Sunday, October 30, 2016

मन के दिए !

दीपावली पर -
कल ...
उनके पास ...
दिए रौशन करने गया ...
जिन्होनें हमें ..
रौशन किया !

बताया उनको कि -
अब वे ...
बहुओं और ..
पोते पोतियों वाले ...
हो गए हैं !

उनसे कहा कि -
"आपके आशिर्वाद से ..
हमारी ज़िन्दगी ..
रौशन है ...
और हमारी ...
रोज़ दिवाली है !

बस ......
कहीं अंतर्मन व्यथित है !
आपकी और माँ की ..
जगह खाली है !

उस "दिवाली" के -
रचियता से ...
एक ही "सवाली" है ?
इतनीं जल्दी क्यों ...
हमारे वटवृक्ष पर
अपनी कुल्हाड़ी चाली है ???

दिन महीने बरस ...
सब दशकों में बदल गए !
बिछोह का दर्द भी ..
पत्थर बन गए !
हम सम्भल और संवर गए !
लेकिन ..
बिन आपके ..
बहुत कुछ "ख्याली" है !

बच्चों की खातिर -
ऊपर से हंसता और ..
हंसाता हूँ ..लेकिन
अकेले में ;
बिन आपके ..
सचमुच नीरस दिवाली है !


एक सैनिक का सीमा से What's App सन्देश!

प्रिय !
पाकिस्तान की तरफ से ...
गोलीबारी हो रही है !
मैं झुरमुटों में ...
छिपाए अपना वज़ूद ..
लड़ रहा हूँ ...
मातृभूमिं हित !
प्रिय !!
तुम "दिए" जला कर ..
बच्चों को ...
मिठाइयां और पटाखे ..
बाँट देना !
एक "दिया"
मेरी तरफ से भी ...
माँ लक्ष्मी को ...
अर्पित कर देना !
सब कुछ ठीक रहा तो .. 
अवश्य जल्दी मिलूंगा !
शुभ दीपावली !
तुम्हारा
(सबकुछ !)

Saturday, October 29, 2016

इस दीपावली पर मेरी अरदास !

इस दीपावली ...

उम्मीदें कायम रहें ...
ज़िन्दगी में रोशिनी की !
आस्था कायम रहें ...
ईश्वर के अस्तित्व की !
लगन बनी रहे ;परिश्रम से.....                    सफ़लता पाने की !

विश्वास ;कमज़ोर न होने पाए  ...
सत्य की विजय का !
श्रद्धा बनीं रहे :माँ पिता के ...                          स्नेह और संस्कार की !
और ....
दृढ़ प्रतिज्ञ रहें :हमारा स्वाभिमान ...
देश के प्रति सम्मान का !

आओ प्रदीप्त करें-
"एक दिया" ...
आशा और निष्ठा का ...
और बुझा दें ...
सारा तमस और अँधियारा जो घेरे है ....
हमें चारों और से....
हमारे अंतर्मन को ...
कलुषित करता !

आओ पुनः स्पंदित करें ..
उन स्वप्नों को ..
जो समय के फेर में ..
काल की गति से ..
हार गए !

अभी चुके नहीं हैं ; हम !
अभी बुझे नहीं हैं ; हम !
साबित करेंगे ...
अपना वज़ूद और प्रकाश
 दैदीप्यमान हो कर ..
सारे नक्षत्र और ..
आकाश में !

"मैं ;
"दिया" हूँ !
अंधेरों के आगे ..
घटाटोप अँधेरी रात में ..
जब सूरज भी ..
सोने चला जाता है तब -
मैं अकेला ही ;
जागता रहता हूँ और ..
लोहा लेता हूँ ..
उस अँधेरे से जिसे ...
गलतफहमीं होती है कि -
वह रोशनीं से ...
जीत जाएगा !"

इस दीपावली -
जीवन लक्ष्यों को पुनः संकल्पित करने की ..
अरदास सहित -
शुभकामनाएं अग्रेषित हैं !

"रोशन हों -
आपकी दहलीज पर ...
खुशियों का संसार और
फुलझड़ियाँ बिखरा दें ...
चारों और ...
वैभव सम्पन्नता और प्यार !"
आपके सदैव -
[गौरव-वन्दना ;
आशीष -अर्चना ;
सब्यसांची ,अर्णव एवम यश्वी ]

Monday, October 24, 2016

मिटटी के मानुस का मिटटी से उचटता मन !

