If u follow your haters u will lose
your lovers
But..
If u follow your lovers u can
change your future.
'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
Tuesday, May 7, 2019
Haters or lovers
Thursday, May 3, 2018
किसान की अरदास !
"तुम फरमाते रहो ..
कहानियां अपनी सफलता की ..
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !
तुम सुनाते रहो ...
शोखियाँ मोहब्बतों की ...
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !
तुम बताते रहो ..
बातें देश बदलने की ..
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !
कभी मन करे तो ...
मेरे साथ खेत पे चलना !
दो रोटी कमाने का हुनर ..
तुम्हें भी सिखा दूंगा !! "
Saturday, April 7, 2018
शिकार!
Wednesday, April 4, 2018
समय का हिसाब!
"उन पलों को सलाम ...
जो पल बन गए !
और ..हम जिनके सहारे जी गए !
वरना समय का हिसाब ...
कौन रख पाया है ?
समय ; यूँ ही गुज़र जाता हैं ..
मौसमों की मानिंद और ...
हम ठहरे पानी से ...
बुलबुले बन ...
उड़ जाते हैं ...
ज़िन्दगी की तपिश में !"
Tuesday, March 27, 2018
साया!!
"न ये चाँद अपनी चांदनी देगा और न सूरज अपनी तपिश ! ये सब साजिशें हैं ... तुझे गिराने की ! तय कर ...अपनी आग और चांदनी !! वर्ना इस ज़िन्दगी की दौड़ में ... इस राख और बर्फ के खेल में ... कोई जीत नहीं पाया ! हर किसी ने अंततः खोया .. अपना साया !!"
Monday, March 26, 2018
पुच्छल तारा !
"अपनी ...
छुद्र आकाश गंगा का ..
मैं ; इक नन्हा सा पुच्छल तारा !
न चमक ..न रौशनी ...
बस यूँ ही ...
लुढ़कता ढुढ़कता ..
आवारा ..
बेसहारा बंजारा !
पता ही नहीं ...
किसी से रौशनी लेनी है या
किसी को देनी ??
बस गफलतों से भरा सफर ...
मैं इक सिमटता नज़ारा ...
आवारा ,
बेसहारा बंजारा !
अपने वज़ूद की गरमी को ...
समेट कर ..
अपने अंतर्मन की धूल धूसरित दीवारों में ..
एक दिन टकरा जाऊँगा ...
धरती से ...
ठीक उन पुच्छल तारों की मानिंद ...
जो कुछ पल की चमक को ..
पाने की खातिर ...
दो पल चमक कर ..
राख बन ..
बिछ जाते हैं ..
धरती की तलहटी में !
देखना ...मैं भी ;
बिछ जाऊँगा ; इक दिन ...
इसी बाँझ धरती पर और
उर्वरा बीज बनूँगा ...
नव सृजन की संरचना का !"
Friday, February 16, 2018
मोहताज़!
हर रात अकेला हो जाता हूँ ; ऐ चाँद !!
तेरी तरह ..सैकड़ो तारों के बीच !
अपने वज़ूद की तलाश में ;
सोचते सोचते ..
पता है ..मुझे यह अच्छे से !
निज रौशनी से ही प्रकाशित हूँ ; मैं !
वरना मैं भी ..तेरी तरह ..
तारों के रोशन होने का मोहताज़ नहीं !
शुभ रात्रि !
[गौरव !]