछ सिर्फ चुनी हुई चंद तक़दीरों के ख्वाब-
मत पेटियों में बंद हो गए।

और.....
लाखों-करोड़ों वोट डालने वाले जिंदादिल और बुजदिलों के  ख्वाब-
चुनाव जीतने वालों की किस्मत की लकीरों-
में फ़ना हो गए। 

कितनी ख़ुशी के वो दिन थे-
जब तुम अपनी औकात से-
हमारी देहलीज पे आते थे।
हाथ जोड़ कर वोट मांगते थे -
और..... 
उन चंद लम्हों के लिए ही सही-
हम भी विधायक बन जाते थे।

चलो यही सही -इस ज़िन्दगी में -
कुछ दिनों के लिए -तुम अपनी असली नस्ल और रूप में हमारे सामने अवतरित तो हुए। 
ऐसा लगा कि वाकई तुम तो आदमी हो!
सजीव,चिंतित,विचलित,मानवीय और मधुर।
पर.…।
काश तुम हमेशा ऐसे हे रहते ???
पर.…।
अब कहाँ देखने को या दीदार करने को मिलेगा तुम्हारा यह मनभावन रूप ?
किसी ने सही ही कहा है  कि -
"मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं
अब तुम हमें जानते नहीं। "

पर चलो अपना ध्यान रखना -
गरीबों और मजलूमों को कभी सताना मत।
वरना -
कहीं ऐसा न हो जाये कि -
नेताजी अपनी गाड़ी से जा रहे थे ;पता नहीं क्या हुआ कि गाड़ी "डिवाइडर" पे चढ़ गई-
ड्राईवर तो बच गया पर नेताजी की रीढ़ की हड्डी खिसक गई।
और..... 
अब नेताजी अपना शेष जीवन-
लेटे लेटे ही गुजारेंगे।
बिचारे बड़े ही अच्छे आदमी थे।

क्या करें -
"खुद कि लाठी चलती है तो
आवाज नहीं करती !"

आमीन !
शब्बा खैर !

Saturday, November 23, 2013

धन्यवाद नेताओं !धन्यवाद दिल से!

धन्यवाद नेताओं !धन्यवाद दिल से!


 आप सभी हमारे आँगन में आये-


हमारी सड़कों पे चले.…
हमारी कुलियों में थूकें-
हम आभारी हैं !

हमारे सामने हाथ जोड़े-
हमारे सामने नजरें झुकाई-
जुबां लड़खड़ाईं-
हम आभारी हैं !

महँगी महँगी गाड़ियाँ दिखाई-
ऊँचे ऊँचे सपने दिखाए-
प्यारे प्यारे जादू के झप्पे दिखाए
और.…।
महंगे महंगे जूतों के मॉडल दिखाए-
सच
हम आभारी हैं !

बस थोड़ी सांस लेने में दिक्कत है!
सांस उखड़ने लगी है -
ऐसा नहीं है कि -डाक्टर को नहीं दिखाया?
डाक्टर कहते है -
पिछले एक महीने से लगातार बाहरी लोगों के आने से और हमारी हवा में सांस लेने से-
हवा में प्रदूषण ज्यादा हो गया है!
जो चुनाव बाद-
प्राकृतिक तरीके से -
इन प्रदूषण तत्वों के पांच साल के लिए वापस चले जाने से-
नॉर्मल हो जाएगा।

थोडा बहुत हमारे गावों में -
गऊ माता भी परेशान रही -वो भी -आपकी महंगी गाड़ियों कि आवाजों से-
कुत्ते परेशान रहे -पहियों के नीचे दबने से-
और.…।
पशु -पक्षी परेशान रहे
आपके आगमन से।
पर आप चिंता मत करना-
जानवर हैं !
मरते है -कोई बात नहीं !

आप चिंता मत करना।
जीत पक्की है।
पूरा मामला "फिट" हो गया है।
जीत "शियोर" है !

