Wednesday, December 30, 2015

दस्तक! मन से मन तक!

मेरे हर बदलते वक़्त की तलहटी में... क्यों आ जाती हो तुम... इतने साल बाद भी...
यादों की बदली बन?

तुम्हें क्यों समझ नहीं आता.. की -
मैं तुम्हें भूल चुका हूँ...
डायरी के अंतिम पन्नों तक..

आज फिर नए साल की -
दहलीज पर...
"आर्चीज की गिफ्ट गैलरी" तक..
क्यों परेशान करने लगता है..
वो तुम्हारा...
बरसों पुराना अक्स...
जो बीस बरस में....
शायद इतना बदल गया होगा की -यकायक...
तुम्हें सामने देख...
पहचान भी न पाऊँ!

कुछ बाल तो पक कर सफ़ेद होने लगे होंगे न??

कभी कभी....
किसी शेर शायरियों में...
पुराने मुकेश के गानों में...
ज़िद्दी प्रेम कहानियों में...
और
"प्रेम एक कटु अनुभव है" जैसे जीवन दर्शन में -
बेसाख्ता...
हलकी हलकी सी....
बुझी बुझी सी...
राख राख सी...
आंसू आंसू सी...
मेरी याद तो...
आ ही जाती होगी ; न?

खैर नया साल दस्तक दे रहा था...
तो सोचा...
की पहली शुभकामना तुम्हें ही दूँ...
मुझे यकीन है की -
मेरे दिल से निकली बात..
तुझे छूती जरूर है!
Happy New Year-2016!

Wednesday, December 23, 2015

नमो की उड़ान!

उसकी उड़ानों को देख फड़फड़ाते हो...
उसके ख़्वाबों को देख झुंझलाते हो..
उसके भाषणों को सुन -सकपकाते हो...
अरे सुकुमार राजकुमार! कभी अपने भीतर झाँक कर देखो...
तुम्हारा हाल- "उस चूल्हे की तरह है... जिसमें लकड़ी न हो!"

Wednesday, December 2, 2015

दरिया ज़िन्दगी का!

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"अब जब उम्र के पत्ते...
ज़िन्दगी की शाख से -
गिर चुके हैं..
ज़िन्दगी की भट्टी में... पक चुके हैं...
अल्हड यौवन...
और बसंत से -
फिसल चुके हैं..
गृहस्थ को आजमा ही चुके हैं...
क्यों पूंछते हो -
सफर कैसा रहा?

��सफर -हसीं दिलकश
और खुशगवार था!

��शुरुआत में दृश्य बड़े सुहाने थे...
माँ पापा की लोरी थी... पींठ पर थपकी थी और नींद भरे तराने थे...
फिर
कुछ अंतराल थे -
वीराने थे ..
तप्ती मोहबत्तें थी...
तो कुछ डूबते फ़साने थे...
कुछ दूर...
धुंध भी मिली
तो कभी ठहराव भी!

��ज़िन्दगी की दोपहर भी मिली...
लपट के साथ धुल भरी आंधी थी तो
बीच बीच में -कभी कभी बिन मौसम बदरा भी बरस जाते थे..

��नदी आकर चलने लगी बगल से...
थाम लिया हाँथ...
पकड़ लिया दामन...
रिश्ता था -पावन..
संवर गया जीवन...
फिर
मैंने भी झोंक दिया अपना
तनमन....
क्यों की -यही तो था-
जीवन-हवन!

��बड़े होते उपवन के पौधों को भी संभाला तो...
अपनी ख्वाइशों के गले को भी तसल्ली दी!

��फिर आया चक्रवाती तूफ़ान...
गिर गया...
स्नेह और आशीर्वाद का वटवृक्ष...
रह गया अकेले...
मैं और मेरा संघर्ष...
मेरा खाली मैदान...
मेरा श्मशान!

��साँझ की बेला...
मिलीजुली...
कुछ रूखी रूखी बातें...
तो कुछ
सूखी सूखी  यादें...

रुक रुक कर अपनों के बिछड़ने का दुःख...
तो
अपने आप से बात करते करते...
ईश्वर से बात करने का सुख...
परन्तु -
हकीकत में -
सबकुछ -विमुख!
जीवन अनादि से -
सुख और -
अंत में दुःख!

सुख और दुःख...
गौ मुख...
विमुख...

वास्तव में -सफर ; बेहतरीन था! "
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(गर्वित गौरव!)

Monday, November 30, 2015

सफर !



