Thursday, March 31, 2016

ज़िद्द!

ज़िद्द "शरीर" की होती..
तो हार क़ुबूल होती...
पर हमारी ज़िद्द तो...  मुक्कदस "दिल" की उपज थी....
जिसके लिए जिस्म जरूरी नहीं था!

काश!
समझ सकते वे हमदर्द हमारा दर्द.....
जो देखते....
या तलाशते थे....
हम दोनों में -
"उन्माद और उच्छृंकलता" का दोहरा चरित्र चित्रण...

कोई कैसे समझाए उनको -
प्रेम का अंत -"दो बून्द" नहीं है...
प्रेम का अंत -"ऊँचे" हिम शिखरों को...
झीने दुपट्टे से.
अनावृत करना नहीं है... प्रेम का तात्पर्य -
"स्पर्श बोध" नहीं है... या
प्रेम का "चरम" वहशियाना नहीं है...

प्रेम को क्यों तौलते हो उस तराज़ू से
जिसमें -
"जिस्म का पसीना" भारी पड जाता है... "आँखों के आंसुओं" पर!

खैर!
जिसने प्रेम को सशंकित किया..
वे आज भी
"हारी हुई बाज़ी" के साथ बैठे हुए हैं.. और
वहीँ हम दोनों..
अपने वचनों पर अडिग..
अपने प्रेम पाश में अविचलित...
अपने सौंदर्य बोध पर कायम...
निर्भीक.. निश्छल.. और निष्पाप हो चलते जा रहे हैं ख़ुशी ख़ुशी...
निष्कलंकित!

मुझे पता है...
इतने लम्बे बीस वर्षों के अर्से के बाद...
जब कभी भी मिलोगी....
तो तुम्हारी आँखों में... मेरे लिए...
नफरत की जगह... पाकीजगी होगी!
क्यों की...
हमने अपने प्यार में...  साबित की है...
सरलता.. सभ्यता.. सौम्यता और पाकीजगी!

मुबारक हों -तुझे तेरे रास्ते और...
मुकम्मल रास्तों पर मेरा सफर भी चलता रहे...
बिन तेरे!
खुदा हाफ़िज़!

Wednesday, March 30, 2016

पुराने दरवाज़े कुछ कहते हैं !

पुराने दरवाजों से  ...
अब
डर लगने लगा है  ....
समय के साथ साथ।

हर साल वार्निश कर के नया करने की कोशिश में ;
ढूंढता हूँ इन दरवाजों में अपने पिता का अक्स  ...
जो कभी थे -
मेरे दरवाज़े।

चिटके हुए किवांड  ...
जिनकी झिर्र में से  ...
दिखने लगा है  ...
एक पूरी ज़िन्दगी का लब्बो-लुआब ;
अक्सर -
अहसास कराते हैं ;
मेरे चिटकने का या  ...
मेरे निपटने का  ....
ठीक दरवाज़ों जैसा ,
क्यों कि -
अब मेरी वार्निश करने वाले हाँथ भी  ....
बिछड़ गए हैं -
चिटक के  .....
या छिटक के  ....
सदा सदा के लिए।

दरवाज़े अब -"चूं" "चूं " की आवाज़ भी करने लगे हैं  ...
ठीक मेरी हड्डियों के जैसे  ...
इतने साल से अनवरत  ...
चलते चलते या -
ढलते ढलते।

लेकिन कई बार  ...
इस बुढ़ापे में भी  ...
दरवाज़े से अनेकों हवाओं ने  .....
भीतर आने की गुंजायश तलाशी  ....
पर
हर बार -
जर्जर होते दरवाजों ने  ....
अपने पूरे जी ओ जान से  ...
ठीक मेरे पिता की तरह ;
रोक दिया उन्हें  .....
बाहर ही जो  ;
कर सकते थे  ....
ज़िन्दगी ;
तहस नहस  ....
भीतर घुस कर।

आज पिता नहीं हैं  ....
पर
मैं उनका बेटा  ...
दरवाजा बन  ...
खड़ा हुआ हूँ ;
ठीक उनकी तरह  ....
जैसे कभी वे भी  ... 
खड़े रहते थे ;
मेरा दरवाजे बन।

