Thursday, September 21, 2017

वो भी क्या उम्र थी ..क्या ज़िद्द थी !

वो भी क्या उम्र थी !
वो भी क्या ज़िद्द थी !

मैं ..
तुम्हें पाना और ..
पा कर रखना चाहता था ! और तुम ;
मुझे पाना और ..
पा कर खोना !

न मैं ; तुम्हें पा पाया और ..
न तुम; मुझे खो पाईं !

बस ..
"पाने खोने में गुज़र गई ज़िन्दगी ;
बिन तेरे !"

Wednesday, September 13, 2017

रातरानी की यादें!

"वक़्त बेवक़्त ..
निकल पड़ती हो तुम;
बिन सोचे कि-
रात को तफरीह नहीं करते !

वरना यह काली रात भी न बेवजह ..
मुँह लग जाती है ;
कमबख्त !

बैठ जाती है ..
यादों का पुलिंदा लिए ..
रात भर बांचने को ..
फ़िज़ूल में !

तुम भी बदली नहीं न ?
मेरी तरह बेशरम ही रहीं !"

Tuesday, September 12, 2017

आहिस्ता ..आहिस्ता !

उम्र बीत रही है; आहिस्ता ..आहिस्ता !
मोहब्बत भी हुई; आहिस्ता .. आहिस्ता !
बेवफाई भी गले लगी; आहिस्ता ..आहिस्ता !

हाथों की लकीरों में समाये लोगों ने-
घूंघट उठाये; आहिस्ता ..आहिस्ता !

अपने बिछड़े; आहिस्ता .. आहिस्ता !

नईं कोंपलें...किलकारी संग आईं; आहिस्ता...आहिस्ता!
कोंपलें ..पौधे ..फिर वृक्ष बने; आहिस्ता ..आहिस्ता !
हम वटवृक्ष बने; आहिस्ता .. आहिस्ता !

वटवृक्ष गिरने लगा; आहिस्ता ...आहिस्ता !

गिरे वटवृक्ष के तले, नई कोंपलें फूटी; आहिस्ता .. आहिस्ता !

और कुछ ऐसे ही ;
ज़िन्दगी कट गई ...
आहिस्ता ..आहिस्ता !

शायद कभी ..भगवान् के भी ..
दीदार हो जाएंगे;
आहिस्ता ..आहिस्ता !

[Garvit Gaurav]

Saturday, September 9, 2017

सफेदपोश दीमक को वर्दी वाले शेर का पत्र !

"ऐ सफेदपोश इंसा !
उड़ जाएगा तू भी ..
राख की तरह
एक दिन ..एक पल में ..
जब वक़्त ..
रुखसती का आएगा !

किस हैसियत से ..
तू इतरा रहा है ..
इस दुनियाँ में ?
जब कि ..
तेरी औकात ..
इतनी भी नहीं कि -
नसीब हो मौत
तिरंगे से लिपट कर !

खद्दर के ..
कुर्ते और पजामे में ..
तू सोचता होगा ..खुद को ..
गरीबों का रहनुमाँ पर
हक़ीक़त में तू ..
वो दीमक है -
जिसका बस चले तो ..
इस देश को भी ..
कुतर जाए !

अक्सर ..
रात के रतजगों में ..
सीमा पर ..
तेरे जैसे गद्दारों को ..
तकते और भूँजते हुए ..
याद आ जाता है ; तू ..
आलिशान मकां के ..
आलिशान सोफे पर ..
लुढ़का हुआ सा और
मन खटास से ..
भर जाता है !

कभी कभी तो ..
मन कहता है कि -
तुझसे कह ही दूँ कि ..
अगर कभी ..
ख़ाक ऐ वतन हो जाऊं तो ..
मेरी मिटटी पर ..
फूल न चढ़ाना !"

"तेरे फूलों से ..
मेरी कुर्बानी ..
व्यर्थ न हो जाए !"

Friday, September 8, 2017

सैनवा के भरत अभिमन्यु !