सफर तो काफी तय कर लिया था ;
हमने -
प्यार में चलते चलते  ....
प्यार में मिलते मिलते  ....
और
प्यार में बिछड़ते बिछड़ते  ....

धुप छाँव और बादलों का सफर  ...
कस्मे वादे और यादों का सफर  ...
रीत रिवाजों का ऊँच नींच वाला सफर और
हंसी ख़ुशी मिलने और बिछड़ने का
सबसे लम्बा सफर।

मंदिरों में मन्नत मांगने का सफर  ...
चादर चढ़ाने का सफर  ....
झोली फ़ैलाने का सफर और -
व्रत उपवास के साथ चालीस बीवी की कहानी ;
सुनने का सफर।

रात रात भर जाग कर  ... जागने का सफर  ...
रात रात भर आंसुओं से दरिया  ....  भिगोने का सफर  ....
आधी रात को बेफालतू में तेरी फोटो को  ....
बिंदी लगाने का सफर  ....
और
तेरे को गुस्से में फाड़ कर फेंक देने का सफर  ....
पर
फिर धीरे से तेरी कतरनों को बीन कर  ...
पुनः तेरा अक्स बनाने का  ...
सफर।

इतना सब कुछ करने के बावजूद  ...
कुछ ख़ास मिला भी तो नहीं।
तू निकल गई अपने सफर और -
मैं चल निकला बिना हमसफ़र।

बस लम्बा सफर  ...
तेरे बिना  ...
खाली खाली  ...
सिफर सिफर  ....

फिर मिला अगला पड़ाव।
इंतज़ार करता  ...
इक गहरा भंवर।
समेट लिया उसने -
मेरा सारा शहर।

उसने थामा मेरा सफर  ....
ऐसे जैसे -
वही हो कोई मेरा -
बाजूबंद और पूरा जीवन प्रहर।

खो गया पूरा वज़ूद मेरा  ....
उसके आगोश में ;कुछ ऐसे -
जैसे -उड़ते बादल ने समेट ली हो -
पूरी उन्नत नुकीली हिमाद्रित चोटी -
अपने बख्तरबंद लिबास में।

हाँ।
कभी कभी
अब भी याद आ ही जाती हो
पुराने मंदिरों में  ...
पुराने देवी-देवताओं के सामने  ....
तो कभी -
किसी कॉलेज जाती लड़की की किताबों में  ...
तो कभी किसी डरी सहमी झिझकती आँखों में  ...

पर चलो फिर बन जाएँ-
पथिक।
और छोड़ दें अपना वो-
कुछ अंतराल का  ...
जीवन सफर।

तुम सजदा करो -साथ में अपने हमसफ़र  ....
और
हम सज़दा करें ;साथ में --
अब जो है ;
मेरा हमसफ़र।

(गर्वित गौरव !)




Sunday, November 29, 2015

आत्मविश्लेषण नमो का!

आत्मविश्लेषण नमो का!

Mere Bhai! 

जय हिन्द!

नफरतों को कुछ दिनों के लिए तफ़रीह करने जाने दो...
मुझे अपने हाथों को -आजमाने दो!

देश तुम्हारा है...
तो मेरा भी रहेगा...
१९४७ की अलसाई भोर तुम्हारी थी...
तो आज २०१५ का सवेरा मेरा ही रहेगा!

तुमने चले मीलों फासले ; देश के लिये...
मैं कब झुठलाता हूँ
अरे चंद कदम...
अब मुझे भी...
देश हित में...
घिसटने दो!

थोड़ा मेरा भी तो
दम निकलने दो
मुझे भी तो कुछ करने दो!

वज़ूद मेरा भी शक के दायरे में है और
वज़ूद तेरा भी...

तू कर अपने पुश्तैनी वज़ूद के साथ सफर...
पर मेरे भाई!
मुझे अकेले ही सफर  करने दे!

अब हवाओं को रोकने से क्या होगा जब...
फ़िज़ाओं को बदलने की बयार बह निकली हो..

अब सूरज की रौशनी को क्यों रोकते हो...
जब आशा की किरण ; नव सम्वतसर की आस में निकल पड़ी हो....

फिर मैंने भी तो... मस्जिदों से निकलती अज़ान को कभी नहीं टोका... तो
तुम्हें फिर राम की आवाज़ क्यों चुभने लगी?

फिर मैं ठहरा नितांत विशुद्ध पर्वतारोही...
मेरा उद्देश्य -
कैलाश मानसरोवर की यात्रा करना था,
और परिणाम स्वरूप -उसे प्राप्य भी किया!

