"पतंगें ..बनेंगी तो उड़ेंगी भी !
इंसानी ख्वाब ..बुनेंगें तो उड़ेंगे भी !
और ऐसा ..चलता ही रहेगा !
युगों युगों तक !!
"पतंग और ख्वाब" -
एक दिन 'ज़मीन' पर भी आएंगे !!
कोई उन्हें 'कटना' कह ले ..
या 'डूबना' अथवा 'हारना' !
ये तो चलता रहता है और ..
चलता ही रहेगा ..
बेरोकटोक!!
जब तक 'आकाश' में और ..
'फेफड़ों' में ...
'हवा और जान' है ..
ये ही 'इंसानी जूनून' और ..फितरत की .. अमिट पहचान है !
बस इतना है ..
सम्भल कर उड़ाव ..
'पतंग' और बुनो 'ख्वाब'!
जो महका सकें ..
अपना घर और अपना महताब !! "
(Gaurav! )
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