Sunday, November 29, 2015

आत्मविश्लेषण नमो का!

आत्मविश्लेषण नमो का!

Mere Bhai! 

जय हिन्द!

नफरतों को कुछ दिनों के लिए तफ़रीह करने जाने दो...
मुझे अपने हाथों को -आजमाने दो!

देश तुम्हारा है...
तो मेरा भी रहेगा...
१९४७ की अलसाई भोर तुम्हारी थी...
तो आज २०१५ का सवेरा मेरा ही रहेगा!

तुमने चले मीलों फासले ; देश के लिये...
मैं कब झुठलाता हूँ
अरे चंद कदम...
अब मुझे भी...
देश हित में...
घिसटने दो!

थोड़ा मेरा भी तो
दम निकलने दो
मुझे भी तो कुछ करने दो!

वज़ूद मेरा भी शक के दायरे में है और
वज़ूद तेरा भी...

तू कर अपने पुश्तैनी वज़ूद के साथ सफर...
पर मेरे भाई!
मुझे अकेले ही सफर  करने दे!

अब हवाओं को रोकने से क्या होगा जब...
फ़िज़ाओं को बदलने की बयार बह निकली हो..

अब सूरज की रौशनी को क्यों रोकते हो...
जब आशा की किरण ; नव सम्वतसर की आस में निकल पड़ी हो....

फिर मैंने भी तो... मस्जिदों से निकलती अज़ान को कभी नहीं टोका... तो
तुम्हें फिर राम की आवाज़ क्यों चुभने लगी?

फिर मैं ठहरा नितांत विशुद्ध पर्वतारोही...
मेरा उद्देश्य -
कैलाश मानसरोवर की यात्रा करना था,
और परिणाम स्वरूप -उसे प्राप्य भी किया!

वही तुम -
मुझसे युवा!
उद्देश्य -विरासत की रक्षा
और परिणाम - पता नहीं!

क्यों करते हो मुझसे ईर्ष्या?
मेरा नाम लेने में चाहे जितना -"जी" लगाओ...
अंदर की असहिष्णुता परिलक्षित होती है -तुम्हारी निगाहों से...
नासिका के फूलने से... और
होठों के मिलने से!

कुछ ख़ास हासिल न कर पाओगे...
ऐसे निरुद्देश्य घूम कर...

जब कभी बड़े गौर से तुम्हें सुनता हूँ तो -
पूर्णतः अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं के -
"ब्रांड एम्बेसडर" तो नज़र आते हो...
परन्तु कहीं से भी -
इक शाश्वत सार्थक भारतीय नहीं!

अरे बदलो अपने आप को..
मन वचन और कर्मों से...

गंगा-जमुना-नर्मदा में पावनता ढूंढो...
तो विशाल हिमालय में -उसकी गरुता!
देखना... जिस दिन तुममें गरुता आ गई...
महानता स्वयं तुम्हें अपना लेगी और
उस दिन -तुम्हारी पार्टी..
अपनी खोई पगडण्डी खुद ढून्ढ लेगी!

मेरा क्या है?
न कोई आगे न पीछे...
इक बियाबान..
"रमता जोगी या बेहता पानी सा! "
न विरासत न सियासत..
न नफासत और न किसी से कोई शिकायत...
बस ; करता जा रहा हूँ वो सब जो उस शम्भू ने करने को दिया है!
तुम्हारा -
नमो!
(प्रकल्पित!)

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