वही तुम -
मुझसे युवा!
उद्देश्य -विरासत की रक्षा
और परिणाम - पता नहीं!

क्यों करते हो मुझसे ईर्ष्या?
मेरा नाम लेने में चाहे जितना -"जी" लगाओ...
अंदर की असहिष्णुता परिलक्षित होती है -तुम्हारी निगाहों से...
नासिका के फूलने से... और
होठों के मिलने से!

कुछ ख़ास हासिल न कर पाओगे...
ऐसे निरुद्देश्य घूम कर...

जब कभी बड़े गौर से तुम्हें सुनता हूँ तो -
पूर्णतः अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं के -
"ब्रांड एम्बेसडर" तो नज़र आते हो...
परन्तु कहीं से भी -
इक शाश्वत सार्थक भारतीय नहीं!

अरे बदलो अपने आप को..
मन वचन और कर्मों से...

गंगा-जमुना-नर्मदा में पावनता ढूंढो...
तो विशाल हिमालय में -उसकी गरुता!
देखना... जिस दिन तुममें गरुता आ गई...
महानता स्वयं तुम्हें अपना लेगी और
उस दिन -तुम्हारी पार्टी..
अपनी खोई पगडण्डी खुद ढून्ढ लेगी!

मेरा क्या है?
न कोई आगे न पीछे...
इक बियाबान..
"रमता जोगी या बेहता पानी सा! "
न विरासत न सियासत..
न नफासत और न किसी से कोई शिकायत...
बस ; करता जा रहा हूँ वो सब जो उस शम्भू ने करने को दिया है!
तुम्हारा -
नमो!
(प्रकल्पित!)

Friday, November 20, 2015

गुमशुदा की अरज!

गुमशुदा की अरज!

आज भारतीय लोकतंत्र मिल गया मुझे...
पटना की सड़कों में...
थोड़ा घबराया सा.. सकुचाया सा...
शरमाया सा था...
बदहवास...
हर आने वाली बस से पूँछ रहा था की...
क्या ये बस दिल्ली जाती है?

मैंने भी उसकी पींठ को थपथपाकर पूंछा...
यहां कैसे???
इतना सुन कर बिलख कर लिपट गया मुझसे...
कहने लगा -
बचा लो मुझे...
ये लोग मुझे अपहृत कर के ले आये हैं... यहां...
कह रहे हैं -
अब पांच साल हम ही- तुम्हारे माई बाप हैं...
औकात से रहना...
वरना....

मैंने समझाया की -
घबराते क्यों हो?
तुम लोकतांत्रिक रूप से चुन कर आये हो...
सब कुछ तो तुम्हारा है!

लिपट कर चिपक गया...
पसीने और आसुओं से सराबोर हो कर रुंधे गले से बोला...
मैं बुरी तरह फंस गया हूँ...
सारे कौरव इकट्ठे हो गए हैं...
मुझसे खेलने के लिए...
मुझे नौंचने के लिए....

मैंने ढाढस बंधाया की -
अब तुम बिहार में हो..
ये धरती -
बुद्ध, महावीर, अशोक जैसे विवेक शील प्रतापियों की जननी है..
अब यही "लोग" तुम्हारे पालनहार हैं..
इनकी सेवा करना ही तुम्हारी करनी है..
तो बिचारा लोकतंत्र बोला..
तुम दिल्ली जा रहे हो...
बोल देना -"नमो! " से की निराश न हों...
कोशिश जारी रखें...
जितनी फिरौती मांगे..
दे दें..
पर देश हित में मुझे बचा लें..

न यहाँ कोई बुद्धा हैं..
न महावीर और अशोक..
और न समाजवाद के प्रणेता जयप्रकाश नारायण....
इक सन्नाटा पसरा है...
एक अँध्यारा है...
इक खौफ और धमकी है...

आज देश के सारे "क्षत्रप" ऐसे इकट्ठे हो चियर्स कर रहे थे... मानों
महाभारत के युद्ध में... पांडवों को मोम के या लाख के महल में जलने को छोड़ दिया हो और
कौरव ठहाके लगा रहे हों...
विश्व विजय और पांडवों  के अंत की! "

जैसे अभिमन्यु को रथ से गिरा कर...
कौरव ठहाके भरा अट्टाहास कर रहे थे.. वैसी ही -
मदांध हंसी....
मुझे आज सुनाई पड़ी है...

