Monday, August 26, 2013

"मुगलेआजम" आप जीत गए।

"मुगलेआजम" आप जीत गए।
बहुत बहुत बधाई।

कल कितनी चमक थी,
आपकी आँखों में  …………।
बिलकुल कुछ कुछ-
'दुर्गा शक्ति' को आपके द्वारा हराने के बाद  …।
कुछ ऐसे ही चमक थी आपकी 'आँखों' में।

कल टीवी पे ऐसा लग रहा था-
जैसे आपने सारा संसार जीत लिया हो!
या फिर -
सारे संसार के लोगों की आपने अपनी ऊँगली पे धरती थाम  के रक्षा कर ली हो !
या फिर -
"बाबर" फिर से विश्व विजेता बन गया हो।  
या फिर-
"दुर्गा शक्ति" की नौकरी छिन गई हो।
सच -
"सत्य" में बहुत "शक्ति" होती है और.…. 
आपने यह कर दिखाया।

कभी कभी तो यह लगता है की -
यदि आप पाकिस्तान में होते तो-
"सदर" ए पाकिस्तान होते !
और अफ़ग़ानिस्तान में होते तो-
वहां के राष्ट्रपति की तो छुट्टी ही समझो !
पर.…
उत्तर प्रदेश में ???

खैर वाकई तारीफ की बात है -
अपने कल उत्तरप्रदेश को थामा,
सरयू नदी को लहू लुहान होने  बचाया,
धर्म को निर्पेच्छ रखा,
और सच.…
अपना सब कुछ निछावर कर दिया।

सच! अगर आप जैसे कुछ और नेता हो जाये तो-
वाकई-अगले चुनाव में -
केंद्र में आपकी सरकार पक्की समझो।
और.………….
फिर तो सारे देश में ?
अपनी  धरम निर्पेछता की घुट्टी  ???

आमीन आमीन आमीन !

Tuesday, August 20, 2013

वफ़ा!!



ज़िन्दगी को जान लेने के बाद कह सकता हूँ कि -

"टूटे हुए प्यार में भी
वफ़ा होती है।

अब कभी न मिलने की वफ़ा ।
अब कभी याद न करने की वफ़ा ।
अब कभी उस गली-ओ-शहर से न गुजरने की वफ़ा जहाँ "तेरा" ठिकाना था ।

चिट्ठियों को जला के राख कर देने की वफ़ा।
यादों को आँखों के फलक से मिटा देने की वफ़ा।
और वादों को झुठला देने की वफ़ा।

कभी अकस्मात मिल जाने पे "अजनबी " बन जाने की वफ़ा।
कभी अकेले में मिल जाने पे "हदें" न लांघते हुए मुस्करा के निकल जाने की वफ़ा।
और बस मन ही मन में भगवान के सामने "इक-दुसरे" की सलामती की दुआ मांगने की वफ़ा ।

सच.…………………
"वफ़ा" प्यार पाने में भी है।
वफ़ा प्यार खोने में भी है।

"प्यार" पाने में पूरे जन्म भर पूरी "शिद्दत" से  प्यार निभाने की वफ़ा!
और.…………….
"प्यार" खोने के बाद-
पूरे जन्म भर पूरी "शिद्दत" से अपने "प्यार" को अपना "राज" बना के सीने में दफ़न करने की वफ़ा!
और.………………….
अगले जन्म फिर मिलने की दुआ करने की वफ़ा। "


Monday, August 19, 2013

इक जमाना था जब!

इक जमाना था जब-


तेरी चुनरी तेरे रुमाल और तेरी चिट्ठियो को रखता था अपनी जान से भी ज्यादा संभाल के।

इक जमाना था जब-
तेरे दाँतों से काटी प्याज का इक टुकड़ा झूठा खाने का अपना मजा था।

एक जमाना था जब-
तेरे ख़त तेरे ग्रीटिंग कार्ड और फोटो जब बिस्तर पे साथ सोते थे तो लगता था ज़िन्दगी सँवर गई।

एक जमाना था जब-
तेरी फोटो तेरे नाम पे सिन्दूर लगाया था तो ऐसा लगा था जैसे तू मिल गई।

एक जमाना था जब-
तेरे शहर से निकलता था तो लगता था जैसे जिंदगी की हद मिल गई।

एक जमाना था जब-
पहली बार तेरी गिरती हुई चुन्नी को हक से उठा के डाल दिया था तेरे कांधों पे और आँख पे बार बार आती जुल्फों को संवार दिया था पीछे की ओर -
तो लगा था जैसे नब्ज थम गई।