खुशनसीब हैं -वे-
जिनके-"दरवाज़े" सलामत हैं ;
और उनकी चाहरदीवारी बन  ...
बैठे हुए हैं -
पुराने तख्त पर -
दादाजी या पापाजी बन।

हम तो तस्वीरों में ही  ...
देख लेते हैं  ...
अपने बिछड़े दरवाज़ों को और -
आँखों में तरलता लिए  ...
पौंछ लेते हैं ;अपने आंसूं  ...
वर्ना -
कहीं बच्चे न पूंछ बैठें- कि -
पापा !आप रो रहे हैं ?
क्यों ???

(गर्वित गौरव !)


Friday, March 25, 2016

यादों की होली!

होली के खुमार उतर  जाने के बाद -
आज चाँद भी...
बहुत खामोश है...
आसमान भी...
तन्हां तन्हां सा...
दिख रहा है ;
ठीक मेरी तरह -
नस्तनाबूत!

होली के रंगों के बीच..
आज भी...
इतने बरस बाद...
अक्सर...
तुम छिटक आती हो -
डूबते सूरज की लालिमा लिए...
और होली के बाद...
रंगों के मानिंद...
फिर खो जाती हो ...
फिर अगले बरस
यादों की होली
खेलने के लिए! "

"हर बरस...
यादों की होली...
खेलने के लिए -
बधाई!"

Thursday, March 24, 2016

रंग और संग!

रंग और संग!

आओ उकेरे...
कुछ और रंग...
ज़िन्दगी के रंगमंच पर अपनी तूलिका...
को थाम कर!

कुछ फीके फीके से... उम्र के साथ...
पकते हुए रंग...
जो एक दम से...
आ गए हैं सर पर.... सफेदी की चादर ओढ़ कर!

कुछ शिथिल शिथिल सी......
जर्जर होती काया का.... ढला ढला सा...
गेहुआं सा...
उम्र का...
पका पका सा...
कुछ थका थका सा रंग...
जो अपनी बदरंग होती काया का...
शास्वत स्वरुप है!

कुछ भूरे भूरे से...
धुंआ धुंआ से...
अपने जीवट को समेटे...  घुटनों के दर्द को लपेटे...
अम्मा-बाबूजी या
दादा-दादी की चादर ओढ़े...
वानप्रस्थ के उड़ते उड़ते ध्वजवाहकों के दर्द को उकेरते रंग!

कुछ देशद्रोह के विपलवकारी रंग...

कुछ देशप्रेम के सृजनकारी रंग...

कुछ सफ़ेद बर्फ जैसे सियाचीन के शहीद रंग...तो ....
कुछ
आज़ादी को शर्मिंदा करते "लाल सलाम" रंग!

इन रंगों ने बन कर खिजाब....
लपेट लिया है इंसानी मुखौटा और झटक कर फेंक दिए हैं -
मोहब्बत के खुशनुमां चेहरे...बहुत दूर...
कसमें-वादों के गमगीन
चेहरे...बहुत दूर...
श्रवणकुमार की मातृ-पितृभक्ति वाले चेहरे बहुत दूर...
और
रंगों में तेज़ाब मिलाकर बना दिया है..ज़िन्दगी की किताब को -बेरंग!

किस  रंग से खेलूं... होली ग़ालिब?
हर रंग नुमाइंदा है... इंसानी फितूर का!

फिर चाहे मोहब्बत हो या खुदाया बन्दिगी...
रंगों ने जिस्म की खाल को जकड़ लिया है -हुकूमत बन!

हक़ीक़त में सब बकवास है...
रंग सिर्फ ज़िन्दगी की -"आस" है..
एक ख्वाब...
एक जज्बाती विश्वास  है...
जिसमें हम अक्सर ढूँढ़ते ईश्वर का वास है!

Tuesday, March 22, 2016

इस होली!

����

इस होली-
सम्बन्धों को...
अनुबन्धों को...
परिभाषाएँ देनी होंगी!

होठों के संग...
नयनों को भी कुछ...
भाषाएँ देनी होंगी!

