शुभ रात्रि!
"गुमसुम अँधेरी रातों में... चालीस पार की उम्र में...
सोते समय बेटे की लात आती है -सीने या पेट पर...
तो बरबस उंगलियां चली जातीं हैं...
उसके सर पर.. और पींठ पर...
थपकी देती हुई.. प्यार, दुलार और स्नेह से...
तो यकायक...
याद आ जाते हो आप...
मेरे बिछड़े प्यारे पापा!
जब आपका हाथ और कंधा...
मेरी तकिया हुआ करता था और -
आपके पेट पर मेरी टांगें पसार कर...
घूमतीं थीं -पूरी दुनिया और खो जाती थीं -ज़िन्दगी -
निंदिया रानी की गोद में!
कल आप पापा थे...
आज मैं -पापा
कल आप संसार थे और
आज -मैं
कल आप संस्कार थे..
आज मैं -संसार!
सामने आ जाता है -आपका अक्स और आकार...
आपकी छाया और प्यार...
पर फिर याद आता है -
अब आप हैं -बहुत दूर..
निराकार!
No comments:
Post a Comment