Wednesday, June 27, 2012

'सव्यसांची' का लक्ष्य !!!

"ज़िन्दगी की डगर  चाहे कितनी ही टेढ़ी-मेढ़ी क्यों न  हों-
रंग चाहे कितना भी भ्रमित करें-
अर्जुन की भांति अपने लक्ष्य की ओर  देखो; जो-
तुम्हे वहां पहुचाएगा जहाँ के तुम हकीकत में हकदार हो!!"


"इन  रंगीन-हसीन रास्तों ने-
सदियों पहले 'महावीर','गौतम बुद्ध' और 'सव्यसांची' अर्थात वीर अर्जुन को भी भ्रमित करने का प्रयास किया था 
परन्तु अपने 'लक्ष्य' को पाने के लिए उन्होंने इन कंटीले रास्तों को-
 सफलता पूर्वक पार किया !"



Monday, June 25, 2012

"सिर्फ तुम्हारी ही सिर्फ तुम्हारी!!!!!"

" तुमने कहा नहीं-
तो मैंने कहा -नहीं !


तुमने कहा- प्लीज! आज नहीं!समझो न !
किसी को पता चल जायगा! 
मैंने कहा ठीक है !


तुम बोली-इस जन्म नहीं 
तब मै बोला-क्यों?
इस जन्म क्यों नहीं?


जानू ! ऐसा क्यों हुआ?
मैंने तुम्हारी हर 'न' को 'न' बोला 
पर .......
तुम मेरी इक आखिरी  'हाँ' को 'हाँ' न बोल सकीं?

याद है-
तुमने कहा-खुश रहा करो- मैं रहा!
तुमने कहा-मुझ से दूर रहना-मैं रहा!
तुमने कहा -मुझे देखा मत करो-मैंने तुम्हें देखना बंद कर दिया!
जानती हो क्यों?
क्यों कि -अपने ग्रीटिंग कार्ड मे तुमने अपने गाढे पेन से लिखा था -
"सिर्फ तुम्हारी ही  सिर्फ तुम्हारी.............."


मैंने तुम्हारी मांग को फोटो मे सिन्दूर से भरा !
अपने आंसूओं को जो तुम्हारी याद मैं तुम्हारी फोटो पे गिरे -अपनी उंगलियो से पौछा!
जानती हो क्यों?
बस वो पांच शब्द- "सिर्फ तुम्हारी ही  सिर्फ तुम्हारी"!

सबसे बड़ा दुःख और आघात तब हुआ जब तुम बोली-
"मुझे भूल जाओ" प्लीज़ मुझे भूल जाओ !मैं किसी और की हूँ!किसी और की!"
तुम किसी और की हो या रहो वो किस्मत की बात है जानू !
पर .....
तुम्हारे उन शब्दों का क्या?उन सपनों का क्या ?जहाँ तुमने लिखा था-
" सिर्फ तुम्हारी ही  सिर्फ तुम्हारी."

काश तुम समझ पातीं कि -
 "सिर्फ तुम्हारी ही  सिर्फ तुम्हारी."
का मतलब क्या होता है!!!! "

"कुछ सपने बन ढल जाएँगे,
कुछ दर्द चित्ता तक जाएँगे,
उसमे इक दर्द -तुम्हारा होगा!!
उसमे इक दर्द तुम्हारा होगा!!!!! "





Saturday, June 23, 2012

रिश्तों की लड़ाई....

समय के साथ साथ-
क्यों बदलता जा रहा है-
रिश्तों का साथ ? रिश्तों की परिभाषा?
अपनों का साथ? अपनों की आशा? 


पराये क्यों हो गए है अपने?
और....
अपने ही क्यों हो गए है पराये?


राखी ,खून, आंसू ,वचन,आशा,विश्वास,कसम,सौगंध जैसे वचन क्यों बन गए हैं शब्द?
और चले गए हैं -नेपथ्य मे -
और लड़ रहे हैं -अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई!
जहाँ व्यवसायिकता का तूफ़ान .....
भावनाओं के इन तप्त बादलों को धूमिल करने का पूरा जतन कर रहें हैं;
और वह दिन दूर नहीं जब हम सभी लोग  या आने वाली पीढियां-
इन सारगर्भित भावनाओं के अर्थ जानना चाहेंगे ?


आओ कुछ जतन करें-
कुछ यतन करें-
जो इस अभिशप्त मानवता के लिए-
वरदान से कम न हो!


आओ इन उखड़ते रिश्तो की सुगबुगाहट को सुनें-
टूटती राखी की डोर को थामें-
बुढ़ापे में माँ का फिसलना और पिता का लडखडाना देखें-
प्यार के वचन को समझे -
और ......
भाई-बहन के प्यार-स्नेह-अपनत्व के  मायने जाने !


आओ गढ़े इक नई मानवता की 'इबारत' और 'इमारत'
जहाँ सिर्फ प्यार और विश्वास की नीव हो और 

पवित्र आँसुओं की सींच हो !