कितनी अच्छी होती थी ..
वो चिल्लर ..
जो भर देती थी ...
बचपन में ..
उमंगों की गुल्लक और -
रात में ...
जब हम सोते थे तो ...
बड़े आदमीं होते थे !

रोज़ सुबह ..
हाँथ फेर कर ..
जायज़ा लेते थे ..
उस बुलन्दी का ...
जो मिटटी से बनीं ..
हमारी गुल्लक होती थी !

अब समय के साथ ...
कुम्हारों ने भी -
बन्द कर दिया है ..
मिटटी की गुल्लकों को
बनाना ....
क्योंकि अब ...
बच्चों ने -
पैसों को छोड़ ...
रुपयों से दोस्ती कर ली है !
और
मिटटी की गुल्लकों ने ,,,
ले लिया है -
ड्राइंग रूम या बैठक में
करीने से प्राचीनता दर्शाती संग्रहित की गई
नायाब धरोहरों में स्थान !

ये कैसी दुनिया है मेरे भाई ???
जो ज़िन्दगी की आदतें थीं ..
वे क्यों बनतीं जा रहीं हैं -धरोहरें ??...
और मज़बूरियां ..
क्यों बनतीं जा रहीं हैं -आदतें ??

दीपावली में मिटटी के दिए छूटे ...
मिटटी की गुल्लकों का चलन छूटा और -
मिटटी के मटके या घड़े भी ...
जोह रहे है ..
अपनी उपलब्द्धता और चलन की
अंतिम साँसें !

मिटटी से दूर होता इंसान ...
आखिर में ...
मिटटी ही तो बन जाता है !

लेकिन उस मिटटी से ...
कतराता है ...
जो अंगीकार कर लेती है;
उसका वज़ूद ...
उसकी साँसें उखड़ने के बाद !!

Sunday, October 23, 2016

मेरी कहानी ... बस इतनी सी !

मेरी कहानी ...
बस इतनी सी !

लोग मिलते गए और ..
मैं प्यार करता गया !

लोग बिछड़ते गए ...
मैं उलझता गया !

मैं छोड़ नहीं पाया उन्हें ...
जो छोड़ गए मुझे !

मैं भूल नहीं पाया उन्हें ...
जो भूल गए मुझे !

मकड़ी के जालों के चंगुल जैसा ...
फँसता गया मैं ...
हाँथ पैरों की भांति -
दिल ओ दिमाग भी
जकड़ता गया
उन अनाम .....
बिछड़े रिश्तों के बाहुपाश में
और एक दिन ...
इन बेगैरत अफसानों ने ..
चूस कर मेरा वज़ूद ...
झोंक दिया मुझे ..
समय की भट्टी में ...
हमेशा हमेशा के लिए;
नेस्तनाबूत होने को !

लेकिन इतना भीषण ...
तेज़ाब फेंकने के बाद भी ..
मैं लौट कर आ गया ...
अपनी स्वप्निल दुनिया में ..
जहाँ ...
अब मैं बहुत खुश हूँ ...
अपने इकलौते ...
दिल के सहारे ...
जिसका ह्रदय प्रत्यारोपण ..
कर दिया है ...
मेरी उलझनों के बाद आई ..
सुलझन ने !

देख लो-
ऐ दिल के बेईमान सौदागरों !!
मैं जिन्दा हूँ !
अपने होशोहवास में !
तुम्हारे श्रापों के बावज़ूद !

Saturday, October 22, 2016

एक बून्द के पीछे भागता रहता है इंसान!

एक बून्द के पीछे भागता रहता है इंसान ...

यदि "ठोस" की अपनी  उपयोगिता होती तो; "तरलता" के क्यों इतने मायने होते ??

एक बून्द प्यार में -समर्पण ..
एक बून्द -आंसू से -दुःख तो एक बून्द -आंसू में समाया सुख भी !
एक बून्द -मदिरा के रसपान से कलह तो ...
एक बून्द दुग्धपान से -
माँ शब्द की उत्पत्ति !

एक बून्द अमृत पान से .. अमरता तो ...
एक बून्द विषपान से मृत्यु !

एक बून्द अमृत के इन्तिज़ार में ....
शरद पूर्णिमा की खीर ..
तो एक बून्द अमृत के इन्तिज़ार में ....
देवताओं द्वारा
समुद्र मंथन !

एक बून्द स्खलन से .. जीवोत्पत्ति तो
एक बून्द जबरदस्ती से व्याभिचार !

एक बून्द तर्पण में -जीवन  चक्र से मुक्ति ?
तो एक बून्द अर्पण से ...
भागीरथी का आगमन !

