Thursday, November 12, 2015

राख!

राख!
"राकेट जो उड़े थे...
बम जो फ़टे थे...
फुलझड़ी जो चमकी थी..
सब राख हैं!

दिए जो रोशन थे..
मोमबत्ती जो जली थी..
सब राख हैं!

बस! ज़िन्दगी बदस्तूर चल रही है...
अपनी शाखों पर यथावत...अनवरत..
बिना बुझे...
बिना रुके...
बिना थके...
उस और...उस दिशा में.. जहाँ "दिया और बाती" गए हैं..
राख बनने! "

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