Tuesday, December 31, 2013

Happy New Year!


"जब तेरी इनायत पे मेरी नज़र जाती है, 
मेरे मालिक! मेरी आँख भर भर आती है। 
तू दे रहा है मुझे इस कदर कि -
हाथ दुआ में उठाने से पहले ही,
झोली मेरी भर जाती है। "

नव वर्ष की दिल से शुभकामनाएँ !

Sunday, December 29, 2013

केजरीवाल -अर्जुन हैं -अभिमन्यु नहीं !

"डर केजरीवाल को भी लगा होगा?
नींद केजरीवाल कि भी उडी होगी?
सपने केजरीवाल के भी टूटे होंगे?
एक बार अपने बच्चों-बीवी को केजरीवाल ने भी देखा होगा ?
और सोचा होगा -
कहीं मैं गलत तो नहीं कर रहा हूँ ?
कहीं मैं -सब कुछ खो तो नहीं दूंगा कि मेरे बच्चे संघर्ष करें ?
क्यों कि -
लड़ाई -
भारत की एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के नेतृत्व से थी !

पर.…
केजरीवाल को याद आया होगा -
महाभारत में अर्जुन का बेटा -अभिमन्यु!
जो-
ऐसे ही लोगों के बीच चक्रव्यूह में फंस गया था!
और -
मारा गया था।
लेकिन-
केजरीवाल को भरोसा था-
अपनी सोच पे।
अपने सपनों पे।
अपने पंखों पे।
और-
अपने अपनों पे।

और उस सीधे-साधे से सनकी टाइप के अक्खड़ इंसान ने -
बिना जीन्स-टी -शर्ट पहने-
बिना अपनी शर्ट को पैंट के अंदर खोंसे -
बिना महंगे मोबाइल से बात किये-
उखाड़ फैंक दी-
उस शीला की सरकार को जिसने -
सपने में भी नहीं सोचा था-
नियति की इस करवट को।

और केजरीवाल बन बैठे आदर्श उन युवा स्वप्नों के-
जो टाटा-अंबानी -बिरला नहीं है पर,
उनके पँखों -परवाज में उड़ने कि चाहत है।
और अपने स्वप्नों को साकार करने की जिजीविषा है।

एक आम आदमी ने दिखा दिया कि -
ज़िन्दगी में कुछ भी असम्भव नहीं है।
बस-
कुछ कर गुजरने की भूख होनी चाहिए।"

केजरीवाल ने दिखा दिया कि वह -
अभिमन्यु नहीं हैं जो जो चक्रव्यूह को भेद नहीं पाएँगे बल्कि वे
साबित करेंगे कि वे -
महाभारत के सुपात्र -अर्जुन है !"

केजरीवाल -अर्जुन हैं -अभिमन्यु नहीं !

इसी का नाम ज़िन्दगी है।

कैसे न जाने कैसे?
बीत गया वो वक़्त!
जब जीवन एक संगीत था!
मै किसी का गीत था!
और कोई मेरा मीत था!

हवा का बहना किसी को याद करने का पलके मूंद कर इक बहाना था !
पानी का बरसना किसी को किये वादों का निभाना था !
धूप का खिलना सपनों का सच होना था !
इंद्रधनुष का खिलना किसी का मेरे लिए संवरना था !
और.……
रात का आना सुबह का इंतज़ार होता था !

कैसे सारे मायने बदल गए।
कैसे सारे फलसफे बदल गए।
कैसे सारे ख्यालात बदल गए।
और-
सच मैं बदल गया।

बदलने चला था दुनियां को !
बदलने चला था प्रेम को-उसकी अगन को !
बदलने चला था अपनी लगन को!
और बदल गया मैं !