सूनी सूनी सी..
खलिश खलिश सी....
तपन भरी बुज़दिली में...
भारत माता को-
"भारत माता की जय!"
की....
आशाएं देनी होगी!

Happy Holi!

राष्ट्रवाद को समर्पित इस  बार की होली!
सिर्फ तिरंगा!
"सिर्फ एक रंग जो बना है -मिलकर तीन रंग -मेरा तिरंगा! "
HAPPY HOLI!

Sunday, March 20, 2016

अर्धनारीश्वर से दिल की बातें !

ओ शास्वत सत्य !
ओ अर्ध्य सत्य !
ओ जन्म और मृत्यु के सृजक !
ओ कालजई !
ओ अनाम परछाईं !
कितनी उपाधियाँ और कितने नाम दूँ ;तुम्हें  ?
पर
भगवान नहीं कहूँगा।
और
बातें करता चला जाऊँगा  .....
बेतुकी  ....
बेतकुल्लफी के साथ ;
क्यों कि
अब मेरा -तुम से  ....
कुछ ज्यादा -स्वार्थ बचा नहीं।

और जब स्वार्थ न रहे  ....
तभी मोहब्बत -
अपना मुकाम  ...
हासिल करती है।

मुझे नहीं पता तुम हो के नहीं ?
कभी न देखा न सुना ?
कभी न तुम खुद मिले न बुलाया ?
बस यूँ ही  ...
देखा था तुम्हें -बचपन से  ...
अपने घर के -पूजा घर में  ... तो
पूजता और  मानता चला जा रहा हूँ ;मैं भी  ;
इस अंतहीन यात्रा के लम्बे सफर में
पथिक बन के  .....
कि यकीनन -
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर  ....
तुम खुद आओगे  ....
मुझसे मिलने और
कहोगे कि -
कैसा रहा यह सफर ????

पर हे मेरे प्रश्न चिन्ह !
कभी तो उत्तर दे दिया करो ;
अपने वज़ूद का  ....
अपने आकार का ?
अपने लिबास का ?
जब दुनियां तुम्हें ही
प्रश्न चिन्ह लगा कर पूंछने लगे कि -
आप कौन ?

अब बहुत दिन हो गए -
सुनते सुनते कि -
राजा राम ने अवतरण लिया था इस पृथ्वी पर ;
या किशन कन्हैया ने कभी बांसुरी भी बजाई थी ;
पर -
अब ये किस्से थोड़ा पुराने हो गए हैं और   ...
प्लीज -
एक बार दुबारा आकर  ...
लगा दो हम जैसे अनगिनित लोगों के -
मुह पर -पूर्ण विराम !

अगर आप -अल्ल्हा मियां ,गुरुनानक साहिब और जीजस महोदय
सब एक हैं [
और
ऊपर आप जैसे लोगों का कोई -यूनियन है ;
तो हमें भी तो बताओ ?
हम बेफाल्तू में लड़ लड़ कर
मरे जा रहे हैं ?

फिर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि  -
आप  किस  पार्टी में हैं या -
आप आरएसएस के साथ हैं या वामपंथियों के साथ ?
मुझे तो बस इतना मालुम है कि -
आपके पास -
हमारा रिमोट कंट्रोल है और -
वही होता है -जैसा  ....
आप चाहते हैं।

रही बात मेरी  तो -
हे मेरे शंकर !
थोड़ा परेशान हूँ  ...
थोड़ा सशंकित और थोड़ा डरा हुआ कि -
वक़्त कम ही बचा है  ...
पेपर देते देते  ....
ज़िन्दगी निकल गई है  पर
रिजल्ट नहीं खुला !

देखना मेरे शंकर !
मेरे शम्भू !मेरे महा देव !
सपने ;सपने न रह जाएँ !
दूसरी पीढ़ी  .....
फिर मेरे जैसे  .....
सपने न बुने  ..... पर
मेरे सपनों में -
हकीकत के रंग भरें।
और
उस रंग भरी सफलता के -
पूजा घर में  ....
तुम्हारी तस्वीर के नीचे  ...
किसी कोनें में ;
तुम्हारे चरणों की धुल तले  ...
कहीं मेरा बेटा ;
एक दिया ;
मेरे नाम का भी -
उदीप्त कर रहा हो  ...
इस भाव से कि -
उसके पापा ने  ...
अपना कर्तव्य किया !!!