पर.…………………………….
अब न वो जमाना है।
न वो फ़साना है।
न वो दीवाना है।
बस.………
कह-कहा लगाना है।
छटपटा के बताना है।

'प्रेम' सिर्फ 'ज़िन्दगी' गंवाना है।
'कसमे-वादे' का 'फलसफा' पुराना है।
'नजदीकियाँ' तो सिर्फ 'इक' बहाना है।  



Thursday, August 15, 2013

एक शाम शहीदों के नाम -

एक शाम शहीदों के नाम -


सुनने में अच्छा लगता है
बोलने में अच्छा लगता है
और.…….
एहसास करने में -सुकून देता है कि -
चलो हमने अपना कर्तव्य निभाया और
दे दी अपनी श्रृद्धांजलि उन लोगों को
जिन्होंने कभी किसी ज़माने में
६७ साल पहले  ……
इस देश के लिए कुछ किया था।

असल में हम भूल गए हैं -उन  "कुछ लोगों की शहादत  " को !
और कहते -सोचते है कि -
ऐसा क्या किया था -उन लोगों ने ?जो हम उन्हें हर साल याद करें ?
ऐसा क्या दिया था उन लोगों ने ?जो हम उनका गुणगान करें ?
उनका तो यह कर्तव्य था -तो किया?
कोन सा बड़ा काम किया ?
हम होते तो हम भी करते ?

असल में हम बहुत अहसान फरामोश हो गए है -
देश के शहीदों की तो बात ६७ साल पुरानी हो गई  -
हम तो अपने पिता से भी कहने से नहीं चूकते कि -
आपने किया क्या है?
पैदा कर दिया तो -कोन सा बड़ा काम किया ?
पाला-पोसा  और पढाया?
वो तो आपका फ़र्ज़ था?
वरना  ……. क्या है?
ज़िन्दगी तो सभी जीते है ?
हम भी जी लेते !

वास्तव में  हम  नहीं जानते है कि -

  • देश के लिए "प्राणों" की आहुति देना क्या चीज होती है?
  • गोरों की गोली छाती पे खाना क्या होता था ?
  • अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना कितना बड़ा जुर्म होता था ?



और  …….

  • अपने सपनों को अपने देश के हित के लिए खंडित कर चूर -चूर कर देना क्या होता था ?


और  हमने बिसरा दिया है कि  -

  • सन ४७ में उन विधवाएँ को जिनमे  इक-चौथाई  से अधिक ने अपने पतियों को अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए खोया था। 
  • कि -उनकी चूड़ियों के टूटने पे भी क्रंदन होता था,सपने टूटते थे  और पिता बिछड़ते थे ?

और -

  • आंसूं उनके भी नहीं रुकते थे -वो भी इंसान थे -उनके भी जज्बात थे -उनकी भी आरजू होती थी -और उनके भी हमारी तरह दिल था -दिमाग था। 

पर। ……
अपने देश के खातिर -
उस समय की विधवाओं ने-

  •  चुडिओं को कांच समझा। 
  • पुत्रों ने पिता को शहीद समझा।
  • बहनों ने अपनी राखियों को समेट कर  अपनी मुट्ठियो में भींच लिया।
और

  • युवाओं ने अपने सपनों को -आज़ादी समझा !
आपको अहसास है कि -
युवा दिल उस समय भी धड़कते थे।  
युवा मन के सपने उस समय भी परवाज उड़ते थे।  
प्रेम के अंकुर उस समय भी फूटते थे। 
और.................. 

  • उस समय की वफाओं का जज्बा आज की वफाओं से कहीं बेहतर होता था!
  • उस समय की मोहब्बत रूहानी ताक़त होती थी -आज की युवा सोहबत नहीं!
और
  •  उस दौर के "सात फेरे" -'सात जन्मों' का 'बंधन' होता था -आज जैसा 'सात सालों' का 'मनमौजी' रिश्ता नहीं !
पर.……. 
मित्रों !उस दौर के अनाम लोगों ने 
अपने सारे सपने,सारी कसमें,सारे वादे,सारे बंधन निछावर कर दिए -
उस देश की आज़ादी के खातिर जिसे हम आज -"इंडिया" या "हिन्दोस्तां" कहते है !
आओ नमन करें उन्हें  ........ 
जिनके प्रयास से हम आज सांस ले रहें है-आजादी की। 

हे मेरे बिछड़े स्वतंत्रता सेनानियों!
चरणपादुका (सिंघपुर) के बलिदानियों!
शत शत नमन। 
शत शत नमन। 
नमन उस त्याग को। 
नमन उस बलिदान को।