Wednesday, June 29, 2016

सिमटते दायरे ! सफर !!! पापा से बाउजी ... और फिर .. बाउजी से दादू बनने का !

ज़िन्दगी !
कुछ नहीं ...
बस सिमटते दायरे !

कभी प्रेम के ..
कभी रिश्तों के ..
कभी कर्तव्य के तो ..
कभी उम्र के !

बड़े होते बच्चे ..
बदलते बेडरूम ..
चिटकनी बंद बाथरूम ..
और सिमटते रिश्ते !

बदलते जज़्बात ..
बेटी से ..
उनकी माँ की खुसुर पुसुर .. और
मेरी ; यानि बाप की;
बेटे को तौलती नज़रें !

कल के ...
छाती पर लात रख कर ..
सोते बच्चों का ...
यकायक बड़ा होना ...
और फिर ...
सिमट जाना !

बड़े होते बच्चों का ...
परिवार से निकल कर ...
एक दूसरी यात्रा पर ..
निकल जाना ....
समाज के साथ ..और
हम माँ बाप को ...
पीछे छोड़ जाना !

यकायक ...
बेटी का बड़े हो जाना ...
और उसके बड़े होने पर ...
मेरा नज़रें झुकाना ...
या बड़े बुजुर्ग होने का ...
वजन लाद कर ..
नज़रअंदाज़ कर जाना !

एक दम से ....
बेटे का भी जवां हो जाना ...
और मेरे से ....
मर्यादित पेश आना !

इन बच्चों का ...
बदल जाना ..
मुझ से ...
न चाहते हुए भी ...
बहुत कुछ छुपाना ...
और धीरे से ...
मेरा -"पापा से बाबूजी"
बन जाना !

सच !
बड़ा कठिन है ...
इन ज़िंदगियों के ...
सिमटते दायरों में ...
खुद को बैठा पाना !

असम्भव सा ...
लगता है मुझे ...
"डैड से दादू" बन जाना ..
या -ये कह लो की -
इक उदात्त झरने का ...
शांत झील में ....
तब्दील हो जाना !

वाकई कितना अजीब है -
इन सिमटते दायरों में ...
खुद को कुर्सी पर बैठा कर ...
चुपचाप मुस्कराना ...
और आशीर्वाद स्वरुप ...
हाथ बढ़ाना !

सच !
ढलती उम्र के ...
इन सिमटते दायरों के बीच ...
कितना "गज़ब और कठिन" है  ....
वानप्रस्थ और संन्यास के बीच का ...
सफर ये सुहाना !!

कभी मुस्कराना ...
तो कभी ...
गुस्सा दिखाना और ...
कभी कभी ...
निराश बच्चों को ....
होंसला देने के लिए ...
अपने ज़माने की ....
कोई मनगढ़ंत कहानी ...
सुनाकर ...
उनका मनोबल बढ़ाना !

फिर देर रात अकेले में ..
पुरानी यादों में ...
खो जाना !
आँखों की पोरों में ...
सिमट आये आंसुओं को ...
पौंछ कर ...
चश्मा सिरहाने रख कर ...
उन बीते दिनों में ...
खो जाना और ...
धीरे से .....
बिन अम्मा बाउजी के ...
पलकें मूंद कर ...
सो जाना !

Monday, June 27, 2016

प्रेम के जख्म धुएं में नहीं उड़ते !


"जब तूने कहा कि -
"मुझे भूल जाना और फिर कभी
यहां न आना ...
न याद करना ...
न याद आना ...
तो उस जवां होती ...
बीस बरस की उम्र में ..
मुझे याद आये ....
अमिताभ-रेखा के ...
वे नग्मे ...
जिसमें वे कहते हैं कि -
"तुम होती तो ऐसा होता ...
तुम होती तो वैसा होता !"

गुरुदत्त साहिब जैसा  ...
उड़ा उड़ा सा ...
अपने आप को महसूस करता  हुआ  ...
पहुंचा भोपाल के ....
बस अड्डे पर ...
और बैठ गया -
"भोपाल से झाँसी"
बस में ...
फिर कभी लौट कर ...
भोपाल न आने की ..
सोच कर !"

चलती बस की ...
अंतिम सीट पर बैठ कर ...
बड़ी हिम्मत से ...
ज़िन्दगी में पहली बार ...
पान की दूकान से ...
खरीदी गई सिगरेट को ...
माचिस से ...
जलाने की कोशिश की ...
लेकिन ....
अनाड़ी हाथों से ...
वह सिगरेट ...
तीसरी बार में सुलग पाई !