कभी समय मिले -
तो अहसास कराना कि -
तुमने मेरी चिट्ठी पढ़ ली है और -
जल्दी ही मेरा रिजल्ट भी
लौटती डाक से
भेज रहे हो !

आपका हमेशा -
शानू !


Saturday, March 19, 2016

दो बूँद आँखों की.. समुन्दर पर भारी!

दो बूँद आँखों की.. समुन्दर पर भारी!

मेरी यादों में समाने वाली...
ओ अनाम हस्ताक्षर!!
कितने धीरे से...
अपनी आँखों की दो बूंदों से...
धो डाला है ;
तुमने मेरा वज़ूद!

माना की...
"मेरी-तुम्हारी" या "हमारी" कहानीँ में.... 
कुछ लम्हें...
कसक भरे रहे होंगे...  लेकिन...
कुछ भी -
कड़वी यादों जैसा न होगा!

इतनी छोटी...
किन्तु लम्बी यात्रा में...  ;
मेरे साथ...चलते चलते  ....
कभी हवा के झोंके से भी...
तुम्हारी चुनरी तो सरकी नहीं?
जुल्फें तो बिखरी नहीं?  या फिर -
मेरी शाखों से कोई भी पत्ता...
तेरी तरफ तो उड़ा नहीं?
फिर कैसे -
तेरी दो बूंदों ने धो डाला ;
एक मेरा पूरा वज़ूद?

तुम्हारी आँखों के दो आंसू...
बन गई बहती नदी की  वे उच्छृंकल लहरें...
जो अपने बाढ़ के उफनते उन्माद में.... 
भिगो गई...
किनारे के...
मेरे जैसे...वे पत्थर...
जो बिचारे खड़े थे ; निर्विकार निरुद्देश्य!

फिर तुमने बदल डाली अपनी रफ़्तार...
और तोड़ कर...
अपने तटबंध...
चली गई तुम...
फिर कभी न लौट कर आने को....
अपने-पुराने सूखे-बेडोल निराकार.... पत्थरों के पास!

प्रिये!
कभी आना...
अपनी पुरानी पगडंडियों पर...
तो देखना की...
"बेसरम" के या "जंगली केक्टस" की मानिंद...
या "अहिल्या की मूर्ति" जैसे...
आज भी -
"तुम्हारे पत्थर"
पड़े हुए है...
वैसे ही...
जैसे तुम...
अपनी -दो बूंदों से... भिगो कर...
छोड़ कर गई थी!

बस इन्तिज़ार है...
अगले जन्म का...
जब -तुम आओगी.. और...
अपने पत्थर को... 
अपने शाश्वत स्पर्श से...  पुनर्जीवित करोगी!

ओ मेरी नदी!
आओगी न?

Thursday, March 17, 2016

पिता! आपके साथ बहुत कुछ करने का मन करता है...

