Wednesday, September 4, 2013

गुरुजन -उनके चरणों की रज को प्रणाम!






उनके चरणों की  रज को प्रणाम-
जिन्होंने-
एक फ़ैली हुई बिथरी मिट्टी को सुन्दर घड़े का आकर दिया,
बहते हुए पानी को बाँध का आकर दिया,
बंद स्याही को विचारों का समग्र रूप दिया-
और-
जीवन को सार्थक बनाया।

मै क्या था ???
एक पानी का बुलबुला जो नहीं जानता था -अपनी ताक़त ?
एक फूला हुआ गुब्बारा जो नहीं जानता था- अपनी उड़ान और उड़ने की दिशा ?
एक उनीदीं आखों का दुरूह स्वप्न जो नहीं जनता था-हकीकत की मेहनत ?
पर.………

जैसे अहिल्या को भगवान राम ने छू कर' तार' कर अभिशाप से मुक्त किया था.
वैसे ही-
मेरे पूज्य गुरुजनों ने.………
हम सभी को तार के.…………….
दिशा और दीक्षा दे कर.…………. बांध लिया है
जन्मों जन्मों के उस अटूट रिश्तों में-
जहाँ आप हमेशा हमारे "द्रोणाचार्य" रहेंगे और
हम आपके "सब्यसाची" "अर्जुन" रहेंगे। "


No comments:

Post a Comment