वो भी क्या उम्र थी !
वो भी क्या ज़िद्द थी !
मैं ..
तुम्हें पाना और ..
पा कर रखना चाहता था ! और तुम ;
मुझे पाना और ..
पा कर खोना !
न मैं ; तुम्हें पा पाया और ..
न तुम; मुझे खो पाईं !
बस ..
"पाने खोने में गुज़र गई ज़िन्दगी ;
बिन तेरे !"
'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
वो भी क्या उम्र थी !
वो भी क्या ज़िद्द थी !
मैं ..
तुम्हें पाना और ..
पा कर रखना चाहता था ! और तुम ;
मुझे पाना और ..
पा कर खोना !
न मैं ; तुम्हें पा पाया और ..
न तुम; मुझे खो पाईं !
बस ..
"पाने खोने में गुज़र गई ज़िन्दगी ;
बिन तेरे !"
"वक़्त बेवक़्त ..
निकल पड़ती हो तुम;
बिन सोचे कि-
रात को तफरीह नहीं करते !
वरना यह काली रात भी न बेवजह ..
मुँह लग जाती है ;
कमबख्त !
बैठ जाती है ..
यादों का पुलिंदा लिए ..
रात भर बांचने को ..
फ़िज़ूल में !
तुम भी बदली नहीं न ?
मेरी तरह बेशरम ही रहीं !"
उम्र बीत रही है; आहिस्ता ..आहिस्ता !
मोहब्बत भी हुई; आहिस्ता .. आहिस्ता !
बेवफाई भी गले लगी; आहिस्ता ..आहिस्ता !
हाथों की लकीरों में समाये लोगों ने-
घूंघट उठाये; आहिस्ता ..आहिस्ता !
अपने बिछड़े; आहिस्ता .. आहिस्ता !
नईं कोंपलें...किलकारी संग आईं; आहिस्ता...आहिस्ता!
कोंपलें ..पौधे ..फिर वृक्ष बने; आहिस्ता ..आहिस्ता !
हम वटवृक्ष बने; आहिस्ता .. आहिस्ता !
वटवृक्ष गिरने लगा; आहिस्ता ...आहिस्ता !
गिरे वटवृक्ष के तले, नई कोंपलें फूटी; आहिस्ता .. आहिस्ता !
और कुछ ऐसे ही ;
ज़िन्दगी कट गई ...
आहिस्ता ..आहिस्ता !
शायद कभी ..भगवान् के भी ..
दीदार हो जाएंगे;
आहिस्ता ..आहिस्ता !
[Garvit Gaurav]
"ऐ सफेदपोश इंसा !
उड़ जाएगा तू भी ..
राख की तरह
एक दिन ..एक पल में ..
जब वक़्त ..
रुखसती का आएगा !
किस हैसियत से ..
तू इतरा रहा है ..
इस दुनियाँ में ?
जब कि ..
तेरी औकात ..
इतनी भी नहीं कि -
नसीब हो मौत
तिरंगे से लिपट कर !
खद्दर के ..
कुर्ते और पजामे में ..
तू सोचता होगा ..खुद को ..
गरीबों का रहनुमाँ पर
हक़ीक़त में तू ..
वो दीमक है -
जिसका बस चले तो ..
इस देश को भी ..
कुतर जाए !
अक्सर ..
रात के रतजगों में ..
सीमा पर ..
तेरे जैसे गद्दारों को ..
तकते और भूँजते हुए ..
याद आ जाता है ; तू ..
आलिशान मकां के ..
आलिशान सोफे पर ..
लुढ़का हुआ सा और
मन खटास से ..
भर जाता है !
कभी कभी तो ..
मन कहता है कि -
तुझसे कह ही दूँ कि ..
अगर कभी ..
ख़ाक ऐ वतन हो जाऊं तो ..
मेरी मिटटी पर ..
फूल न चढ़ाना !"
"तेरे फूलों से ..
मेरी कुर्बानी ..
व्यर्थ न हो जाए !"
आदरणीय गुरुजन!
दो शब्द आपको न्योछावर !
"पिता न होकर भी; पिता !
माँ न होकर भी; माँ !
सूर्य न होकर भी; प्रकाश !
वक़्त न होकर भी ;भविष्य!
ज्योतिषी न होकर भी वर्तमान बांच कर ज़िन्दगी संवार देने वाले पंडित !
आदरणीय श्रद्धेव गुरुजनों को सर रख कर कोटि कोटि प्रणाम !!
'आपके दिए पंखों ने अब विस्तारित हो कर -डैनों का रूप ले लिया है !'
'आपके अंकुरित स्वप्निल ख़्वाबों ने ...
यथार्थ रूपी सफलता का रसपान करना शुरू कर दिया है !'
'सफलताओं के कण कण में माँ पिताजी के साथ आप विराजमान हैं !'
'कोटि कोटि नमन ..
ज़िन्दगी में आने का और ज्ञान रौशनी बन अपने सम्पूर्ण वज़ूद के साथ ...
हम सभी में समा जाने का !'
आपके सदैव -
(मिटटी के फूल !)
कश्तियाँ खेते रहो ..
किनारे मिल ही जाएंगे !
मोहबत्तें करते रहो ..
निभाने वाले मिल ही जाएंगे !
सच के साथ चलते रहो ..
झूंठे फिसल ही जाएंगे !
अंधेरों को नकारते रहो ..
उजाले मिल ही जाएंगे !
दर्द सहते रहो ..
हमदर्द मिल ही जाएंगे !
और ..
ख्वाब संजोते रहो ..
एक दिन सच हो ही जाएंगे !