पुराने दरवाजों से ...
अब
डर लगने लगा है ....
समय के साथ साथ।
हर साल वार्निश कर के नया करने की कोशिश में ;
ढूंढता हूँ इन दरवाजों में अपने पिता का अक्स ...
जो कभी थे -
मेरे दरवाज़े।
चिटके हुए किवांड ...
जिनकी झिर्र में से ...
दिखने लगा है ...
एक पूरी ज़िन्दगी का लब्बो-लुआब ;
अक्सर -
अहसास कराते हैं ;
मेरे चिटकने का या ...
मेरे निपटने का ....
ठीक दरवाज़ों जैसा ,
क्यों कि -
अब मेरी वार्निश करने वाले हाँथ भी ....
बिछड़ गए हैं -
चिटक के .....
या छिटक के ....
सदा सदा के लिए।
दरवाज़े अब -"चूं" "चूं " की आवाज़ भी करने लगे हैं ...
ठीक मेरी हड्डियों के जैसे ...
इतने साल से अनवरत ...
चलते चलते या -
ढलते ढलते।
लेकिन कई बार ...
इस बुढ़ापे में भी ...
दरवाज़े से अनेकों हवाओं ने .....
भीतर आने की गुंजायश तलाशी ....
पर
हर बार -
जर्जर होते दरवाजों ने ....
अपने पूरे जी ओ जान से ...
ठीक मेरे पिता की तरह ;
रोक दिया उन्हें .....
बाहर ही जो ;
कर सकते थे ....
ज़िन्दगी ;
तहस नहस ....
भीतर घुस कर।
आज पिता नहीं हैं ....
पर
मैं उनका बेटा ...
दरवाजा बन ...
खड़ा हुआ हूँ ;
ठीक उनकी तरह ....
जैसे कभी वे भी ...
खड़े रहते थे ;
मेरा दरवाजे बन।
खुशनसीब हैं -वे-
जिनके-"दरवाज़े" सलामत हैं ;
और उनकी चाहरदीवारी बन ...
बैठे हुए हैं -
पुराने तख्त पर -
दादाजी या पापाजी बन।
हम तो तस्वीरों में ही ...
देख लेते हैं ...
अपने बिछड़े दरवाज़ों को और -
आँखों में तरलता लिए ...
पौंछ लेते हैं ;अपने आंसूं ...
वर्ना -
कहीं बच्चे न पूंछ बैठें- कि -
पापा !आप रो रहे हैं ?
क्यों ???
(गर्वित गौरव !)
अब
डर लगने लगा है ....
समय के साथ साथ।हर साल वार्निश कर के नया करने की कोशिश में ;
ढूंढता हूँ इन दरवाजों में अपने पिता का अक्स ...
जो कभी थे -
मेरे दरवाज़े।
चिटके हुए किवांड ...
जिनकी झिर्र में से ...
दिखने लगा है ...
एक पूरी ज़िन्दगी का लब्बो-लुआब ;
अक्सर -
अहसास कराते हैं ;
मेरे चिटकने का या ...
मेरे निपटने का ....
ठीक दरवाज़ों जैसा ,
क्यों कि -
अब मेरी वार्निश करने वाले हाँथ भी ....
बिछड़ गए हैं -
चिटक के .....
या छिटक के ....
सदा सदा के लिए।
दरवाज़े अब -"चूं" "चूं " की आवाज़ भी करने लगे हैं ...
ठीक मेरी हड्डियों के जैसे ...
इतने साल से अनवरत ...
चलते चलते या -
ढलते ढलते।
लेकिन कई बार ...
इस बुढ़ापे में भी ...
दरवाज़े से अनेकों हवाओं ने .....
भीतर आने की गुंजायश तलाशी ....
पर
हर बार -
जर्जर होते दरवाजों ने ....
अपने पूरे जी ओ जान से ...
ठीक मेरे पिता की तरह ;
रोक दिया उन्हें .....
बाहर ही जो ;
कर सकते थे ....
ज़िन्दगी ;
तहस नहस ....
भीतर घुस कर।
आज पिता नहीं हैं ....
पर
मैं उनका बेटा ...
दरवाजा बन ...
खड़ा हुआ हूँ ;
ठीक उनकी तरह ....
जैसे कभी वे भी ...
खड़े रहते थे ;
मेरा दरवाजे बन।
खुशनसीब हैं -वे-
जिनके-"दरवाज़े" सलामत हैं ;
और उनकी चाहरदीवारी बन ...
बैठे हुए हैं -
पुराने तख्त पर -
दादाजी या पापाजी बन।
हम तो तस्वीरों में ही ...
देख लेते हैं ...
अपने बिछड़े दरवाज़ों को और -
आँखों में तरलता लिए ...
पौंछ लेते हैं ;अपने आंसूं ...
वर्ना -
कहीं बच्चे न पूंछ बैठें- कि -
पापा !आप रो रहे हैं ?
क्यों ???
(गर्वित गौरव !)
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