Saturday, May 20, 2017

दीदार ज़िन्दगी से !

आज बहुत करीब से दीदार हुआ ज़िन्दगी से !
सच आँखें ठहर गईं और जुबां बेज़ुबां हो गई !

1) एक इंसा सड़क किनारे पालथी मारे बैठा था और उसकी बीवी चूल्हे से रोटी सेंक उसको गरम् गरम् परोस रही थी !
कुत्ता उसके बगल में बैठा था और वो इंसा रोटी का एक टुकड़ा कुत्ते को भी सरका देता था !

2) सड़क किनारे के सरकारी हैंडपंप में एक बेटी अपने परिवार के कपड़े धो कर बेशरम की टहनियों पर सुखा रही थी !

3) वहीँ उसी हैंडपंप पर दो छोटे भाई बहन अपनी बच्चा साइकिल बड़े जतन से धो रहे थे !

4) एक छोटा बच्चा डरते डरते आइसक्रीम वाले से पूंछ रहा था -"भैया दो रुपए वाली है ?"
और ...
5) एक अस्सी साल के बुजुर्ग अपनी बुजुर्ग पत्नी को साइकिल पर बैठा कर और धड़का कर सरकारी अस्पताल इलाज़ करवाने ले जा रहे थे !

सच ...यार सब बेकार है !
"गौतम बुद्ध या महावीर जी ने जो दृश्य देख सांसारिक मायामोह त्यागा था ; उससे यह दृश्य कुछ कम नहीं हैं !"

सरकारी योजनाएं ...
पुत्र सुख ...
बुढ़ापे की लाठी ...
अमीरी और गरीबी ...
लोकतंत्र ...
सब बकवास है !

सिर्फ इंसानियत ..
पति पत्नी का रिश्ता ..
ही सत्य है !

कभी देखा है आपने ...
जब बुजुर्ग पिता से कोई पुत्र समय निकाल कर बातें नहीं करता हो और वे पिता जानवरों से ही बतियाते हों ?
हक़ीक़त में सब बकवास है !

हम फ़ालतू में दौड़ते रहते हैं और आखिर में थक कर बैठ जाते हैं !

Friday, May 19, 2017

अंधेरों की बातें अँधेरे से !

आज भी ...
दोस्ती किये हुए हूँ ..
उस अँधेरे से ..
जिसका फायदा उठा कर ..
तू आज भी ..
ख़्वाबों में ..
मिलने चली आती है ..
मुझसे !

मुझे रातों ने ..
कभी नहीं सताया !
न रुलाया !
क्यूंकि
तू हमेशा मेरे साथ रही !
अंधेरों की घटाटोप अमावस में भी ...
रातकली बन !!

हम दोनों ने ..
उस जिद्द को ..
ज़िंदा रखा ..
जिसे हम ..
ज़िन्दगी कहते थे !

चाहत का अंत ..
सात फेरे नहीं और ..
मोहब्बत ;
फेरों की मोहताज़
नहीं !

अँधेरे में बहुत ताक़त है !
वो चाहे तो -
विश्वास बन जाए और ..
चाहे तो आघात !

जैसा मन होगा ..
वैसा तन !
उसमें बिचारे ..
अँधेरे का क्या कसूर ?

मैं ;चाँद और तारों का ...
रोज रात में ....
दीदार करता हूँ और ...
ठीक वैसे ही ..
तेरा भी !
हाँ बस ;
न उन्हें छू पाता हूँ और ..
न तुझे !

बस ...
दूर दूर से ही सही !
हम दोनों का कारवां ...
चल तो रहा है न ?
तू अपनी मंज़िल और ...
मैं अपनी !!

[Garvit Gaurav! ]

Friday, May 12, 2017

लौट आया!

लौट आया ;
इक शादी गुलज़ार कर !
वापस आया तो -
घर के रिश्ते ...
फ़रिश्ते लगे !

लौट आया ;
इक शहर से ..
दो दिन गुज़ार के !
वापस आकर ..
अपने गाँव की ..
मिटटी अच्छी लगी !

लौट आया ;
फैशन के बिग बाज़ार से !
घर आकर ..
सूती निक्कर और बनियान,
अच्छी लगी !

लौट आया ;
रिश्तों के मायाजाल से !
घर आया तो ..
ज़िन्दगी फटेहाल ..
अच्छी लगी !

