Thursday, March 31, 2016

ज़िद्द!

ज़िद्द "शरीर" की होती..
तो हार क़ुबूल होती...
पर हमारी ज़िद्द तो...  मुक्कदस "दिल" की उपज थी....
जिसके लिए जिस्म जरूरी नहीं था!

काश!
समझ सकते वे हमदर्द हमारा दर्द.....
जो देखते....
या तलाशते थे....
हम दोनों में -
"उन्माद और उच्छृंकलता" का दोहरा चरित्र चित्रण...

कोई कैसे समझाए उनको -
प्रेम का अंत -"दो बून्द" नहीं है...
प्रेम का अंत -"ऊँचे" हिम शिखरों को...
झीने दुपट्टे से.
अनावृत करना नहीं है... प्रेम का तात्पर्य -
"स्पर्श बोध" नहीं है... या
प्रेम का "चरम" वहशियाना नहीं है...

प्रेम को क्यों तौलते हो उस तराज़ू से
जिसमें -
"जिस्म का पसीना" भारी पड जाता है... "आँखों के आंसुओं" पर!

खैर!
जिसने प्रेम को सशंकित किया..
वे आज भी
"हारी हुई बाज़ी" के साथ बैठे हुए हैं.. और
वहीँ हम दोनों..
अपने वचनों पर अडिग..
अपने प्रेम पाश में अविचलित...
अपने सौंदर्य बोध पर कायम...
निर्भीक.. निश्छल.. और निष्पाप हो चलते जा रहे हैं ख़ुशी ख़ुशी...
निष्कलंकित!

मुझे पता है...
इतने लम्बे बीस वर्षों के अर्से के बाद...
जब कभी भी मिलोगी....
तो तुम्हारी आँखों में... मेरे लिए...
नफरत की जगह... पाकीजगी होगी!
क्यों की...
हमने अपने प्यार में...  साबित की है...
सरलता.. सभ्यता.. सौम्यता और पाकीजगी!

मुबारक हों -तुझे तेरे रास्ते और...
मुकम्मल रास्तों पर मेरा सफर भी चलता रहे...
बिन तेरे!
खुदा हाफ़िज़!

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