Monday, May 13, 2013

जिम्मेदार बाप!

"कितनी जल्दी बदल जाता है समय?
कल तक -जी भाईसाब जी भाईसाब की रट लगाने वाले टट्टू
आज समझाते है कि-ज्वार -भाटा क्या होता है?

थोडा सा पैसा क्या कमा लिया
आज सूरज को आइना दिखाने लगे है।
कहते है-भाईसा!हमने पैसा बड़ी मुश्किलों से कमाया और जोड़ा है !
अक्ल लगनी पड़ी है-सो अलग!

वैसे तो हम बेईमान नहीं है और न कभी होंगे?
वो तो बस इन छोटे छोटे बच्चों के खातिर ये सब करना पड़ा?

नेताओं से लड़े,पुलिस से बचे और दलालों से भिड़े तब कहीं जाकर
यह दिन आया है कि -अपनी भी कोठी है!

कहते है कि-चलो कम से कम इतना तो कर ही दिया कि-
आगे आने वालीं पीड़ियाँ ये न कहेंगी कि-
मेरे बाप ने कुछ नहीं किया ......

शुक्र है कि-कितने जिम्मेदार बाप है ये सब .........
काश ऐ खुदा तू  मुझे भी इतनी ताक़त देता कि ....
मै भी इतना जिम्मेदार बाप कहला सकता।
काश !काश!काश!"

Saturday, May 11, 2013

बदलते हुए हिंदुस्तान को देख रहा हूँ-




बदलते हुए हिंदुस्तान को देख रहा हूँ-

देख रहा हूँ!


  • अटल जी को कुछ न बोलते हुए।
  • अटल जी के बारे में कुछ न सुनते हुए 
  • और इक ध्रुव तारे को अस्ताचल की और विचरण करते हुए।
देख रहा हूँ:
  • मोदी को बोलते हुए।
  • जनता द्वारा मोदी को तौलते हुए। 
  • और मोदी को खौलते हुए।
देख रहा हूँ:
  • रविशंकर प्रसाद के सधे हुए अन्दर तक झंझकोरते हुए वक्तव्यों को। 
  • दिग्विजय सिंह जी के मुस्कराते सधे शब्दों को।
  • और किरीट सोमैया की  औचक पोल खोल को।
समझ रहा हूँ :
  • केंद्र सरकार के मंत्रियों के इस्तीफे को। 
  • मनमोहन के असमंजस को। 
  • और कांग्रेस की हथेली से सत्ता की फिसलती हुई रेत को।
ढूढ रहा हूँ:
  • बापू के नजरिए को - उनकी कांग्रेस को ?
  • नेहरु की सोच को और उनकी कांग्रेस को? 
  • और!स्व . इंदिरा गाँधी के जीवट को और उनकी कांग्रेस को?
पता नहीं कहाँ है ?
  • वो पुरानी कांग्रेस?
  • वो पुरानी कांग्रेसी टोपी वाला जज्बा ?
  • वो हिंदोस्तानियत वाला जीवट 
या .........
  • "वो गाय-बछड़े" वाली कांग्रेस जो "पंजे" वाली कांग्रेस की असली माँ थी?

"कोई ढूंढे उस पुरानी वाली कांग्रेस को?
वोह पता नहीं कहाँ चली गई?
मैंने अपने दादा जी और नाना जी से सुना था-
वो कांग्रेस बहुत अच्छी थी!"
हाँ वो कांग्रेस बहुत अच्छी थी।

पर ....
अब पता नहीं ?
कहाँ चली गई ?
वो  पुरानी वाली कांग्रेस?




Sunday, May 5, 2013

चुनाव का समय!


चुनाव का समय नजदीक है-
किस पर विश्वास करूँ किस पे नहीं ?
समझ नहीं आता?

सभी नेता रंगे सियार नज़र आते हैं।
सभी नेता बेहतरीन अभिनेता नज़र आते हैं।

ऐसा नहीं हैं कि-तुम बहुत अच्छे हो?
बल्कि ....
बात यह है कि-पुराने वाले भी नंगे हैं।
और…अब तुम भी।
जब हम्माम में सभी नंगे हों-
तो ......
आम आदमी क्या करे या कहाँ जाये?
किसको चुने और किसे नकारे?

काश-ऐसा संविधान में भीम राव अम्बेडकर लिख गए होते कि-
जो इक बार चुनाव में जीते वह दुबारा चुनाव न लड़ पाए?
जो एक बार चुनाव में हार जाए वह दुबारा जीवन में कभी चुनाव में खड़ा न हो पाए? 
तो कम से कम ....
दुकाने बदलती रहतीं या
हर चुनाव में फ्रेश यानी ताज़ा आइटम खड़े होते और ....
बासे टमाटर सड़े बैगन या कच्चे आलू हर चुनाव में न खाने पड़ते
या न झेलने पड़ते?

काश इन नेताओं की भी रिटायरमेंट की उम्र होती
जहाँ ....
न यह चुनाव लड़ पाते न मनोनित होते?

कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।
कौन कहता है?भारत एक नहीं है???

अरे भाई कश्मीर से कन्याकुमारी तक -
भ्रष्टाचार भी तो एक है???

हे मतदाता कुछ करो?
कुछ करो?

Thursday, May 2, 2013

दीदार ऐ ताज!

"तुम्हारे मौन का मैं अर्थ क्या समझूँ 
कि तुम हो पाषाण से भी दो-चार डग आगे ???

अरे पाषण में भी आन होती है-
मिलन की चाह होती है! 
अटल विश्वास होता है! 
कहे की लाज होती है!

अगर न हो विश्वास?
पलट के देख लो तिरछी निगाहों से-

आज भी ताज से-
मुमताज की आवाज़ आती है।"