"चलो युवराज भवन के 
उस मोड़ से ..
फिर से ‪शुरू करें; 
जिन्दगी‬ !
जहाँ हर ‪‎पल‬ हसीन था .. और ..
हम तुम थे ..
इक अजनबी !!"

तुम एक 'अभिमन्यु' थे 
और 
मैं सिर्फ 'भरत' !

तुम अभिमन्यु की ..
गुलाबी लिपस्टिक थे !
और हम ..
भरत के बेंगनी फूल !

चाय की केतली के ..
'खट' की आवाज़ से ..
भाग जाती थी ...
नींद सारी ...और 
ज़िन्दगी दौड़ पड़ती थी .. 'क्रॉस कंट्री' करने ...
सिविल लाइन्स ..बोदा बाग़ ..साहू शॉप से स्टेडियम तक के ..
चौबारों में !

कुछ ऐसी थी ..
अपनी ज़िन्दगी ..
युवराज भवन के ..
बड़े बड़े गलियारों में !

छोटे थे न ..
कभी आंसू पोंछ लेते थे .. 
युवराज भवन की दीवारों में! 
तो कभी कभी ..
खुशियां समेट लेते थे ..
छोटे छोटे ..
तीज त्योहारों में !

कुछ ऐसा था ..
बचपन अपना ..
भरत अभिमन्यु की ..
चौपालों में !

गिलास की चाय में ..
डूब जाता था ..बिस्किट !
और नानखटाई थी ..
आज की ..
पित्ज़ा और बर्गर !

गले की एक डोर से ..
लटकी रहती थी ..
उस संदूक की चाबी ..
जिसके अंदर ..
माँ के हाथों की गुझिया ..
बुझा देती थी ..
घर की यादें और ..
पापा के ..
जल्दी आने के वादे !

गुज़र गया वक़्त ..
फूटबाल मैच की तरह !
और ..
ज़िन्दगी की जद्दोजहद में ..
संघर्ष और जय-विजय के शंखनादों के ...
उत्तरार्ध में ..
रह गईं ..
हमसभी की ..
धुंधली यादें ;
कभी न ..
बिसरने के लिए !

बहुत कुछ है ; दोस्तों ..
ज़िन्दगी में !
या ये कहो ..
सब कुछ है ज़िन्दगी में !

पर एक बात कचोटती है ..
रोज़ ;
हम तुम ..
अब साथ नहीं हैं ; 
ज़िन्दगी में !"

[GAURAV!]🍃🍂🙏🍃🍂

Wednesday, September 6, 2017

बम्बरबैनी ग्रेनाइट लीज के खिलाफ नगर के युवाओं ने निकाली मोटर साइकिल रैली और नगर पंचायत अध्यक्ष का किया घेराव !

लवकुशनगर!
आज करीब एक सैकड़ा युवाओं के जत्थे ने नगर पंचायत कार्यालय में जाकर बावनवेणीं पहाड़ी से लगी हुई पहाड़ियों की ग्रेनाइट उत्खनन लीज के प्रस्ताव पर नगर पंचायत परिषद द्वारा स्वीकृति देने के मुद्दे के खिलाफ सवाल जवाब किये और विरोध में मुर्दाबाद के नारे लगा कर नारेबाजी भी की। परिषद अध्यक्षा के न मौजूद होने पर पूरी भीड़ ने अध्यक्षा कुसमा अनुरागी के निवास की और रुख किया और उनके घर के बाहर जमकर नारेबाजी की। अध्यक्षा ने पहले तो खिड़की बंद की फिर दरवाज़े भी  बंद कर लिए। आम जनता अपनी अध्यक्षा की बाट जोहती रही मगर वे निकल कर नहीं आईं। फिर जनता ने अध्यक्ष प्रतिनिधि रामकिशोर अनुरागी से फोन पर बात की तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वे अतिशीघ्र परिषद की बैठक बुलाएंगे और लीज निरस्त करने की कार्यवाही करेंगे। 

