Saturday, March 5, 2016

भारतीयता पर -तर्क और कुतर्क!

वाकई बेहतरीन तर्क हैं उनके जो खड़े हैं -उनके साथ -जो सहिष्णुता और बोलने की आज़ादी के नाम पर अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं -उन भाजपाईयों से ; जिन्होंने उनकी रोज़ी रोटी हड़प कर बेरोज़गार कर दिया है!
आज पैर में काँटा चुभा है तो निकालने में बुद्धमानी है वर्ना कभी भी कैंसर का विकराल रूप बन सकता है!
यदि भीष्म ने चौसर  या चीरहरण के समय ही विरोध का स्वर मुखर किया होता तो शायद -महाभारत का युद्ध न हुआ होता!
घर में भी यदि बेटा पिता से या बड़ों से बेतुका मुह लड़ाता है तो उसे डपटना -अपरिहार्य होता है! फिर ये तो देश की बात है!
कुछ लोग दिखाना चाहते हैं -नमो को नीचे पर इस उठापटक में वे देश को भी नीचे दिखाने से परहेज़ नहीं कर रहे हैं!
बोलने की आज़ादी का मतलब -यह नहीं होता की लड़का -"माता-पिता से यह कहने लगे की तुमने एक Biological Process से हमें अपने Enjoyment के लिए पैदा किया है!"
जब माँ का आँचल ब्लाउज़ की शक्ल ले ले...
पिता की डॉट को बेटा "बकना" बोलने लगे... तो इसे लोकतांत्रिक स्वतंत्रता नहीं बल्कि -बदतमीज़ी कहते हैं!
फिर ये सारी समस्याओं के मूल में -यदि मोदी दस प्रतिशत है तो कांग्रेस और वामपंथी ९० प्रतिशत हैं!
जरूरत है की आज की ये हार्दिक या कन्हैया जैसे लोग इन राजनैतिक हथकंडों के वीभत्स मोहरे न बन पाएं!
खैर हमें जीना सीखना होगा इसी माहोल में और अपने बच्चों को कन्हैया या हार्दिक बनने से रोकना होगा!
यही देशहित समाज और परिवार के लिए उचित होगा!

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