मैंने "नर्वस नर्वस" से ...
"बुझे बुझे" मन से ....
ज़िन्दगी में ...
सिगरेट का पहला कश ...
तुझे भूलने की खातिर ...
लिया !

जेहन में -
देव साहिब का ...
वो गाना भी ...
गूंज रहा था कि -
"हर जख्म को धुएं में उड़ाता चला गया !"

एक कश ....
दूसरा कश ...
लेने के बाद भी ...
कोई भी जुदाई की फीलिंग ...
कम नहीं हुई ...
कोई भी जख्म धुएं में नहीं उड़ा !

फिर सोचा कि -
शायद कुछ गहरी सांस से ..
कश लेना पड़ता होगा ..
तभी दर्द ...
कम होता होगा ...
और फिर लिया ...
ज़िन्दगी में सिगरेट का ...
अंतिम कश ...

बहुत गहरा ...
बहुत लम्बा ...
बहुत अंदर तक ...
फिर धुंआ भी ...
छल्ले बना बना कर ...
गुरुदत्त साहिब जैसा ...
मुंह से निकाला ...
लेकिन ;
तेरी मोहब्बत ...
तेरी यादें ....
कसमें वादे ...
कम न होकर ..
कुछ ज्यादा ही भड़क गए ...
कभी न मिटने के लिए !

उस अंतिम सिगरेट और ...
उसकी धुएं की धुंध में ....
कुछ ऐसी कशिश थी ..
और उस वाक़िये ने ..
कुछ ऐसी -
अमिट छाप छोड़ी ...
की आज ..
पच्चीस साल बाद भी ...
तेरी यादों की खिचड़ी ...
मेरे दिल की भट्टी में ...
पक रही है ..
और मैं ;
अपनी सफ़ेद होती दाढ़ी के साथ ...
कोशिश में लगा हुआ हूँ ...
की कहीं वो ...
दो दशकों से पक रही खिचड़ी ...
गलती से अपनी ...
भीनी भीनी सी खुशबू ..
न महका दे और
न चाहते हुए भी ...
बदनाम हो जाए ..?
हमारी भूली बिसरी ..
दीवानगी और
दो जिंदगानियों की ....
जमींदोज़ जदोजहद !"

Sunday, June 26, 2016

बारिश की गुज़ारिश !

ऐ बारिश !
इस मौसम ;
तू बरस जा ....
"जी" भर के ....
कुछ ऐसे और रंग दे -
मेरे अंतर्मन को ....
कुछ ऐसे कि ...
शरीर के साथ साथ ...
आँखों की तलहटी में ...
पोरों के किनारे ....
कुछ यादों की ....
ऐसी बारिश हो जाए ....
कि ज़िन्दगी की तपिश ...
ठंडी हवा बन ...
कुछ पलों का सुकून दे जाए !

कपड़ों के साथ साथ ...
उस तन्हां दिल को भी ...
भिगो दे ...
जो सूखा पड़ा है ...
बरसों से ...
पेड़ों के मानिंद !

हम भी खड़े हैं ...
सूखे सूखे ...
बुझे बुझे ...
और थके थके ...
अकेले ज़िन्दगी में ...
बसंत के इन्तिज़ार में !

तेरे बिन ...
अब पेड़ों ने भी तो ...
सीख लिया है ..
जीना और
ठूंठ बन कर खड़े रहना ...
अकेले तन्हां और निशब्द ...
ठीक हम इंसानों की मानिंद ...
जो किसी की आँखों में ..
उतर आई नमी और बारिश की ...
दो बूंदों की खातिर ....
गुज़ार देते हैं ...
एक पूरी ज़िन्दगी ...
अकेले तन्हां और निशब्द !

बारिश!
तू तो ... .
प्रकृति से खफा हो कर भी ...
बरस पड़ती है ...
सूखती धरती पे ....
पिघल कर या गरज कर ...
वहीँ -
हमारी मोहबत्तें ...
जो एक बार जुदा हुईं ...
तो फिर कसम से ...
तरस जाती है ....
एक पूरी उम्र ...
दो बून्द ..
प्यार की बरसात को !