"नमो से मेरी इतनी सी पुकार बता देना की -
अपने बिहार को और अपने लोकतंत्र को भूल न जाएँ! "
"खंडहर में कुछ ही दिए हैं ; टूटे हुए से...
उन्हीं से काम चलायें...
इस दिवाली..
बहुत उदास थी -रात! "

(गर्वित गौरव!)

Thursday, November 19, 2015

Salute to You! Col.Santosh Mahadik!

पहली रात... बिन पापा!

"इन दुखी क्षणों में...
जब एक पांच साल के  बेटे ने...
अभी अभी - कुछ घंटों पहले... 
अपने वीर पिता (कर्नल संतोष महाडिक) को.... अपने मासूम कन्धों से... कांधा और अग्नि दी हो...
कैसे सो जाऊं -
निश्चिंत?

आज घटाटोप अँधेरी काली रात...
बहुत लम्बी होगी...
माँ -पुत्र और पुत्री के लिए...
जिनके पिता की चिता अभी शांत भी न हुई होगी..

क्या दर्द होगा...
उस पत्नी का.. जिसके
एक बाज़ू में -पुत्र होगा..
और एक में ;आसुओं से भीगी पुत्री..
वो खुद रोये या बच्चों को चुप कराये?

विकट ...
विराट... और
विलक्षण बलिदान!

कर्नल संतोष!
देश नतमस्तक है...
आपके जीवट पर..
आपके शौर्य पर... और
आपके उत्त्कृष्ट सर्वोच्च बलिदान पर...
कोटि कोटि प्रणाम! "
(गौरव!)

Monday, November 16, 2015

यात्रा! सात फेरों की... सात जन्मों तक!

यात्रा! सात फेरों की... सात जन्मों तक!

"लबों का थरथराना...
पलकों का झुक जाना...
लटों का उड़ जाना...
नयनों का बोलना और
कदमों के बहक जाने...
जैसी
चहलकदमियों से
बहुत दूर निकल आये हम..
हकीकत में -
साथ-साथ...
चलते चलते!

योवन से अधेड़ होती अनकही यात्रा के तीसरे पड़ाव में -
तुम अपनी सफ़ेद होती लटों के साथ...
माँ बन कर..
अपनी वफाओं को निभाती हुई.. और
मैं ;
पिता बन...
अपनी धुंधली होती नज़र के साथ..
आँखों के नीचे की... सिकुड़ती झुर्रियां देखता हुआ...
अपने तयशुदा कर्तव्यपथ पर...

बड़े होते बच्चों में -
अपने अक्स और नुक्स  खोजते खोजते...
धीरे-धीरे..
कहाँ से कहाँ तक..
निकल आये....
सात फेरों को निभाते हुए...
हम दोनों!

दर्द और दवा से दोस्ती करने की दस्तक भी...
धीरे से..
क़दमों की पदचाप ने दे ही दी है..
ब्लड प्रेशर और घुटनों के दर्द के रूप में...

एक मौन समझौते के तहत..
ज़िंदा रह कर..
बच्चों को स्थापित करने की ...
जिजीविषा के साथ..
हम दोनों चले जा रहे हैं... इक दुसरे का -
आत्मबल और सम्बल बन! "
(गर्वित गौरव!)

Thursday, November 12, 2015

राख!

राख!
"राकेट जो उड़े थे...
बम जो फ़टे थे...
फुलझड़ी जो चमकी थी..
सब राख हैं!

दिए जो रोशन थे..
मोमबत्ती जो जली थी..
सब राख हैं!

बस! ज़िन्दगी बदस्तूर चल रही है...
अपनी शाखों पर यथावत...अनवरत..
बिना बुझे...
बिना रुके...
बिना थके...
उस और...उस दिशा में.. जहाँ "दिया और बाती" गए हैं..
राख बनने! "

Tuesday, November 10, 2015

Happy Deepawali!

शुभ दीपमहोत्स्व!

"दिया" बन कर किया रोशन ज़िन्दगी को...
पर
अंतर्मन में छाया रहा -अंधियारा!

मोम बन कर किया उजियारा...
पर...
ज़िन्दगी में-पिघला लावा ; हाथ आया!

चाँद बन शीतलता से ज़िन्दगी को हंसाया
पर आखिर में...
गहरी काली वीरान रातों ने सारी ज़िन्दगी  भरमाया!

तुम कहती हो की बन जाऊं दीपक.... और
कर दूँ रोशन किसी की काया...
पर
अपने में मुझे दीखता है -जलते हुए कीट-पतंगे का ही हम साया!