फिर मिलेंगे !
पांच साल बाद !
तब तक के लिए -
शब्बा खैर !
राम राम !


Saturday, November 9, 2013

मै पतंग हूँ !


कटी पतंग कभी देखी है ?
कटने के बाद.……
बस उड़ती हुई.……
बिना रुके-बिना थमे.…
बस नीचे की  ओर...... 
गिरती जाती है।

कोई छत उसकी नहीं होती।
कोई मुडेर उसे नहीं थामती।

बस गिरना उसकी नियति होती है।
बस गिरना उसकी प्रतीति होती है।

इस छत से उस छत.… 
इस घर से उस घर...... 
इस दिशा से उस दिशा  ..... 
इस डगर से उस डगर  .......
बस-
गिरना और गिरना  .... 
नीचे और नीचे  …… 
पतित और पतित  ....
पतन और पतन  …… 

हजारों हाथ नीचे  …
उस गिरती हुई पतंग को-
लूटने के लिए।
नोंचने के लिए।
भोगने के लिए।

कोई नहीं उस पतंग को -
थामने के लिए।
सहेजने के लिए।
संजोने के लिए।

बस…
क्यों की तुम कटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों की तुम फटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों कि तुम हठी हो तुम्हें गिरना है।

पर  …… 
ऐ समय के काल चक्र!
मेरे वजूद पे शक न कर !

मै पतंग हूँ !
गिरने के बाद फिर उठना भी मेरी फितरत है। 
बहती हवाओं के विपरीत उड़ना और उठना मेरी सीरत है। 
आकाश में विचरना मेरी शोहरत है। 








Friday, November 8, 2013

पापा ! काश आप होते!




मेरे प्यारे पापा !
शानू के दुलारे पापा !

आज आपकी पुण्य तिथि है-

समाज में सबके लिये -ये पुण्य तिथि होगी  पर
मेरे लिए तो दुःख कि वो तिथि है
जो हमेशा मेरे जेहन में एक प्रश्न पैदा करती है कि -
आखिर क्यूँ ?
इतनी जल्दी क्यों ?
क्यों आप चले गए इतनी जल्दी-इस जहाँ से ?
जबकि आप रुक सकते थे  .......
यदि ईश्वर चाहता !

आपका जाना मेरे लिए था और आज भी है-

  • इक ममतामयी पिता का चला जाना। 
  • इक बरगद के पेड़ का असमय कट जाना। 
  • इक नौका का असमय भंवर में फंस जाना। 

और   ………

  • एक बसंती पौधे का रेगिस्तान में पहुँच जाना। 
आपके जाने  के अट्ठारह साल बाद भी  आज भी आप प्रासंगिक हैं-
  • सुबह कि पूजा में। 
  • सुबह के पुराने 'ब्लैक एंड वाइट ' गानों में। 
  • सुबह के जीवन संकल्पों में। 
  • घर में बनी उरद कि दाल में। 
  • सर्दियों में सुबह के भटे-मटर के भरते में। 
  • आलू के पराठों में। 
  • मेरी मोटर साइकिल ड्राइविंग टिप्स में। 
  • घर कि मंगोड़ियों में। 
  • घर कि सफाई में। 
  • पुरानी अलमारी में। 
  • पुराने बक्सों में। 
  • माउथोर्गन के सुरों में।  
और मेरी कलम में ,मेरी उँगलियों में। 

मुझे मालूम है कि -आप - 
  • मेरे जज्बातों में हो। 
  • मेरे सपनों में हो।  
  • मेरे भगवन में हो। 
पापा आप "मेरे" नहीं "अपने" घर के कण कण में हो। 
  • मेरी रग -रग में हो। 
  • अपने पोते -पोती कि नस-नस में हो और-
  • बहू की आस्था में हो ,कामना में हो प्रार्थना में हो।  
बस और क्या कहूं ?क्या लिखूं ?क्या सोचूँ ?
काश आप होते !
काश आप होते !
काश आप होते!