पिता

वक्त के साथ वृद्ध होते पिता,
तुम्हें देखकर,
सभी घड़ियाँ तोड़ने का मन करता है,
ये जो छोटी मुश्किलें
तुम्हारे बड़े जीवट को पस्त करने लगी हैं,
अपने सब सपनों में
तुम्हारी उम्र सहेजने का मन करता है,
अब बहुत से काम मैं कर सकता हूँ,
जो तुम नहीं कर पाते,
तो ये सारी कामयाबी फेंकने का मन करता है,
देर से लौटने पर अब
तुम क्यों नहीं पूछते देरी का कारण,
तुम्हें बहुत से जवाब देने का मन करता है,
तुम्हीं मेरे नायक हो
और सफलताओं के सर्वोच्च प्रतिरूप,
नहीं अच्छा लगता अपने पैर में तुम्हारे जूते पहनना,
तुम्हें वही हिम्मती जवान देखने का मन करता है,
चश्मे के पीछे से झाँकती,
तुम्हारी सिकुड़ी मगर खूबसूरत आँखें,
अख़बार पढ़ती हुई नहीं,
ख्वाब देखती हुई अच्छी लगती हैं,
एक प्यारी-सी शर्त लगाएँ आओ फिर,
सब शर्तों में तुमसे हारने का मन करता है,
तुमसे छिपकर अब कुछ बातें
आहिस्ता होती हैं,
घर में अब कुछ हँसी ठहाके
आहिस्ता होते हैं,
आओ मिलकर हँसें, खेलें खेल पुराने,
हँसते हँसते तुम्हारी गोदी में सिर रखकर,
घंटों रोने का मन करता है,
हर एक कहानी झूठी है,
सब दादी नानी झूठी हैं,
सच वो है बस,
जो तुम बोलो और मैं सुन लूँ,
एक नई कहानी सुनते सुनते
हर रात तुम्हारे पाँव दबाने का मन करता है,
तुम्हारी चुप्पी का यह हर क्षण
एक एक युग से भी लम्बा है,
पुरानी डायरी को खोलो अब,
कुछ गीत तुम्हारे सुनने का मन करता है,
तुम चुके नहीं हो,
बस रुक गए हो,
तुम ढले नहीं हो,
बस थक गए हो,
तुम जागो तो सवेरा हो,
तुम सो जाओ तो अंधेरा हो,
तुममें अब भी शक्ति है,
जीतने की, उड़ने की,
तुममें अब भी शक्ति है,
आसमान रचने की,
कभी घूमने का मन करे तो बताना,
तुम्हारे साथ पैदल
चाँद तक चलने का मन करता है।

Monday, March 14, 2016

विरोध -मोदी का अथवा भारत का!

मोदी का विरोध जरूरी है पर उसे नीचे दिखाने के लिए देश को... उसकी अस्मिता को और उसके सम्मान को बलि का बकरा न बनाया जाए!
फिर जो आरोप लगा रहे हैं वे खुद इतने कीचड़ में सने हैं.... की उनकी मोदी को ऊँगली दिखाना उचित नहीं जान पड़ता!
"आज आशाराम बापू प्रवचन दें तो बात पचती नहीं है!
हमाम में नंगे अब क्या शुभ-शुभ ब्यान करेंगे....
वैसे ही देश से पहले ही सत्ता के साठ साल वसूल चुके अब किस मूह से कितने साल और मांगेगे???
शादी करें और घर बसाएं और परिवार को आगे बढ़ाएं....
वरना २०५० में फिर एक छोटा पप्पू बड़े बुजुर्ग मोदी से लड़ेगा और हंसी का पात्र बनेगा!

Sunday, March 13, 2016

Journey Beyond!

कभी कभी....
ट्रैन से गंतव्य की ओर  जाते हुए -
स्टेशन पर -
ट्रैन की सूनी सूनी  खिड़की पर...
याद आती हैं...
वे परछाइयाँ...
जो हवा की मानिंद उड़
गई हैं-
बहुत दूर....

अब नहीं खड़े हैं-
कोई अपने...
जो देते रहते थे - समझाइश-
"ऐसा करना ऐसा न करना "
और बढ़ाते थे-
हौसंला की-
"पैसे की चिंता मत करना और पढ़ाई दिल लगा कर करना...
चिट्ठी डालना ...
कोई दिक्कत हो तो टेलीग्राम करना...."

मैं भी फिर....
धीरे से कहता-
"पापाजी आपकी "हार्ट प्रॉब्लम" को ग्वालियर में दिखलाना है "
और वे कहते -
तू "मेरी चिंता मत करना-वो तो चलता रहता है ; तुम अच्छा बन जाओ तो समझ लो मेरी सारी बीमारी ठीक हो गई!"

अब बिन पापा...
न वे बातें...
न ढांढस बढ़ाने वाले हाथ....
सिर्फ यादें...
सिर्फ यादें और ट्रैन से मंज़िलों की तरफ अकेला जीवन सफर!!
शुभ रात्रि!

Friday, March 11, 2016

मैंने देखा है...


