Thursday, May 3, 2018

किसान की अरदास !

"तुम फरमाते रहो ..
कहानियां अपनी सफलता की ..
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !

तुम सुनाते रहो ...
शोखियाँ मोहब्बतों की ...
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !

तुम बताते रहो ..
बातें देश बदलने की ..
मुझे दो रोटी कमाने घर से निकलना है !

कभी मन करे तो ...
मेरे साथ खेत पे चलना !
दो रोटी कमाने का हुनर ..
तुम्हें भी सिखा दूंगा !! "

Saturday, April 7, 2018

शिकार!

उम्र के इक पड़ाव पर ..
इक शिकार हमने भी किया था !
गोली यहां से भी चली थी ; 
गोली वहां से भी ! 
दोनों मारे गए थे ! 
सजा दोनों को मिली ! 
ज़िंदा दोनों हैं !

Wednesday, April 4, 2018

समय का हिसाब!

"उन पलों को सलाम ...
जो पल बन गए !
और ..हम जिनके सहारे जी गए !
वरना समय का हिसाब ...
कौन रख पाया है ?

समय ; यूँ ही गुज़र जाता हैं ..
मौसमों की मानिंद और ...
हम ठहरे पानी से ...
बुलबुले बन ...
उड़ जाते हैं ...
ज़िन्दगी की तपिश में !"

Tuesday, March 27, 2018

साया!!

"न ये चाँद अपनी चांदनी देगा और न सूरज अपनी तपिश ! ये सब साजिशें हैं ... तुझे गिराने की ! तय कर ...अपनी आग और चांदनी !! वर्ना इस ज़िन्दगी की दौड़ में ... इस राख और बर्फ के खेल में ... कोई जीत नहीं पाया ! हर किसी ने अंततः खोया .. अपना साया !!"

Monday, March 26, 2018

पुच्छल तारा !

"अपनी ...
छुद्र आकाश गंगा का ..
मैं ; इक नन्हा सा पुच्छल तारा !
न चमक ..न रौशनी ...
बस यूँ ही ...
लुढ़कता ढुढ़कता ..
आवारा ..
बेसहारा बंजारा !

पता ही नहीं ...
किसी से रौशनी लेनी है या
किसी को देनी ??
बस गफलतों से भरा सफर ...
मैं इक सिमटता नज़ारा ...
आवारा ,
बेसहारा बंजारा !

अपने वज़ूद की गरमी को ...
समेट कर ..
अपने अंतर्मन की धूल धूसरित दीवारों में ..
एक दिन टकरा जाऊँगा ...
धरती से ...
ठीक उन पुच्छल तारों की मानिंद ...
जो कुछ पल की चमक को ..
पाने की खातिर ...
दो पल चमक कर ..
राख बन ..
बिछ जाते हैं ..
धरती की तलहटी में !

देखना ...मैं भी ;
बिछ जाऊँगा ; इक दिन ...
इसी बाँझ धरती पर और
उर्वरा बीज बनूँगा ...
नव सृजन की संरचना का !"

Friday, February 16, 2018

मोहताज़!

हर रात अकेला हो जाता हूँ ; ऐ चाँद !!
तेरी तरह ..सैकड़ो तारों के बीच !
अपने वज़ूद की तलाश में ;
सोचते सोचते ..

पता है ..मुझे यह अच्छे से !
निज रौशनी से ही प्रकाशित हूँ ; मैं !
वरना मैं भी ..तेरी तरह ..
तारों के रोशन होने का मोहताज़ नहीं !

शुभ रात्रि !
[गौरव !]

Tuesday, February 13, 2018

मुरझाये फूल !! (वॅलिंटाइन से जुड़े ; अनुभव !)

