Monday, August 19, 2013

इक जमाना था जब!

इक जमाना था जब-


तेरी चुनरी तेरे रुमाल और तेरी चिट्ठियो को रखता था अपनी जान से भी ज्यादा संभाल के।

इक जमाना था जब-
तेरे दाँतों से काटी प्याज का इक टुकड़ा झूठा खाने का अपना मजा था।

एक जमाना था जब-
तेरे ख़त तेरे ग्रीटिंग कार्ड और फोटो जब बिस्तर पे साथ सोते थे तो लगता था ज़िन्दगी सँवर गई।

एक जमाना था जब-
तेरी फोटो तेरे नाम पे सिन्दूर लगाया था तो ऐसा लगा था जैसे तू मिल गई।

एक जमाना था जब-
तेरे शहर से निकलता था तो लगता था जैसे जिंदगी की हद मिल गई।

एक जमाना था जब-
पहली बार तेरी गिरती हुई चुन्नी को हक से उठा के डाल दिया था तेरे कांधों पे और आँख पे बार बार आती जुल्फों को संवार दिया था पीछे की ओर -
तो लगा था जैसे नब्ज थम गई।

पर.…………………………….
अब न वो जमाना है।
न वो फ़साना है।
न वो दीवाना है।
बस.………
कह-कहा लगाना है।
छटपटा के बताना है।

'प्रेम' सिर्फ 'ज़िन्दगी' गंवाना है।
'कसमे-वादे' का 'फलसफा' पुराना है।
'नजदीकियाँ' तो सिर्फ 'इक' बहाना है।  



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