तारे को भी देखा ऊपर आसमा पर इतराते...
सोचा! चलो तनिक इससे भी हैं -बतियाते...

पूछा उससे की -क्या करते हो तुम ;
दुनियां तकते तकते ?
उसने धीरे से बोला ...
हम जब जब जल कर गिरते...
तभी
किसी डूबते सपने का  सच पूरा करते!

खुद के लिए कभी जलने की मत सोच!
खुद को जला कर...
किसी और को रोशन करने की सोच!

कल किसी और ने भी जलाया था ;अपना सर्वस्व!
तुझे रोशन करने की उम्मीद से ;
झोंक दिया था उसने भी अपना पूरा वर्चस्व!

अरे!
सोचता क्या है???
अब तेरा मौका है..
देख! तू भी किसी का सवेरा है...
किसी की उम्मीद है...
किसी का बसेरा है...

बन कर ऊष्मा..
उड़ जा भांप बन..
झोंक दे अपना संपूर्ण वज़ूद और अंतर्मन...
ज़िन्दगी के "दिए" का
ताप बन...

सच! फिर देखना तू! बन कर किसी का उजियारा...
धीरे से चैतन्य हो जाएगा तेरे भीतर के अंतस का भी अँध्यारा!

जिसने इसको जान
लिया..
उसने -
"दिए और बाती" को पहचान लिया..
और
"जीवन सत्य" का रसपान किया! "

"शुभ दीपावली!"
"शुभ संकल्प!"
सदा आपके स्नेही -
[गौरव(शानू) -मधुमिता सब्यसांची व् यश्वी ]

Sunday, November 8, 2015

नन्द जीते... और चाणक्य हारा!

बिहार!
मुझे नहीं मालुम -
तुम जीते या हारे!

मन कहता है -
"वर्तमान" जीता और "भविष्य" पराजित हुआ!

"लालू" जीते परन्तु "लक्ष्य" पराजित हुए...

"नीतीश" जीते परन्तु "नियति" पराजित हुई...

नन्द वंश जीता और बिचारा चाणक्य...
इक बार फिर...
मौर्यों का साथ देकर
पराजित हुआ!

"एक बार जंगल के दस बारह सियारो ने झुंड बनाकर शिकार करने की योजना बनाई ओर शेर का शिकार कर लिया लेकिन इसका मतलव यह नही कि शेर को शेर कहना छोड दिया जाये! "

बिहार की जय हो!

Monday, November 2, 2015

Good Night Zindagi!

शुभ रात्रि!

"गुमसुम अँधेरी रातों में... चालीस पार की उम्र में...
सोते समय बेटे की लात आती है -सीने या पेट पर...
तो बरबस उंगलियां चली जातीं हैं...
उसके सर पर.. और पींठ पर...
थपकी देती हुई.. प्यार, दुलार और स्नेह से...
तो यकायक...
याद आ जाते हो आप...
मेरे बिछड़े प्यारे पापा!

जब आपका हाथ और कंधा...
मेरी तकिया हुआ करता था और -
आपके पेट पर मेरी टांगें पसार कर...
घूमतीं थीं -पूरी दुनिया और खो जाती थीं -ज़िन्दगी -
निंदिया रानी की गोद में!

कल आप पापा थे...
आज मैं -पापा
कल आप संसार थे और
आज -मैं
कल आप संस्कार थे..
आज मैं -संसार!

सामने आ जाता है -आपका अक्स और आकार...
आपकी छाया और प्यार...
पर फिर याद आता है -
अब आप हैं -बहुत दूर..
निराकार!

Thursday, October 29, 2015

मैंने प्यार किया!

मैंने प्यार किया!

कल मोहब्बतों का..
जलसा है...
चाँद की गवाही है ...
छत की मुंडेरों पर...
फिर -
इश्क़ की रहनुमाई है...

कुछ हकीकत की मेढ़ों पर...
मिलाएंगे नयन.. और
करेंगे दीदार अपनी सूरत
का...

तो कुछ मोहबत्तें...
चुपचाप अपने आंसू पौंछ  कर...
यादों के ढेरों पर...
तलाशेंगी अपना
चाँद!

तो -
कुछ बंदिशों के साथ...
बंद कंगूरों और चौखटों के दरख्तों पर...
रखेंगीं व्रत और
रहेंगी प्यासी..
अपने चाँद की सलामती की दुआ खातिर ...