एक बून्द नफरत से दंगे तो
एक बून्द मोहब्बत से ..
सभी खुशियों संग रँगे !

एक बून्द  -
लहू निछावर करने से -शहीद तो
एक बून्द पसीने से -कर्मठता !

एक बून्द सिन्दूर से सुहागिन और
एक बून्द बिन सिन्दूर के ....
एक सधवा की ...
विपरीत यात्रा का अनुगमन !

देखना बूंदों पर टिका संसार ....
बूंदों में समा जाएगा !
देखना प्रलय भी बूंदों से होगा....

Wednesday, October 19, 2016

करवे और चाँद के बदलते मिजाज !

न जाने कैसे ..
कुछ दशक पहले ..
उसके करवे का
चाँद बना था -
मैं !

लेकिन बस ..
वही ..
छुटपुट छुटपुट  -
कुछ पलों के लिए ही ..
उसका ...
भगवान् बना था ;
मैं !

अब सहा नहीं जाता ..
ये दस्तूर ..
ऐ दिल ;
उम्र के हर पहलू में ...
एक इम्तिहान बना था ;
मैं !

आज -
जब खड़ा होता हूँ ...
छत पर ...
जीवन साथी का चाँद बन ..
तो
क्यों याद आते हैं ..
वे अक्स ...
जिनके लिए कभी ..
मेहरबान बना था -
मैं !

बहुत कठिन होता है -
किसी के ..
जज्बातों से खेलना !
लेकिन ..
जब खेल और खिलाडी ..
दोनों रजामन्द हों तो ..
हार में भी और
जीत में भी ..
खुशियां तलाशनी पड़ती हैं !
और इन्हीं पलों में ....                                   जीवन का दस्तूर और ....                         इम्तिहान बना था मैं !

आह !
पता नहीं ..
तब श्मशान बना था; मैं ??
या अब ...
इंसान बना हूँ ; मैं ??

Tuesday, October 18, 2016

और मुहर्रम गुज़र गया !

"और मुहर्रम गुज़र गया !
मैं;सोचता रह गया ..
हाथों में नया रूमाल लिए ..
कि -
"वह आएगी ...
दुखी मन से ...
मुहर्रम पर तो -
मैं उसके आंसू पोंछ दूंगा !"

लेकिन ..
न वो आई न मेरे ख्वाब ..
सच हुए !

बस अब ...
ताज़िये हैं ;सुस्ताते  हुए....
अगली मुहर्रम के इन्तिज़ार में  ...
और मैं हूँ  -
परेशां परेशां !"

Sunday, October 16, 2016

Antique Love in Letters!

महफूज़ रखा करो ..
"जज़्बातों" को ,
पुरानी चिट्ठियों के अंदर !

जमींदोज़ कर दो इसे ..
महफ़ूज़ियत से ..
किसी बर्तन के अंदर
कई दशकों के लिए !

जब कभी ..
सैकड़ों साल बाद ..
मोहब्बत जैसी -
किसी प्राचीन चीज़ की तलाश  ...
मनोवैज्ञानिक  करेंगे तो ...
ये चिठियाँ ...
उड़ेल देंगी ...
अपना सारा प्यार और पवित्रता ...
उन भटकते लोगों पर ...
जो खोज रहे होंगे ..
मोहब्बत और उसकी फितरत में ....
ईश्वर का वास !
क्योंकि ...
भगवान् भी मोहब्बत में ही बसते हैं !

अब कोई ...
मोहब्बत के नाम से ..
चिट्ठी नहीं लिखता !

न कोई कसमें खाता है ..
न वादों की भीड़ ..
लगाता है ;
और न -तड़प कर ..
आंसू बहाता है !

सिर्फ सेटिंग, प्लानिंग और मैनेज कर के ही ..
हो जाती है ..
डेटिंग और चैटिंग और
बेचारी मोहब्बत ...
बैठी रहती है ...
किसी मंदिर की ...
चौखट पर ...
अपनी पाकीजगी ..
बयां करती हुई !

Saturday, October 15, 2016

शरद पूर्णिमा - ज़िन्दगी की खीर की कटोरी और एक बून्द प्यार की दरकार !

शरद पूर्णिमा !!!

उन धड़कनों को ..
तहेदिल से सलाम ..
जो कभी ...
ज़िन्दगी की दौड़ में ...
मुझ चकोर की ...
चांदनी बनीं !

उन धड़कनों को -
"नज़राना सुकून का" ;
जिन्होंने कभी ..
चाँद सी शीतल बन ...
मुझे शीतलता दी !

