
"सुना और सोचता भी था कि -
कीचड में लोगों के कपडे तो कपडे ....
तन और मन भी ....
काले हो जाते हैं।
लेकिन ,
पहली बार देख रहा हूँ -
एक ऐसी नस्ल को ....
जो साठ साल तक देश में -
भृष्टाचार के दलदल में तैर कर भी ;
बेहतरीन टिनोपाल की सफ़ेदी की मानिंद ....
बेशर्मी से -
भीष्म पितामह की भांति ;
देश के मंदिर में बैठ कर ....
बड़ी ही हठधर्मिता के साथ ...
मुँह चला कर ....
अपने आप को ;
सत्यवान और धर्मराज की औलाद
बताने की -
जुगत और जुगाड़ करती रहती है।
जैसे महाभारत में -
कौरवों को -दुष्ट शकुनि और उसके जैसे लोगों ने ;
चढ़ा चढ़ा कर नष्ट करवा दिया ,
वैसे ही -
देश की आज़ादी की ध्वज वाहक
एक प्रमुख पार्टी को ;
ये चापलूस ....
ख़त्म करवा देंगे।
और फिर "समय" अट्टहास करेगा कि -
देखो -
सब कुछ नष्ट हो गया ...
गलत सारथी के -
रथ पर सवार हो जाने से। "
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