वाकई!
कल चाँद को भी होगी जलन....
जब मोहब्बतों का आगाज़ उसकी ओर देख कर तो होगा..
पर लोग किसी और को चाँद कहेंगे..

कल माटी के करवे (घड़े) में...
सिमट जायेंगीं मोहबत्तें... अपनी वफाओं के साथ...

देखना!
कल " वहम " सहम कर दुबक जाएगा किसी कोनें में..... और
इश्क़ अंगड़ाई लेगा..
खुले आसमा में..
बेफिक्र.. बेखौफ...
अपनी पूरी शिद्दत से... सात फेरों के सात वचनों के साथ...
पर अपनी पूरी
शर्म,हया और तहज़ीबों के घूंघट में...

सच! क्या करिश्मा है ;
पंचतत्वों से बनी- मोहब्बत..
अपनी पाकीज़गी की इंतिहा में...
निहारती है -
आकाश की ओर-
चाँद को ढूँढ़ते हुए...
और थामती है ;
हाथों में मिटटी...
पृथ्वी की -करवा बन..

सच...
शब्द नहीं हैं...
उस इश्क़ को सलाम के खातिर..
जो प्यासे कंठ से...
आवाज़ देता है -
"मैंने प्यार किया! "

(गर्वित गौरव!)

माँ! मेरा स्वेटर कहाँ है?

माँ! बहुत दिनों से तुम्हारी याद नहीं आ रही थी...
जरा सी सर्दी ने क्या दस्तक दी...
तुम्हारी गर्म गोद और आँचल...
तुम्हारी उँगलियों से क्रोशिये से बुने हुए स्वेटर...
सिलबट्टे की पिसी  अमरुद की चटनी...
और
मेरे कानों को मफलर बांधती तुम्हारी झिड़की...
ने याद दिल दी...
तुम्हारी छाँव और तुम्हारे न होने का अहसास! "

Saturday, October 24, 2015

तलाश! लज्जा शर्म और हया की!

लज्जा- शर्म और हया की  खोज!

"लज्जा ढूढ़ने निकला था आज....
शर्म की भी तलाश थी...और 
हया को भी खोजता रहा मन...

बड़े बड़े माल्स में ढूंढ़ता रहा...
मैकडोनाल्ड्स से लेकर पित्ज़ा हट तक तलाशा...
पर ...
थके क़दमों से निराश हो लौटना पड़ा मुझे...
लज्जा की खोज में।

यूँ ही चलते चलते...
बुद्धा पार्क के साये तले...
झुरमुठ में...
कसमसाती सी...
लज्जा दिख गई...
पर वो भी...
बेहया बनने की कगार पर थी... तो..
मैं अपनी नज़र चुरा कर..
अपनी लज्जा बचा कर..
चला आया..
बुझा बुझा सा!

रिक्शा पर जरूर -
सलवार सूट में..
लज्जा दिख गई!
सच!
देखने में बहुत ही सुन्दर- सी थी -लज्जा!
सकुचाती, शर्माती और लजाती सी थी -लज्जा..
बार बार रिक्शा पे बैठी..
अपनी उड़ती चुन्नी सभाल रही थी...
तो कभी कंधे पे आलपिन से टंकी चुन्नी को छू कर...
तो कभी.. चुन्नी से ढंके आँचल को बार बार ढंकने  की घबराहट में..
चली जा रही थी -लज्जा!

तभी रास्ते में...
शर्म भी मिल गई है...

वो भी.. अपनी छोटी बहिन -लज्जा को -
तेज़ आवाज़ दे कर.. बुला रही थी..
शर्म भी...
साड़ी में लिपटी हुई...
सर से पल्लू तक.. ढंकी हुई... और
सिन्दूर -बिंदी से लेकर
बिछुए तक.. शर्म से दोहराती...हुई..
परेशान सी.. चली जा रही थी.. अकेले!

पर बहुत कोशिश की..
गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज़ करवाई...
पर
"हया" न मिल पाई...
मुझे सही सलामत..सौदाई....

हाँ!
जीन्स-टाप में...
कहीं कहीं..
धोखा जरूर हुआ..
की कहीं -
यह साठ के दशक की ....
देवानंद के समय वाली..
लज्जा की छोटी बहिन...
"हया" तो नहीं?
जो बचपन में -बम्बई चली गई थी... पढाई करने?

हिम्मत करी की -
रिश्ता निकालूँ -हया से..
याद दिलाऊं..
उसे -अपने पुराने रिश्ते..
जब...कभी कभी...
लज्जा और शर्म के साथ वो भी मिलने आया करती थी...
मेरे घर!

