Wednesday, March 30, 2016

पुराने दरवाज़े कुछ कहते हैं !

पुराने दरवाजों से  ...
अब
डर लगने लगा है  ....
समय के साथ साथ।

हर साल वार्निश कर के नया करने की कोशिश में ;
ढूंढता हूँ इन दरवाजों में अपने पिता का अक्स  ...
जो कभी थे -
मेरे दरवाज़े।

चिटके हुए किवांड  ...
जिनकी झिर्र में से  ...
दिखने लगा है  ...
एक पूरी ज़िन्दगी का लब्बो-लुआब ;
अक्सर -
अहसास कराते हैं ;
मेरे चिटकने का या  ...
मेरे निपटने का  ....
ठीक दरवाज़ों जैसा ,
क्यों कि -
अब मेरी वार्निश करने वाले हाँथ भी  ....
बिछड़ गए हैं -
चिटक के  .....
या छिटक के  ....
सदा सदा के लिए।

दरवाज़े अब -"चूं" "चूं " की आवाज़ भी करने लगे हैं  ...
ठीक मेरी हड्डियों के जैसे  ...
इतने साल से अनवरत  ...
चलते चलते या -
ढलते ढलते।

लेकिन कई बार  ...
इस बुढ़ापे में भी  ...
दरवाज़े से अनेकों हवाओं ने  .....
भीतर आने की गुंजायश तलाशी  ....
पर
हर बार -
जर्जर होते दरवाजों ने  ....
अपने पूरे जी ओ जान से  ...
ठीक मेरे पिता की तरह ;
रोक दिया उन्हें  .....
बाहर ही जो  ;
कर सकते थे  ....
ज़िन्दगी ;
तहस नहस  ....
भीतर घुस कर।

आज पिता नहीं हैं  ....
पर
मैं उनका बेटा  ...
दरवाजा बन  ...
खड़ा हुआ हूँ ;
ठीक उनकी तरह  ....
जैसे कभी वे भी  ... 
खड़े रहते थे ;
मेरा दरवाजे बन।

खुशनसीब हैं -वे-
जिनके-"दरवाज़े" सलामत हैं ;
और उनकी चाहरदीवारी बन  ...
बैठे हुए हैं -
पुराने तख्त पर -
दादाजी या पापाजी बन।

हम तो तस्वीरों में ही  ...
देख लेते हैं  ...
अपने बिछड़े दरवाज़ों को और -
आँखों में तरलता लिए  ...
पौंछ लेते हैं ;अपने आंसूं  ...
वर्ना -
कहीं बच्चे न पूंछ बैठें- कि -
पापा !आप रो रहे हैं ?
क्यों ???

(गर्वित गौरव !)


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