                                                                         मैंने देखा है...
एक "साइकिल" चलाते इंसान को- "मोटरसाइकिल" -बड़ी "फितरत" से निहारते हुए... 

मैंने देखा है-
खेत बोते किसान को.. 
बैलगाड़ी पर बैठ -बैलों को सहला कर -
ट्रेक्टर निहारते हुए...

मैंने देखा है... 
कार के बाहर खड़े गरीब मासूम बच्चे को -
बड़े "कौतुहल" से कार को छूकर देखते हुए...

मैंने देखा है.. 
सरकारी स्कूल से लौटते बच्चे को... 
चाट की दूकान पर दो रुपये की पानी पूरी पीते हुए...

मैंने देखा है -
बस में बैठे बच्चे को 
दूर से "कोल्ड ड्रिंक" पीते दुसरे ; थोड़ा संपन्न बच्चे को देखते हुए...

मैंने देखा है... 
कुछ गरीब बच्चों को... 
"इलेक्ट्रॉनिक्स" दुकानों के बाहर -
रंगीन टेलीविज़न को देखते हुए!

मैंने देखा है -
मज़दूर को मोबाइल की दुकान पर -डरते डरते 
मोबाइल का "रेट" पूंछते हुए?

मैंने देखा है...
"बाइक" पर शहर के 
बाहर -"मोहब्बत" को अपने साथी के काँधे पर हाथ रखे या "सर" टिकाये हुए और शहर के भीतर -"अज़नबी" बन दूर बैठते हुए! 

मैंने देखा है...
भरे पूरे घर में -
अस्सी बरस के बुज़ुर्ग पिता को पैरों में दर्द होने पर खुद तेल लगाते हुए!

सच! 
बहुत करीब से देखा है -
"बेबसी" को -"ख्वाइशों" की दहलीज़ पर -एड़ियां रगड़ते हुए! 
अक्सर "बेबसी" गरीबी का लबादा पहन कर तलाशती रहती है -जीवन की छाँव ;
"धुप" को पीछे धकेल कर!

हाँ! यह अलग बात है की कभी कभी...
मिलजाते हैं 
इसी अनादि यात्रा में -
      "सुदामा" को -"श्री कृष्णा" और "शबरी" को -"श्री राम"!! "

Thursday, March 10, 2016

रथ और उसका सारथी !


"सुना और सोचता भी था कि -
कीचड में लोगों के कपडे तो कपडे  ....
तन और मन भी  ....
काले हो जाते हैं।
लेकिन ,
पहली बार देख रहा हूँ -
एक ऐसी नस्ल को  ....
जो साठ साल तक देश में -
भृष्टाचार के दलदल में तैर कर भी ;
बेहतरीन टिनोपाल की सफ़ेदी की मानिंद  ....
बेशर्मी से -
भीष्म पितामह की भांति ;
देश के मंदिर में बैठ कर  ....
बड़ी ही हठधर्मिता के साथ  ...
मुँह चला कर  ....
अपने आप को ;
सत्यवान और धर्मराज की औलाद
बताने की -
जुगत और जुगाड़ करती रहती है।

जैसे महाभारत में -
कौरवों को -दुष्ट शकुनि और उसके जैसे लोगों ने ;
चढ़ा चढ़ा कर नष्ट करवा दिया ,
वैसे ही -
देश की आज़ादी की ध्वज वाहक
एक प्रमुख पार्टी को ;
ये चापलूस  ....
ख़त्म करवा देंगे।
और फिर "समय" अट्टहास करेगा कि -
देखो -
सब कुछ नष्ट हो गया  ...
गलत सारथी के -
रथ पर सवार हो जाने से। "

Tuesday, March 8, 2016

महिला दिवस पर  समर्पित

महिला दिवस पर  समर्पित !!!
प्रिय!
"भूंख ही तो है ;
जो मिटाती रही हो तुम...
इस धरती पर...
और मिटाती रहोगी ...
युगों युगों से...
प्रकृति के अंतिम चरण तक...

तुम्हारी ही रचनात्मकता और सृजनशीलता से.... इस धरती ने....
पाया है....
गर्भ के भीतर जीवनांकुर....
और माँ की सारगर्भित उपाधि!!