"अपनी जान दे देंगे ;बम्बरबैनी माता की चट्टानों को न बिकने देंगे। " जैसे उद्घोषों के साथ ये युवा पुलिस थाने एवं वन विभाग के कार्यालय भी गए जहां उन्होंने लीज की हुई पहाड़ी पर से हरे भरे वृक्षों को बिना अनुमति काट दिए जाने की शिकायत भी दर्ज करवाई और जांच की मांग की। 
लवकुशनगर में दिनों दिन लीज के खिलाफ आम जनमानस में जागरूकता आ रही है और लवकुशनगर समेत पूरे अनुभाग में विरोध के स्वर आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं !
कुछ वरिष्ठ भाजपाइयों ने माननीय संगठन मंत्री से भी उन भाजपाईयों की शिकायत करने की बात कही है जो पर्यावरण और उत्खनन जैसे गंभीर मुद्दों पर नगर की इच्छा से परहेज़ कर के ग्रेनाइट व्यापारी का साथ दे रहे हैं !
माता बम्बरबैनी आंदोलन को प्रमुख रूप से नेतृत्व प्रदान कर रहे संजू बाबा ने कहा है कि -"नगर की जनता बड़े गौर से अपने चुने हुए नुमाइंदों को देख रही है और उनका ग्रेनाइट व्यापारी से घालमेल छुपा नहीं है। यदि यही हाल रहा तो आगामी विधानसभा एवं नगरीय चुनावों का जनता बहिष्कार भी कर सकती है और उनको सबक भी सीखा सकती है जो -माता सीता और उनके पुत्र लव-कुश के क्रीड़ा स्थल को नस्तनाबूत करने का घ्रणित प्रयास कर रहे हैं।"
"मैं बाहर हूँ। मुझे फोन पर सम्पर्क किया था। लीज को निरस्त करवाने के लिए परिषद की बैठक सहित सभी आवश्यक कार्य किये जाएंगे। "
[रामकिशोर  अनुरागी -अध्यक्ष प्रतिनिधि एवं कांग्रेस नेता !]

Monday, September 4, 2017

मिट्टी के फूलों का अपने वटवृक्ष को संदेश !

आदरणीय गुरुजन!
दो शब्द आपको न्योछावर !

"पिता न होकर भी; पिता !
माँ न होकर भी; माँ !
सूर्य न होकर भी; प्रकाश !
वक़्त न होकर भी ;भविष्य!
ज्योतिषी न होकर भी वर्तमान बांच कर ज़िन्दगी संवार देने वाले पंडित !
आदरणीय श्रद्धेव गुरुजनों को सर रख कर कोटि कोटि प्रणाम !!
'आपके दिए पंखों ने अब विस्तारित हो कर -डैनों का रूप ले लिया है !'
'आपके अंकुरित स्वप्निल ख़्वाबों ने ...
यथार्थ रूपी सफलता का रसपान करना शुरू कर दिया है !'
'सफलताओं के कण कण में माँ पिताजी के साथ आप विराजमान हैं !'
'कोटि कोटि नमन ..
ज़िन्दगी में आने का और ज्ञान रौशनी बन अपने सम्पूर्ण वज़ूद के साथ ...
हम सभी में समा जाने का !'
आपके सदैव -
(मिटटी के फूल !)

Saturday, September 2, 2017

Although I am Slow but at least I am Running!

कश्तियाँ खेते रहो ..
किनारे मिल ही जाएंगे !

मोहबत्तें करते रहो ..
निभाने वाले मिल ही जाएंगे !

सच के साथ चलते रहो ..
झूंठे फिसल ही जाएंगे !

अंधेरों को नकारते रहो ..
उजाले मिल ही जाएंगे !

दर्द सहते रहो ..
हमदर्द मिल ही जाएंगे !

और ..
ख्वाब संजोते रहो ..
एक दिन सच हो ही जाएंगे !