"वक़्त बेवक़्त ..
निकल पड़ती हो तुम;
बिन सोचे कि-
रात को तफरीह नहीं करते !
वरना यह काली रात भी न बेवजह ..
मुँह लग जाती है ;
कमबख्त !
बैठ जाती है ..
यादों का पुलिंदा लिए ..
रात भर बांचने को ..
फ़िज़ूल में !
तुम भी बदली नहीं न ?
मेरी तरह बेशरम ही रहीं !"
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