लौट आया ;
अनगिनित ...
ख्वाब निहार के !
घर आया तो ...
अपनी बेरंग हक़ीक़तें ..
अच्छी लगी !

लौट आया ;
गहनों से लदे मकड़जाल से !
घर आकर ..
अपनी तंगदिली ..
अच्छी लगी !

किसी ने क्या खूब कहा है -
"जब भीड़ में होता हूँ तो ; अकेला होता हूँ !
जब अकेला होता हूँ तो ...
तन्हाई साथ होती है !"

Tuesday, May 9, 2017

गहराती रात और जागता मन !

घनी गहराती रात और
टिक टिक करता ..
घडी का काँटा ..
सुबह की भोर से -
चंद फांसलों दूर ;
अहसास कराता ...
ज़िन्दगी के अंधेरों में -
सुबह की फतह का !

ऊपर काला आकाश और
तारों के बीच
तेज़ी से लपलपाती बत्तियों के साथ
दूरी नापता
गंतव्य की ओर जाता
हवाई जहाज !

अहसास कराता ..
इंसानी दिल के रिश्तों के बंधनों की
ताक़त का !
जो फितूर सा जोड़ता है ..
एक दूसरे को ...
जन्म जन्म तक !

और मैं अभागा ;
कलंकित काली स्याही सा ;
निशब्द ;
अपने प्रारब्ध से ;
ज़मीन से ताकता ...
आसमान में ...
दूसरों को
पूरा करते निज स्वप्न !

करवटें बदल ..
पहलू में समा जाते हैं ..
वे सारे ख्वाब ;
जो कभी ..
मेरे भी पंख थे !
यूँ ही ..
उगे थे ..
मेरी काया से ..
चाँद तारों को नापने की खातिर !

चल इस जन्म न सही
अगले जन्म
फिर कोशिश करेंगे जब
बाज़ बन
लम्बी उड़ान पर जाएंगे !

Sunday, May 7, 2017

हमसफ़र!!

तेरी ज़िन्दगी में -
खतरनाक था तो ...
खौफनाक था तो ..
और
खुबसूरत था तो ;
सब कुछ ....
तेरी ही देन थी ..
ऐ मेरी ...
कुछ पगडंडियों की....
साथी हमसफ़र !

समय समय पर-
मेरी कल्पनाओं को-
जो अल्प विराम,
विस्मय बोधक और प्रश्नचिन्ह
लगाती रहती थी तुम ;
विचारों को जो-
संबल और दिशा देती थी तुम ;
वही अब कुछ कुछ ...
सार्थकता के साथ साथ सफलता देने लगा है !

"बेचैनियां बाजार में ..
नहीं मिला करती प्रिये ;
बाँटने वाला कोई ...
बहुत नज़दीकी होता है !!"

(गौरव !)

Tuesday, May 2, 2017

लवकुशनगर बार संघ ;मध्य प्रदेश अधिवक्ता काउन्सिल में पंजीकृत हुआ !

लवकुशनगर !३७ वर्षों के अथक प्रयास से लवकुशनगर बार संघ का पंजीयन मध्य प्रदेश राज्य अधिवक्ता संघ के अधीन हो गया है। वर्ष १९८० से लवकुशनगर में बार गतिविधियां एवं सेवायें चालू रहीं हैं उसके बावजूद मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित प्रदेश स्तरीय अधिवक्ता संघ में लवकुशनगर बार संघ पंजीकृत नहीं था। इतिहास में प्रथम बार लवकुशनगर बार से पंजीकृत अधिवक्ताओं को वे सभी सुविधाएं एवं संरक्षण प्राप्त होगा जो प्रदेश के सभी बार संघों के वकीलों को मिलता है। मृत्यु बीमा लाभ ,दुर्घटना बीमा लाभ ,लोन सुवधाएं एवं अनेक अधिवक्ता कल्याण से जुडी योजनाओं का लाभ अब यहाँ के अधिवक्ताओं को भी मिलेगा। वर्तमान लवकुशनगर बार संघ अध्यक्ष पं.राजकिशोर तिवारी ने एक जानकारी में बताया कि -" हम गौरान्वित हैं कि लवकुशनगरा बार संघ का पंजीयन क्रमांक २४९/१७ है। सभी अधिवक्ताओं ने उक्त पंजीयन का स्वागत किया है एवं राहत की सांस ली है कि वे भी मुख्य धारा के बार संघ के सदस्य हैं।