Saturday, September 21, 2013

श्रद्धा और श्राद्ध






पापा प्यारे पापा ! 
आज आपकी नातिन/पोती ने
अपने आँसू निकाले
आपकी याद में
ये कहते हुए कि -
माँ !सबके दादा जी हैं फिर मेरे क्यों नहीं ?

उसकी माँ ने उसे फुसलाया और कहा कि -बेटा !
तुम्हारे दादा जी तुम्हें बहुत चाहते थे और कहते थे कि-
शानू !हाथ न लगा लेना मेरी बेटी में-
इस घर की लाडो है !
लड़कियां किस्मत वालों को मिलती है!
और वो हम है जहाँ इतनी प्यारी ईशा आई है।

वो बोली कि-माँ दादाजी का प्यार कैसा था ?
वो कैसे थे ?
उनका प्यार कैसा था ?
मेरे लिए गुड़िया लाते न ?
मुझे घुमाने ले जाते न ?
मुझे परी ड्रेस लाते न ?

न जाने कितने सवाल-
कुछ बेतुके कुछ अटपटे!
कुछ मासूम कुछ अपने !

आज जब आपकी तिथि है-
मैं आपको स्मरण कर श्रद्धा और श्राद्ध से आहुति देता हूँ-
तब आपकी यही पोती-
अपने नन्हें नन्हे हाथों से-
प्यारी सी रुई की बाती बना के-
अपने दादा जी की फोटो के सामने-
दीया और बाती के सहारे अपना प्यार अपनी श्रद्धा-
अपने दादा जी तक पहुंचा रही थी।

बस.………।
अब यही इच्छा है कि
आपकी इन दोनों अमानतों को
जीवन में सही मुकाम दिलवा सकूँ
जिससे ……
आपके स्वप्नों को साकार रूप दे सकूं !

Wednesday, September 4, 2013

मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

"बहुत छोटी है हमारी औकात।
बहुत औछी है बात ।
बहुत हलके है हमारे जज्बात।
और......
बहुत अदने हैं हमारे स्वप्न ओ खास।
मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

बस तुमसे है आस!
बस तुमसे है आस!
क्यों की तुम हो हमारी -आस!
तुम पे है विश्वास!
क्यों की-
तुम हो हमारे आम ओ खास!
इसी लिए निकालते है-
तुमसे अपनी भड़ास!
ओ म.प्र. के सरताज!
शिवराज शिवराज! 

टूट गई है चश्मे की डोर,
टूट गए हैं दांत,
और अब खाँसी भी बहुत आती है।
उदासी सितम धाती है।
बिछड़े जीवन साथी की याद आँख में पानी भर लाती है।
फिर अब हम भी कितने दिन के साथी हैं?
औलादों ने भी छोड़ दिया है साथ,
पेंशन लेने में कोई नहीं सुनता बूढ़े की बात,
देख रहें है उप्पर वाले की तरफ और हेरे हैं अपनी बाट।
हमें विश्वास है कि -अब तुम ही बचाओगे हमारे बुढ़ापे की लाज ?
मेरे शिवराज !मेरे शिवराज !


गिरा दो अपनी गाज!
उठा लो अपना गांडीव!
खोल दो अपना तीसरा नेत्र !
और उठा कर कर दो शंख नाद!
जिससे ख़त्म हो जाये -ये उन्माद!
और-
आ जाये हमारी ज़िन्दगी में भी थोड़ी सा स्वाद!
मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

मै हूँ -बेआवाज!
मै हूँ बेस्वाद!
ठस!बुन्देलखंडी निपट गंवार सिर्फ बकवास!
और पहने हूँ फटा लिबास!
कोई नहीं मेरा खास!
मै किसी का नहीं खास !
किसी से नहीं अब आस
बस तुम पे है विश्वास
मेरे शिवराज मेरे शिवराज!

मुझे पता है कि तुम जरूर सुनोगे! मेरी आवाज!!!
मेरे शिवराज मेरे शिवराज!

ठीक कर दो सड़कों को!
शुरू कर दो विश्वविध्यालय का ख्वाब!
दे दो कोई कोई ऐसी सौगात जिससे-
यहाँ भी बन जाए AIIMS जैसा अस्पताल!
हे शिवराज !
बन जाओ हमारी ढाल!
मेरे शिवराज! मेरे शिवराज! 
तुम जरूर सुनोगे हमारे हाल!
हम बेहाल !
ठीक कर दो हमारा हाल
माटी के प्यारे नौनिहाल
मेरे शिवराज मेरे शिवराज ! !'

हनुमान जी को  नारियल चढ़ा कर
विंध्यवासिनी को ज्योति जल कर
और
कमरिया वाले बाबा को चादर चढ़ा कर
मागूंगा तुम्हारे लिए कुछ खास
अपना थूंक गुटक के ,आँसूं पोंछ कर और हाथ जोड़ कर उस ऊपर वाले से फिर मागेंगे तुम्हारा साथ
मेरे शिवराज !मेरे शिवराज!

बुजुर्ग कहते है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

                 
                                     
                              

  बुजुर्ग कहत है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

                    शिवराज काश आप आते तो हम कुछ बताते ?

लवकुश नगर !
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लवकुश नगर नहीं आने की खबर से न सिर्फ भाजपाई नेताओं के चेहरे मायूस हो गए है बल्कि आम जन मानस भी दुखी है की शायद वो आते तो कुछ दे कर जाते वरना क्या है ज़िन्दगी तो कट ही  रही है ?वहीँ कांग्रेसी नेताओं के चेहरे खिल गए है की चलो भाजपा ने सोचा की यह विधान सभा सीट तो पहले से ही विरोधियों के पास है और बेकार की मगजमारी से क्या फ़ायदा जब राजनगर सीट से नातीराजा का जीतना संभावित है। यदि रोड सही होती तो शायद शिवराज यहाँ आ ही जाते परन्तु उड़नखटोले से इस ग्रेनाइट कसबे में शायद ही वह उतरें। पेशों में बल तो उनके भी पड़ गए है जो इस सीट से भाजपा से प्रबल दावेदार है। वो क्या जवाब देंगे जनता को कि शिवराज क्यों नहीं आये ?बुजुर्ग कहते है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

गुरुजन -उनके चरणों की रज को प्रणाम!






उनके चरणों की  रज को प्रणाम-
जिन्होंने-
एक फ़ैली हुई बिथरी मिट्टी को सुन्दर घड़े का आकर दिया,
बहते हुए पानी को बाँध का आकर दिया,
बंद स्याही को विचारों का समग्र रूप दिया-
और-
जीवन को सार्थक बनाया।

मै क्या था ???
एक पानी का बुलबुला जो नहीं जानता था -अपनी ताक़त ?
एक फूला हुआ गुब्बारा जो नहीं जानता था- अपनी उड़ान और उड़ने की दिशा ?
एक उनीदीं आखों का दुरूह स्वप्न जो नहीं जनता था-हकीकत की मेहनत ?
पर.………

जैसे अहिल्या को भगवान राम ने छू कर' तार' कर अभिशाप से मुक्त किया था.
वैसे ही-
मेरे पूज्य गुरुजनों ने.………
हम सभी को तार के.…………….
दिशा और दीक्षा दे कर.…………. बांध लिया है
जन्मों जन्मों के उस अटूट रिश्तों में-
जहाँ आप हमेशा हमारे "द्रोणाचार्य" रहेंगे और
हम आपके "सब्यसाची" "अर्जुन" रहेंगे। "