यात्रा! सात फेरों की... सात जन्मों तक!
"लबों का थरथराना...
पलकों का झुक जाना...
लटों का उड़ जाना...
नयनों का बोलना और
कदमों के बहक जाने...
जैसी
चहलकदमियों से
बहुत दूर निकल आये हम..
हकीकत में -
साथ-साथ...
चलते चलते!
योवन से अधेड़ होती अनकही यात्रा के तीसरे पड़ाव में -
तुम अपनी सफ़ेद होती लटों के साथ...
माँ बन कर..
अपनी वफाओं को निभाती हुई.. और
मैं ;
पिता बन...
अपनी धुंधली होती नज़र के साथ..
आँखों के नीचे की... सिकुड़ती झुर्रियां देखता हुआ...
अपने तयशुदा कर्तव्यपथ पर...
बड़े होते बच्चों में -
अपने अक्स और नुक्स खोजते खोजते...
धीरे-धीरे..
कहाँ से कहाँ तक..
निकल आये....
सात फेरों को निभाते हुए...
हम दोनों!
दर्द और दवा से दोस्ती करने की दस्तक भी...
धीरे से..
क़दमों की पदचाप ने दे ही दी है..
ब्लड प्रेशर और घुटनों के दर्द के रूप में...
एक मौन समझौते के तहत..
ज़िंदा रह कर..
बच्चों को स्थापित करने की ...
जिजीविषा के साथ..
हम दोनों चले जा रहे हैं... इक दुसरे का -
आत्मबल और सम्बल बन! "
(गर्वित गौरव!)
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