चूल्हे की रोटी से लेकर... नव-जीवन के स्पंदन तक....
आंसुओं के ढलकने से....  गेसुओं के टपकने तक...
आँगन की तुलसी से..  ममता के आँचल तक..
प्रेम के आलिंगन से...  अंतिम श्नवास तक;
तेरा ही वज़ूद छा -
गया है सारी कायनात पर.....
धुंआ धुंआ सा...
बन कर....

जड़ से जमीन तक...
जमीन से आसमान तक... और
प्रथम स्नान से अंतिम प्रस्थान तक....
सिर्फ "तुम ही तुम" तो छाई हो....
इस अधीर,निर्बल और निर्लज्जः
मानव के चारों और..
धीरज, प्रेम और लज्जा का शक्तिपुंज बन कर!!

हे सृष्टि! हे जननी!
तुम ही मिटा रही हो...
भूंख और प्यास...
बिना थकें बिना रुके...
इस हाड-मॉस के इंसान की! "
सादर नमन..
(गर्वित गौरव!)

Sunday, March 6, 2016

मेरे शम्भू!!! बस एक बार!

मेरे शम्भू!!!
बस एक बार -पुनः
उठा कर डमरू ;कर दे अन्तर्नाद...
उठा कर त्रिशूल ;कर दे अन्तर्नाद...
लपेट कर धूनी की राख; कर दे अन्तर्नाद...
और
खोल दे अपना -तीसरा नेत्र और
अहसास करा अपने वज़ूद का...
और सबक सीखा उनको...
जो कर रहे हैं तेरे भक्तों को विचलित-
आतंक के साये से!

बस एक बार फिर दिखा दे -
अपनी रौद्रता और सामर्थ्यता...
क्यूंकि
तेरी "भद्रता और भव्यता" के साये में...
तेरी हरी भूमि...
तेरे ज्योतिर्लिंग...
अब सशंकित हैं!

"ओम नमः शिवाय!"

Saturday, March 5, 2016

भारतीयता पर -तर्क और कुतर्क!

वाकई बेहतरीन तर्क हैं उनके जो खड़े हैं -उनके साथ -जो सहिष्णुता और बोलने की आज़ादी के नाम पर अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं -उन भाजपाईयों से ; जिन्होंने उनकी रोज़ी रोटी हड़प कर बेरोज़गार कर दिया है!
आज पैर में काँटा चुभा है तो निकालने में बुद्धमानी है वर्ना कभी भी कैंसर का विकराल रूप बन सकता है!
यदि भीष्म ने चौसर  या चीरहरण के समय ही विरोध का स्वर मुखर किया होता तो शायद -महाभारत का युद्ध न हुआ होता!
घर में भी यदि बेटा पिता से या बड़ों से बेतुका मुह लड़ाता है तो उसे डपटना -अपरिहार्य होता है! फिर ये तो देश की बात है!
कुछ लोग दिखाना चाहते हैं -नमो को नीचे पर इस उठापटक में वे देश को भी नीचे दिखाने से परहेज़ नहीं कर रहे हैं!
बोलने की आज़ादी का मतलब -यह नहीं होता की लड़का -"माता-पिता से यह कहने लगे की तुमने एक Biological Process से हमें अपने Enjoyment के लिए पैदा किया है!"
जब माँ का आँचल ब्लाउज़ की शक्ल ले ले...
पिता की डॉट को बेटा "बकना" बोलने लगे... तो इसे लोकतांत्रिक स्वतंत्रता नहीं बल्कि -बदतमीज़ी कहते हैं!
फिर ये सारी समस्याओं के मूल में -यदि मोदी दस प्रतिशत है तो कांग्रेस और वामपंथी ९० प्रतिशत हैं!
जरूरत है की आज की ये हार्दिक या कन्हैया जैसे लोग इन राजनैतिक हथकंडों के वीभत्स मोहरे न बन पाएं!
खैर हमें जीना सीखना होगा इसी माहोल में और अपने बच्चों को कन्हैया या हार्दिक बनने से रोकना होगा!
यही देशहित समाज और परिवार के लिए उचित होगा!