ऐ बारिश !
इस मौसम ;
तू बरस जा ....
"जी" भर के ....
कुछ ऐसे और रंग दे -
मेरे अंतर्मन को ....
कुछ ऐसे कि ...
शरीर के साथ साथ ...
आँखों की तलहटी में ...
पोरों के किनारे ....
कुछ यादों की ....
ऐसी बारिश हो जाए ....
कि ज़िन्दगी की तपिश ...
ठंडी हवा बन ...
कुछ पलों का सुकून दे जाए !
कपड़ों के साथ साथ ...
उस तन्हां दिल को भी ...
भिगो दे ...
जो सूखा पड़ा है ...
बरसों से ...
पेड़ों के मानिंद !
हम भी खड़े हैं ...
सूखे सूखे ...
बुझे बुझे ...
और थके थके ...
अकेले ज़िन्दगी में ...
बसंत के इन्तिज़ार में !
तेरे बिन ...
अब पेड़ों ने भी तो ...
सीख लिया है ..
जीना और
ठूंठ बन कर खड़े रहना ...
अकेले तन्हां और निशब्द ...
ठीक हम इंसानों की मानिंद ...
जो किसी की आँखों में ..
उतर आई नमी और बारिश की ...
दो बूंदों की खातिर ....
गुज़ार देते हैं ...
एक पूरी ज़िन्दगी ...
अकेले तन्हां और निशब्द !
बारिश!
तू तो ... .
प्रकृति से खफा हो कर भी ...
बरस पड़ती है ...
सूखती धरती पे ....
पिघल कर या गरज कर ...
वहीँ -
हमारी मोहबत्तें ...
जो एक बार जुदा हुईं ...
तो फिर कसम से ...
तरस जाती है ....
एक पूरी उम्र ...
दो बून्द ..
प्यार की बरसात को !
काश !हम भी पेड़ होते ...
जो सूख जाते हैं ...
बिन बरखा के ...
या ठूंठ बन ...
खड़े रह जाते हैं ...
पर कोंपलें नहीं फोड़ते ..
बिन बारिश !
वहीँ
हमें अपनी ज़िन्दगी आगे बढ़ानी पड़ती है ...
कोंपलें और फूल खिलाने पड़ते हैं ...
बिन "प्यार" के भी ...
क्यों की -
नियति और "दस्तूर" ही मानव जन्म का सार है!
"मज़ा बारिश का चाहो तो
मेरी आँखों में आ जाओ ....
क्यूंकि -
वो बरसों में कभी बरसे ...
और ये ....
बरसों से बरसतीं हैं !"
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