पर उसके मत्तंग शिखरों ने...
उन्नत तने फिकरों ने..
खुली बिखरी जुल्फों ने और
हिमाद्रि के भागीरथी बनने के जिक्रों ने...
रोक दिया मुझे..
हया से मुलाक़ात करने से.. और
चुप चुप रहा मैं...
दुनिया की और तमाम फ़िक्रों में!

दोस्तों!
यदि कभी...
कहीं...
किसी रोज़...
हिन्दुस्तानियत की सुगंध से आल्हादित..
चुनरी ओढ़े या अपना आँचल समेटे..
लज्जा -शर्म और हया मिल जाएँ...
तो प्लीज उन्हें...
तिरंगा थमा देना! "
(गर्वित गौरव!)

Friday, October 23, 2015

हे राम! क्या मैं ; रावण से दोस्ती कर लूँ?

"हे राम!
कैसे मारूं अपने अंदर के रावण को... जब

देखता हूँ -की
राम तो क़ैद हैं ; चाहरदीवारी में... और
भुगत रहे हैं...
अनचाहा कारावास...
वहीँ -
रावण जी रहे हैं -उन्मुक्त, बेपरवाह और बेखौफ... ज़िन्दगी...
निर्लज्झता के साथ...
वो भी दम से -
और हैं -विराजमान...
तख्तेताऊस पर...
बिलकुल वैसे
जैसे तुम भी कभी बैठते थे..
अयोध्या के राजदरबार में.... राजन  बन!

इस युग में...
कितनी सार्थक रह गई है -राम भक्ति???

हर बार..
क्यों जीत जाता है -रावण?
और
हार जाते हैं -राम?

क्यों डर लगने लगा है -
राम शब्द के उच्चारण में?

कहीं दो समुदायों की शांति भग न हो जाए..
'राम' शब्द से... और
लगाना पड़े...
कचहरियों के चक्कर..
जमानत की खातिर!

हे राम!
बहुत डर लगता है ;तुम्हें पुकारते हुए अब...
तुम्हारे ही देश में..

रावण! बलात् ; पर बाइज़्ज़त बरी?
रावण! दंगाई ; पर बरी?
रावण! भ्रष्टाचारी ; पर बरी?
रावण! हिंसक ; पर बरी?
और राम!
मेरे राम!
तुम कौन हो और किस अपराध में..
इतने सालों से..
हो अंदर..
और कब तक होगी..
तुम्हारी जमानत?

सब कहते हैं -की
यदि मैं रावण बन जाऊं या...
दोस्ती कर लूँ..
रावण, शूर्पणखा या मेघनाद से...
तो बाहर आ जाओगे तुम
अपने कारावास से..

तुमने विभीषण से मित्रता की थी

उस समय वही उचित था.... 

तो फिर... 

मैं आज! रावण से मित्रता करता हूँ... 

इस समय ;यही उचित है! 


हे राम!
क्या मैं रावण बन जाऊं?
तुम्हारी खातिर?
तुम्हें न्याय दिलवाने की खातिर?
बोलो राम! "

(गर्वित गौरव! )


Sunday, October 18, 2015

ओ रे मनवा! ये बता- देश बड़ा या पुरूस्कार?

मेरे कलमकार!
किसको नीचा दिखा रहे हो...
अपना यह सम्मान लौटा कर???

उन विचारों को जो तुम्हारे गर्भ में पनपे और शब्दों के रूप में जन्में?

या उस घिसी कलम और उसकी सियाही को -जिसने ताउम्र चल कर.. वो भी बिना थके या अटके... यह मंज़िल पाई?

या उस DNA को जिसने चिरंतन....
नश्वर हो कर....
पीढ़ी दर पीढ़ी....
विचारों की श्रृंखला को आगे बढ़ाया... और प्रतिफल स्वरुप पुरूस्कार के मंच तक तुमको पहुंचाया?

या उस तिरंगे को...
जिसकी छाया तले....
तुम पुष्पित और पल्लवित हुए?

या उस देश को...
जिसने "तुम्हें" -इक साधारण 'तुम' से -'आप' बनाया?

या इक पार्टी-सत्ता और शक्ति को?
जिसके पास आज देश की कमान है?

ओह रे कलम के धनी...
मेरे कलमकार!
'आप' यह तो बताओ की -
'पार्टी' को नीचा दिखाने के लिए...
'देश' को नीचा दिखा कर... उसकी राज्यमुद्रा से अंकित सम्मान लौटा दोगे?