काश !हम भी पेड़ होते ...
जो सूख जाते हैं ...
बिन बरखा के ...
या ठूंठ बन ...
खड़े रह जाते हैं ...
पर कोंपलें नहीं फोड़ते ..
बिन बारिश !

वहीँ
हमें अपनी ज़िन्दगी आगे बढ़ानी पड़ती है ...
कोंपलें और फूल खिलाने पड़ते हैं ...
बिन "प्यार" के भी ...
क्यों की -
नियति और "दस्तूर" ही मानव जन्म का सार है!

"मज़ा बारिश का चाहो तो
मेरी आँखों में आ जाओ ....
क्यूंकि -
वो बरसों में कभी बरसे ...
और ये ....
बरसों से बरसतीं हैं !"

Wednesday, June 15, 2016

ऐ खुदा शुक्रिया !

ऐ खुदा शुक्रिया !
बहुत कुछ दिया तूने ;बिन मांगे।

लोग तो पूजा करते हैं  ...
मन्नतो का अम्बार लगाते हैं तब जाकर  ...
उनकी एक -आध ख्वाईश  ....
अपने मुकाम को हासिल कर पाती है।
और
फिर मैं ठहरा - निरा स्वार्थी  ....
तुम्हारी लम्बी-चौड़ी पूजा तो  ...
मेरे बस की बात नहीं थी -तो
मैंने भी तुझे खुश करने के लिए ;
कुछ हट के करने की कोशिश की  ...
और लगता है कि -
शायद तू खुश हो  गया।

कुछ ज्यादा  ....
धरम करम नहीं किया बस  ...
जिन बुजुर्गों को उनकी औलादें नकारती हैं  ...
मैंने उन्हें अपनाया।

गाय को अपना जूठन नहीं खिलाया बल्कि  ...
जो मैंने खाया  ....
वह खिलाया।

कुत्ते को -फेंक कर रोटी नहीं दी बल्कि .....
रख कर दी ;
और
देश को सदा पहले पायदान पर रखा और
हिन्दू मुसलमान के पचड़े से दूर रहा।

मैंने तय किये -अपने मायने  ...
क्यों की ज़िन्दगी मेरी थी।

मैंने तय किये  ...
अपनी मोहब्बत के पैमाने  ....
क्यों कि मोहब्बत मेरी थी।

मैंने तय किये  ....
अपने दोस्त और दोस्तियां  ....
क्यों कि -वफादारियां मेरी थी।
और
मैंने तय की  ....
अपनी तहजीबें  ...
क्यों कि संस्कार मेरे माँ -बाप के थे।

मैं नहीं कहता की-दूध का धुला हूँ पर  .....
स्याही सा काला भी नहीं हूँ।
ईमानदारी का भगवान् नहीं  ....
तो बैईमानी का मसीहा भी नहीं हूँ।

शायद इसी कारण तूने
दे दिए दो प्यारे से बच्चे और
निर्मल सी जीवन संगनी  ...
बिन मांगे ;
कुछ मेरे भाग्य से  ....
तो कुछ माँ पापा की दरख्वास्त से  .....
तो कुछ -तूने
अपने स्नेह और विश्वास से।

बड़े बड़े करोड़पतियों को देखा है मांगते -एक बेटा  ...
बड़े बड़े लोगों को देखा है -बेमेल रिश्तों को ढोते  .....
और खोदते  ....
रिश्तों की खाईयां  ...
बहुत गहरी  ...
फिर
मैं तो बहुत खुश हूँ जो  ...
तेरी नज़रे इनायत मुझ पर हुई।

कटोरे में खुशियां तलाशोगे  ....
तो दिख जायेगीं और
खालीपन ढूँढोगे तो  .....
वो भी -कहीं  न कहीं  ....
नज़र आ ही जाएगा।

कोई आधे चाँद में ही  ....
दो आंसू बहा कर  ...
अपनी मोहब्बत को  ....
याद कर लेता है  ....
तो कोई -
अमावस की  ....
काली रात का इंतज़ार करता है ;
रोने को।

पूरनमासी के चाँद की चाह में  ...
आधे-अधूरे चाँद को  ....
नकारना ;बेवकूफी है।
समझदार वही है -जिसने  ...
आधे चाँद में  ...
तारों से दोस्ती कर के ;
ज़िन्दगी गुज़ारी।

म्याद पूरी करना है  ....
उस ज़िन्दगी की  ....
जो तूने दी है  ...
बड़े विश्वास से।

और देखना  ...
जब लौट कर दूंगा हाज़री  ....
तेरे दरबार में  ...
तो तू भी मुस्करा देगा  ....
मेरे फैसलों पर।





Saturday, June 4, 2016

शब्द -"शहद"

शब्दों का मायाजाल और मैं...