कुछ बुझे हुए दिए !
कुछ सुलगते जख्म !
कुछ रिसते घाव !
कुछ टीस और बेकाबू दर्द के अनुभव !
और
कुछ नासमझ बेवकूफियां ..
ही याद आती हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

कुछ राख के ढेर !
कुछ उजड़े स्वप्न !
कुछ अमावस के चाँद !
कुछ डूबते सूरज !
कुछ भंवर में फंसी नावें और ..
अनगिनित नादानियाँ !
ही ..याद आती हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

सैकड़ों सच्चे कसमें वादे !
सैकड़ों झूंठे हाँ और न !
एक तबाह कॅरियर !
बदनाम तोहमतें !
माँ पापा के ..
स्वप्नों को तोड़ने वाली अपराधी अंतरात्मा !
और ...
शर्म जिल्लत कुंठा के चंद तबाह बरस ..
ही याद आते हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

आर्चिज गैलरी के ग्रीटिंग कार्ड्स !
चिट्ठी के इन्तिज़ार में पोस्टमेन से व्यवहार बनाना !
शीशे में खुद के अक्स !
संतोषी माँ और सोमवार के व्रत !
दूरदर्शन के चित्रहार में रेखा अमिताभ या विनोद मेहरा के फ़िल्मी गानों की यादें !
और
गुज़रे वक़्त की अनगिनित गुज़री यादें ..
ही याद आती हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

एक समझौता !
समझदारी और परिपक्वता !
संस्कार !
जीवन मूल्य !
अमर प्रेम !
किस्मत !
और ईश्वर की मर्ज़ी ..
ही याद आते हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

बड़े होते बच्चे !
उनकी वही अदाएं ..
जो कभी मेरी थी !
मैं ; एक चिंतित पिता !
और उमड़ते घुमड़ते उम्र के ..
काले घने बादल !
मेरा उम्र के साथ ..परवान चढ़ता ..
शक का चश्मा !
ही याद आते हैं ;
उम्र के इस पड़ाव पे ..
१४ फरवरी -
वेलेंटाइन डे -के दिन !

(गौरव !)

Tuesday, January 30, 2018

जीवन प्रवाह! प्रकृति संग ये इंसान का शुभ विवाह !

हर बसंत ..
उजड़े झुके जीर्ण शीर्ण वृक्ष ..
और सूखी हुई टहनियां ..
तलाश ही लेती हैं ;
ओस की चंद ..
भीगी हुई बूंदें और ..
बाँझ हो चुके धरातल पे ..
आ जाती है ; नमी ..
रुमानियत बनकर ..
बसंती महक के साथ !

कुछ कुछ ..
इंसानों जैसी फितरत पाले ..
ये ठूंठ बनते नंगे पेड़ भी ..
तलाश ही लेते हैं ;
जीवन बीज ...
ज़िंदा रहने को ...
बेवजह ..
बसंत-हेमंत के नाम पे !

नंगे पहाड़ों पे -
दो चार खजूर के कंटीले पेड़ !
मरुस्थल में ..केक्टस के पौधे !
खारे समुन्दर में ..छोटा सा टापू !
नदी किनारे ..सूनी कश्ती और ..
उम्रदराज आँखों में ..
बिछड़े जीवन साथी की ..
लोप होती स्मृतियों से ..
सूखी हुई पोरों में ...
पथरा गए आंसू !
सब कभी ..
लहलहलाते बसंत के जीवंत गवाह थे ...
जो आज ..
कुम्हलाते बसंत के मूक साक्षी !

सच ...
कितना भयावह है ...
ये जीवन प्रवाह!
प्रकृति संग ये इंसान का शुभ विवाह !

(Gaurav! )

Sunday, January 14, 2018

पतंगों से ख़्वाबों की दोस्ती !

"पतंगें ..बनेंगी तो उड़ेंगी भी !
इंसानी ख्वाब ..बुनेंगें तो उड़ेंगे भी !
और ऐसा ..चलता ही रहेगा !
युगों युगों तक !!

"पतंग और ख्वाब" -
एक दिन 'ज़मीन' पर भी आएंगे !!
कोई उन्हें 'कटना' कह ले ..
या 'डूबना' अथवा 'हारना' !
ये तो चलता रहता है और ..
चलता ही रहेगा ..
बेरोकटोक!!

जब तक 'आकाश' में और ..
'फेफड़ों' में ...
'हवा और जान' है ..
ये ही 'इंसानी जूनून' और ..फितरत की .. अमिट पहचान है !

बस इतना है ..
सम्भल कर उड़ाव  ..
'पतंग' और बुनो 'ख्वाब'!
जो महका सकें ..
अपना घर और अपना महताब !! "
(Gaurav! )