Tuesday, November 10, 2015

Happy Deepawali!

शुभ दीपमहोत्स्व!

"दिया" बन कर किया रोशन ज़िन्दगी को...
पर
अंतर्मन में छाया रहा -अंधियारा!

मोम बन कर किया उजियारा...
पर...
ज़िन्दगी में-पिघला लावा ; हाथ आया!

चाँद बन शीतलता से ज़िन्दगी को हंसाया
पर आखिर में...
गहरी काली वीरान रातों ने सारी ज़िन्दगी  भरमाया!

तुम कहती हो की बन जाऊं दीपक.... और
कर दूँ रोशन किसी की काया...
पर
अपने में मुझे दीखता है -जलते हुए कीट-पतंगे का ही हम साया!

तारे को भी देखा ऊपर आसमा पर इतराते...
सोचा! चलो तनिक इससे भी हैं -बतियाते...

पूछा उससे की -क्या करते हो तुम ;
दुनियां तकते तकते ?
उसने धीरे से बोला ...
हम जब जब जल कर गिरते...
तभी
किसी डूबते सपने का  सच पूरा करते!

खुद के लिए कभी जलने की मत सोच!
खुद को जला कर...
किसी और को रोशन करने की सोच!

कल किसी और ने भी जलाया था ;अपना सर्वस्व!
तुझे रोशन करने की उम्मीद से ;
झोंक दिया था उसने भी अपना पूरा वर्चस्व!

अरे!
सोचता क्या है???
अब तेरा मौका है..
देख! तू भी किसी का सवेरा है...
किसी की उम्मीद है...
किसी का बसेरा है...

बन कर ऊष्मा..
उड़ जा भांप बन..
झोंक दे अपना संपूर्ण वज़ूद और अंतर्मन...
ज़िन्दगी के "दिए" का
ताप बन...

सच! फिर देखना तू! बन कर किसी का उजियारा...
धीरे से चैतन्य हो जाएगा तेरे भीतर के अंतस का भी अँध्यारा!

जिसने इसको जान
लिया..
उसने -
"दिए और बाती" को पहचान लिया..
और
"जीवन सत्य" का रसपान किया! "

"शुभ दीपावली!"
"शुभ संकल्प!"
सदा आपके स्नेही -
[गौरव(शानू) -मधुमिता सब्यसांची व् यश्वी ]

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