Thursday, March 24, 2016

रंग और संग!

रंग और संग!

आओ उकेरे...
कुछ और रंग...
ज़िन्दगी के रंगमंच पर अपनी तूलिका...
को थाम कर!

कुछ फीके फीके से... उम्र के साथ...
पकते हुए रंग...
जो एक दम से...
आ गए हैं सर पर.... सफेदी की चादर ओढ़ कर!

कुछ शिथिल शिथिल सी......
जर्जर होती काया का.... ढला ढला सा...
गेहुआं सा...
उम्र का...
पका पका सा...
कुछ थका थका सा रंग...
जो अपनी बदरंग होती काया का...
शास्वत स्वरुप है!

कुछ भूरे भूरे से...
धुंआ धुंआ से...
अपने जीवट को समेटे...  घुटनों के दर्द को लपेटे...
अम्मा-बाबूजी या
दादा-दादी की चादर ओढ़े...
वानप्रस्थ के उड़ते उड़ते ध्वजवाहकों के दर्द को उकेरते रंग!

कुछ देशद्रोह के विपलवकारी रंग...

कुछ देशप्रेम के सृजनकारी रंग...

कुछ सफ़ेद बर्फ जैसे सियाचीन के शहीद रंग...तो ....
कुछ
आज़ादी को शर्मिंदा करते "लाल सलाम" रंग!

इन रंगों ने बन कर खिजाब....
लपेट लिया है इंसानी मुखौटा और झटक कर फेंक दिए हैं -
मोहब्बत के खुशनुमां चेहरे...बहुत दूर...
कसमें-वादों के गमगीन
चेहरे...बहुत दूर...
श्रवणकुमार की मातृ-पितृभक्ति वाले चेहरे बहुत दूर...
और
रंगों में तेज़ाब मिलाकर बना दिया है..ज़िन्दगी की किताब को -बेरंग!

किस  रंग से खेलूं... होली ग़ालिब?
हर रंग नुमाइंदा है... इंसानी फितूर का!

फिर चाहे मोहब्बत हो या खुदाया बन्दिगी...
रंगों ने जिस्म की खाल को जकड़ लिया है -हुकूमत बन!

हक़ीक़त में सब बकवास है...
रंग सिर्फ ज़िन्दगी की -"आस" है..
एक ख्वाब...
एक जज्बाती विश्वास  है...
जिसमें हम अक्सर ढूँढ़ते ईश्वर का वास है!

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