Saturday, March 19, 2016

दो बूँद आँखों की.. समुन्दर पर भारी!

दो बूँद आँखों की.. समुन्दर पर भारी!

मेरी यादों में समाने वाली...
ओ अनाम हस्ताक्षर!!
कितने धीरे से...
अपनी आँखों की दो बूंदों से...
धो डाला है ;
तुमने मेरा वज़ूद!

माना की...
"मेरी-तुम्हारी" या "हमारी" कहानीँ में.... 
कुछ लम्हें...
कसक भरे रहे होंगे...  लेकिन...
कुछ भी -
कड़वी यादों जैसा न होगा!

इतनी छोटी...
किन्तु लम्बी यात्रा में...  ;
मेरे साथ...चलते चलते  ....
कभी हवा के झोंके से भी...
तुम्हारी चुनरी तो सरकी नहीं?
जुल्फें तो बिखरी नहीं?  या फिर -
मेरी शाखों से कोई भी पत्ता...
तेरी तरफ तो उड़ा नहीं?
फिर कैसे -
तेरी दो बूंदों ने धो डाला ;
एक मेरा पूरा वज़ूद?

तुम्हारी आँखों के दो आंसू...
बन गई बहती नदी की  वे उच्छृंकल लहरें...
जो अपने बाढ़ के उफनते उन्माद में.... 
भिगो गई...
किनारे के...
मेरे जैसे...वे पत्थर...
जो बिचारे खड़े थे ; निर्विकार निरुद्देश्य!

फिर तुमने बदल डाली अपनी रफ़्तार...
और तोड़ कर...
अपने तटबंध...
चली गई तुम...
फिर कभी न लौट कर आने को....
अपने-पुराने सूखे-बेडोल निराकार.... पत्थरों के पास!

प्रिये!
कभी आना...
अपनी पुरानी पगडंडियों पर...
तो देखना की...
"बेसरम" के या "जंगली केक्टस" की मानिंद...
या "अहिल्या की मूर्ति" जैसे...
आज भी -
"तुम्हारे पत्थर"
पड़े हुए है...
वैसे ही...
जैसे तुम...
अपनी -दो बूंदों से... भिगो कर...
छोड़ कर गई थी!

बस इन्तिज़ार है...
अगले जन्म का...
जब -तुम आओगी.. और...
अपने पत्थर को... 
अपने शाश्वत स्पर्श से...  पुनर्जीवित करोगी!

ओ मेरी नदी!
आओगी न?

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