खेलता रहता हूँ..... अक्सर शब्दों से....
और बहलाता रहता हूँ अपना वज़ूद...

भूत के पलों को...... पिरो कर......
बना देता हूँ....
शब्दों से गुँथी हुई..
एक माला....
जिसमे पिरोये हुए होते  हैं.....
कुछ मोहब्बत के..
तो कुछ बेवफाई के..  आंसू...
और माँ पापा के संग गुज़ारे..
बेहतरीन पल छिन्न...

एक शब्द ही तो हैं... जिन्होनें...
साथ नहीं छोड़ा....
मेरा बुरे वक़्त में भी...

हमेशा पोंछ कर मेरे आंसू...
और होंसला देने को... शब्दों ने ही...
संबल और प्रेरणा दी...

जब टूटता हूँ...
तो मेरे विचार..
मेरे संस्कार...
और माँ-पापा...
आ जाते हैं...
मुझे सहारा देने.
शब्दों के रूप में!

आटे से गुंथे हाथों वाली माँ...
सीने पे लात रख कर..  हक़ से..
पापा के साथ..
सोने की जिद्द..
और 
हमेशा के लिए बिछड़ती मोहब्बत को....
जैसे अमर पलों को..
शब्दों ने ही ज़िंदा रख है...

सच !
जब दिल के भाव...  निशब्द होते हैं....
तब भी..
शब्द -"शहद" होते हैं!

Thursday, June 2, 2016

मेरी ख्वाबगाह!

आज पुराने बक्से को खंगालते हुए... मिल गई वो तकिया...
जिसको बीस बरस पहले...
अक्सर मैं अपनी -
ख्वाबगाह...
कहा करता था!

तसल्ली से....
निकालता था......
अपना दुःख... और
सुकून से बंटाता था..
अपना सुख....
उसको ;
गुड-मुड़ा कर...
या
भिगो कर...
तेरी विरह की यादों के....
समंदर के...
आंसुओं से......या...
तेरे मिलने के...
सतरंगी सपनों के...
सीलबंद लिफाफों से!

हाथ में लिए ये बख्तरबंद तकिए को...
सोच रहा हूँ की -
आह ज़िन्दगी!
बीस बरसों में..
वक़्त की करवट में...
तेरे मेरे दरम्या...
उपजे मोहब्बतों के....
निशानात....
तो उड़ गए....
पर कमबख्त...
इस तकिए से....
वो आंसूं न धूल पाये....
जो आज भी.....
खामोशी से........
गवाह बने हुए हैं....
अपने अधूरे...
ख्वाबगाह के! "

बिजनेस पार्टनर!

अपने ही लोग...
तौलते रहते हैं...
मेरा वजन...
और वज़ूद..
नित!

कभी कभी...
झुक जाते हैं.....
मेरे पैरों तले....
और बढ़ा देते हैं....
मेरा वजन और कद एकदम से!

तो कभी...
तांश के पत्तों सा... बिखेर देते हैं...
मेरा वज़ूद...
जब बात...
चल निकलती है -
पैसों और व्यापार की!

सच! बहुत हल्का हो जाता है...
मेरा वजन...
जब कभी-कभी...
खुश फहमियां...
हावी होने लगतीं हैं... की
मैं भी कुछ हूँ...
किसी घर का..... वटवृक्ष..
या किसी व्यापार का कल्पतरु वृक्ष!

सच!
जन्म से मरण तक के...  कुदरती रिश्तों पर...  कितनी जल्दी...
हावी हो जाता है...
ये बिज़नेस पार्टनर...
नाम का इंसान!

बना लेता है...
अपनी पैठ और पकड़....
और....
एक ही माँ की....
कोख से उपजे...
भाइयों के रिश्तों को.... बना देता है कूड़ादान!

वाह भाई!
वाह बिजनेस पार्टनर!
क्या जुगाली है...
क्या दोस्ती है....
जिसने...
पैसों से तौल दिया है...
दो भाइयों का वजन..  और वजूद...
और साबित किया है... की -माँ की कोख से...  ज्यादा ताक़तवर...
होती है..
पैसों की भूंख!