खैर कोई बात नहीं।
इसी का नाम ज़िन्दगी है।
जहाँ सिर्फ खुदा कि बन्दगी है।
और बाकी सब -सादगी है।




Thursday, December 12, 2013

लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मुझे नहीं मालूम वो पथ-
और न है मेरे पास कोई ऐसा रथ -
जो ले चले मुझे-
तुम्हारे पास !
जहाँ है तुम्हारा निवास-
तुम्हारे विधायक बन जाने के बाद।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

बस-
मुझे यह मालूम है कि-
मैं गरीब था -
मैं गरीब हूँ-
और.…
गरीब रहूँगा।
 लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

कुछ दिनों के लिए बन गया था तुम्हारा खास।
तुम को मुझ से थी कुछ आस।
और अब जब पूरी हो गई है तुम्हारी वो आस-
अब तुम आ गए हो अपने असली लिबास।
बता दी है मुझे मेरी दो कोड़ी कि औकात।
और अब मैं !
तुम्हारा मतदाता!
तुम्हारा चार दिनों का भगवान् !
बन गया हूँ चलती फिरती लाश।
बदहवास ……
एक बार फिर तुम से ठगा हुआ-
तुम्हारा आम ओ खास !
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

बस,ऑटो,टेम्पो में चलता हूँ-चलता था ;
और
चलता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मालूम है ?
मुख्यमंत्री और कलेक्टर से भी बड़ी औकात -
मेरे गाँव के पटवारी और थानेदार कि है जो-
खिसका सकता है मेरी जमीन-
या फंसा सकता है मुझे कोई गांजा के फर्जी केस में-
मैं ऐसा मानता हूँ।
मानता था और
मानता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!


मालूम है ?
मैं राशन की दुकान के सेल्स मैन को "अन्न दाता"
मानता हूँ।
कोई सरकार का मुलाजिम नहीं जो-
अपना कर्त्तव्य कर मुझे राशन-पानी दे रहा हो।
बस उसकी दया और सह्रदयता से ही-
मेरा और मेरे बच्चों का पेट पल रहा है।
इसी कारण मुझे हर बार उसे-
घूंस देनी पड़ती है और ख़ुशी ख़ुशी देता हूँ।
देता रहा हूँ और-
देता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मालूम है ?
चाइना मोबाइल मेरे पास भी है।
छः सौ रुपए में आया।
और मैं!
मैं तुम्हारा अमूल्य मतदाता!
उस मोबाइल फोन से बात कर के या उसे-
अपनी फटी जेब में रख कर-
बहुत खुश हूँ कि चलो-
यह सपना तो सच हुआ।
कम से कम चीनी मोबाइल तो -
अपना हुआ !
देसी मोबाइल न सही विदेशी मोबाइल तो अपना हुआ।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

थक गए होगे ?
एक महीने "आयोग" ने बेफालतू में बहुत मेहनत करवाई!
पूरे क्षेत्र की झाड़ू लगाने में-
पांच किलो घट गया वजन और-
अब कुछ दिनों के लिए -
स्वास्थ्य पे ध्यान देना पड़ेगा !

मैंने भी तुम्हें देखा था!पूरे पांच साल बाद ?
हलकी सी उमर दिखने लगी है?
फिर अब उम्र भी तो बढ़ रही है?
एसी गाड़ी में बैठ कर,
मिनिरल वाटर पी के,
वाकई चुनाव में बहुत मेहनत पड़ गई।
खैर कोई बात नहीं -
जीत तुम्हारी हुई।
 लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

अलविदा !
फिर मिलेंगे !
पांच साल बाद !

अपना ध्यान रखना!
पांच साल बाद कहीं ऐसा न हो कि -
डाइबिटीज और हार्ट -अटैक के साथी हो जाओ और-
और हम शोक सभा करें कि-
बिचारे!
अच्छे आदमी थे!
भला नहीं किया तो-
किसी का बुरा भी नहीं किया !
फिर-
क्षेत्र में -
विकास कोन कराता है ???
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

Monday, December 2, 2013

ख़त !



"ऐ ख़त जा उनके हाथों को चूम ले 
जब वो पढ़ें तो -उनके होठों को चूम ले 
अगर वो फाड़ भी डालें  …। तो उनके क़दमों को चूम ले!"