क्या यह कोई 'सामान' था; जो पसंद नहीं आया तो 'डीलर' को लौटा दिया?

अच्छा रहा की 'आपको' मरणोपरांत यह सम्मान नहीं दिया...
वरना...
अभी तो सरकार पर गुज़र रही है...
उधर... चित्रगुप्त और यमराज पर क्या गुज़रती... जब 'आप' 'समय' को आवेदन देते -की मुझे -'भारत' वापस जाना है ;पुरूस्कार लौटाने!

अरे 'आपने' तो...
अपने विचारों से क्रान्ति लाई है...
देश को नवीन राह दिखाई है...
पर
अब कौन सा मार्ग प्रशस्त करने की- यह अगन जलाई है- मेरे विचारक?

जो देश हित में -
शहीद हो गएँ हैं...
वे भी मन करे तो -
परमवीर चक्र, महावीर चक्र, अशोक चक्र या वीर चक्र लौटा दें?

जरा सोचो... अगर 'आपकी' बनाई 'लीक' पर 'परम्परा' चल निकली...
तो अपमान -किसका होगा?
'देश' का या 'पार्टी' का?

अब हम 'आपको' क्या आईना दिखाएँ -
बस इतना समझ लीजिये -की -
यदि कुछ ज्यादा ही उथल पुथल का मन.... कर रहा हो तो -
गौतम बुद्ध की तरह....
सन्यास की ओर जाएँ...
"लाइब्रेरी और स्टडी रूम"
से मुक्ति पाएं...
जंगल में मंगल मनाएं... और फिर वहीँ नव ऋचाएं सृजित कर...
देश जो सद्द-मार्ग दिखाएँ!

धोखे में न रहना की -
ये मान सम्मान लौटाना
कोई गांधीगिरी है...

दुनिया देख रही है -की
यह विशुद्ध नेतागीरी है ;
जहाँ चापलूसी और षड़यंत्र...
आपस में नए उपन्यास का सृजन कर रहे हैं!

अरे कलम के खेवईयों!
क्यों दे रहे हो उनका साथ...
जिन्हें -
आज़ादी, भारतीयता या
कलम और तलवार पर..
मात्र ५०० सौ शब्दों का हिंदी में निबंध लिखना भी नहीं आता?

जो खुद मंच पर कागज़ को चिंदी में फाड़ कर....
उसकी 'औकात' जगजाहिर कर चुके हैं?

जिन्होंने कभी 'आपकी' कलम को -अपने कुर्ते, शर्ट या सदरी की जेब में जगह तक नहीं दी?
और आप!
नेपथ्य में उनका साथ दे
रहे हैं? क्यों?

याद रखना...
कलम- छोटे कद की...  स्याही से आच्छादित... विचारों की वह-
श्रृंखलाबद्ध समायोजन है;
जो संपूर्ण मानवता को
अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है...

अतः "कलम" को राजनैतिक विद्रूपताओं के तले.....
किसी राजनैतिक पार्टी की मरणासन्न-रुग्णावस्था में ;
बुढ़ापे की-
"लाठी या बैसाखी"
न बना देना!
वर्ना...
यही काले अक्षर...
तुम्हें निसंकोच अनावृत कर...
इतिहास में -काली स्याही से
नग्न स्वरुप में...
दर्ज कर देंगे!
(गर्वित गौरव!)

Thursday, October 15, 2015

मायूसी और चाँद!

मायूसी और चाँद!

"मायूसियों के बीच
फिर से....
ज़िन्दगी तलाशनी होगी...
चाँद को भी-अब ज़मी में-ठंडक तलाशनी होगी... "

मैंने अक्सर...
मायूसी को भी जमीदोज हो जाते देखा है...
प्रेम आशा और ख़्वाबों की दस्तक भर से...

"वक़्त के हाथों..
किसी के लिए-
टूटता तारा -
आसमान पे -
निर्बाध जीवन चक्र से मुक्ति है...
तो -किसी के लिए -
नव अंकुरण.. और
नव आगमन.. "

"खैर -यही है जीवन की दुश्वारियां...
कहीं बहुत दूर निकल जाने की तैयारियां! "

ओह मेरे ख्वाज़ा! 
बस-इतनी गर्मी दे की -ज़िन्दगी में -
मोहब्बत सुलगती रहे और..
इतनी ठंडक दे ; की
"ख्वाब" ठिठुर कर भी...
अमीन बोलते रहें!
(गौरव!)