शब्दों का मायाजाल और मैं...
खेलता रहता हूँ..... अक्सर शब्दों से....
और बहलाता रहता हूँ अपना वज़ूद...
भूत के पलों को...... पिरो कर......
बना देता हूँ....
शब्दों से गुँथी हुई..
एक माला....
जिसमे पिरोये हुए होते हैं.....
कुछ मोहब्बत के..
तो कुछ बेवफाई के.. आंसू...
और माँ पापा के संग गुज़ारे..
बेहतरीन पल छिन्न...
एक शब्द ही तो हैं... जिन्होनें...
साथ नहीं छोड़ा....
मेरा बुरे वक़्त में भी...
हमेशा पोंछ कर मेरे आंसू...
और होंसला देने को... शब्दों ने ही...
संबल और प्रेरणा दी...
जब टूटता हूँ...
तो मेरे विचार..
मेरे संस्कार...
और माँ-पापा...
आ जाते हैं...
मुझे सहारा देने.
शब्दों के रूप में!
आटे से गुंथे हाथों वाली माँ...
सीने पे लात रख कर.. हक़ से..
पापा के साथ..
सोने की जिद्द..
और
हमेशा के लिए बिछड़ती मोहब्बत को....
जैसे अमर पलों को..
शब्दों ने ही ज़िंदा रख है...
सच !
जब दिल के भाव... निशब्द होते हैं....
तब भी..
शब्द -"शहद" होते हैं!
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