ज़िन्दगी !
कुछ नहीं ...
बस सिमटते दायरे !
कभी प्रेम के ..
कभी रिश्तों के ..
कभी कर्तव्य के तो ..
कभी उम्र के !
बड़े होते बच्चे ..
बदलते बेडरूम ..
चिटकनी बंद बाथरूम ..
और सिमटते रिश्ते !
बदलते जज़्बात ..
बेटी से ..
उनकी माँ की खुसुर पुसुर .. और
मेरी ; यानि बाप की;
बेटे को तौलती नज़रें !
कल के ...
छाती पर लात रख कर ..
सोते बच्चों का ...
यकायक बड़ा होना ...
और फिर ...
सिमट जाना !
बड़े होते बच्चों का ...
परिवार से निकल कर ...
एक दूसरी यात्रा पर ..
निकल जाना ....
समाज के साथ ..और
हम माँ बाप को ...
पीछे छोड़ जाना !
यकायक ...
बेटी का बड़े हो जाना ...
और उसके बड़े होने पर ...
मेरा नज़रें झुकाना ...
या बड़े बुजुर्ग होने का ...
वजन लाद कर ..
नज़रअंदाज़ कर जाना !
एक दम से ....
बेटे का भी जवां हो जाना ...
और मेरे से ....
मर्यादित पेश आना !
इन बच्चों का ...
बदल जाना ..
मुझ से ...
न चाहते हुए भी ...
बहुत कुछ छुपाना ...
और धीरे से ...
मेरा -"पापा से बाबूजी"
बन जाना !
सच !
बड़ा कठिन है ...
इन ज़िंदगियों के ...
सिमटते दायरों में ...
खुद को बैठा पाना !
असम्भव सा ...
लगता है मुझे ...
"डैड से दादू" बन जाना ..
या -ये कह लो की -
इक उदात्त झरने का ...
शांत झील में ....
तब्दील हो जाना !
वाकई कितना अजीब है -
इन सिमटते दायरों में ...
खुद को कुर्सी पर बैठा कर ...
चुपचाप मुस्कराना ...
और आशीर्वाद स्वरुप ...
हाथ बढ़ाना !
सच !
ढलती उम्र के ...
इन सिमटते दायरों के बीच ...
कितना "गज़ब और कठिन" है ....
वानप्रस्थ और संन्यास के बीच का ...
सफर ये सुहाना !!
कभी मुस्कराना ...
तो कभी ...
गुस्सा दिखाना और ...
कभी कभी ...
निराश बच्चों को ....
होंसला देने के लिए ...
अपने ज़माने की ....
कोई मनगढ़ंत कहानी ...
सुनाकर ...
उनका मनोबल बढ़ाना !
फिर देर रात अकेले में ..
पुरानी यादों में ...
खो जाना !
आँखों की पोरों में ...
सिमट आये आंसुओं को ...
पौंछ कर ...
चश्मा सिरहाने रख कर ...
उन बीते दिनों में ...
खो जाना और ...
धीरे से .....
बिन अम्मा बाउजी के ...
पलकें मूंद कर ...
सो जाना !