उन कराहटों को -
दर्द भरी कराह ...
जिन्होंने -
वीरान रातों में ...
एकांकी कराह दी !

उन मासूम ,हसीन ...
चेहरों को -
"दस्तक दिल की" ;
जिन्होनें अपना ....
चाँद सा मुखड़ा ...
कुछ दूर तक ...
मुझे सौंपा ;
यूँ ही ...
साथ चलते चलते ...
गलबहियां करते ...
प्यारी सी बातें ....
बतियाने को !

उन बादलों को भी ..
भीना भीना सा सलाम ;
जो अक्सर ..
शरद पूर्णिमा की रात को ..
ढाँप लेते थे ,
हम जैसे ...
"चाँद और चकोर" को -
जिससे ..
हम ...
उस अँधेरी चाँदनीं के ..
दो पलों में -
दो ज़िन्दगानियां ...
गुज़ार लेते थे ;
बेखटके !

उन अँधेरी चांदनी रातों को ..
दर्द और सर्द का ...
मिलाजुला सलाम ..
जो ज़िन्दगी में आईं और ..
जिन्होनें दस्तक दी ..
मोहब्बत करने की !
उड़ता दोपट्टा...
सम्भाल कर ...
उढाने की जुर्रत करने की !
और
उड़ती जुल्फों को ...
अपनी उंगलियों की ...
कंघी से ...
संवार कर ...
सलीके से प्यार करने की !

आखिर में ...
उन रज़ाइयों को ..
उन तकियों को ..
उन चादरों को  ..
और उन तन्हाईयों को ..
सिगरेट के धुओं के छल्लों सा  ...
सलाम ...
जो गुज़र गईं ..
तुम्हारे इन्तिज़ार में ...
एक पूरी उम्र ...
कोरी कोरी ..
सूनी सूनी ....
और बासी बासी ....
के किसी शरद पूर्णिमा के दिन  .....
पैदल चल कर ..
खुद मेरे मन के आँगन में ..
उतर आएगी ..
मेरी धवल चांदनी और
छा जायेगी -
मेरी ज़िन्दगी में ...
मोहब्बत की मिसाल बन !

पर ......?
सारी रात गुज़र गई ...
सैकड़ों पूर्णमासियां निकल गईं ...
तुम्हारा चकोर ...
आज भी इन्तिज़ार में है;
तुम्हारे मिलन के !

काश !!
मेरी ज़िन्दगी की खीर में ..
शरद की ...
इस पूरनमासी में ...
टपका देतीं तुम ...
अपनी एक बून्द शहद की ...
तो ...
संवर जाती ...
मेरी भी ज़िन्दगी और ...
अमर हो जाती ...
मेरी प्रेम कहानी !
काश !!

Thursday, October 13, 2016

ऐ ज़िन्दगी मेरा हिसाब कर दे !

सांझ होने को आई लेकिन
धूप ढलती नहीं ...
फ़िज़ाएं बदलती नहीं और
बादल बरसते नहीं !

सुबह ने बोला कि -
मेहनत कर ..
सांझ में सुकून मिलेगा !

दोपहर ने बोला कि -
मत घबरा ;
सांझ में सुकून मिलेगा ...
और सांझ में -
जब मैं पहुंचा कि -
ऐ ज़िन्दगी ;
मेरा हिसाब कर दे ...
अब सांझ की बेला ...
आ गई है ..
तो सांझ ने बड़ी -
तसल्ली से कहा की ...
घबराओ मत और
मेहनत करो ...
देखना कल की सुबह ..
बहुत सुनहरी और
सुखद होगी !

और ऐसे ही ...
सांझ के सुकून और
सुबह की सुनहरी ..
आशा की चाह में ...
दौड़ गया ...
एक पूरी ज़िन्दगी की ..
मैराथन दौड़ !

और आज जब ..
खोजता हूँ -
इतनी लम्बी दौड़ के बाद ..
सुकून के कुछ पल तो ..
बस ;
बुढ़ाता शरीर और
उखड़ी हुई साँसों के सिवा ..
ज्यादा कुछ नहीं दिखता !

वो तो शुक्र मनाओ ..
मेरे जीवट का ;
जो इस दहलीज पर ..
मुझे खुद के नागा सम्प्रदाय के होने का .. अहसास हुआ और
आत्मा ने समझाया कि ...
क्यों घबराता है ..
न सिकन्दर की ..
न अकबर की ....
औकात थी कि -
मौत के समय ..
कुछ ले दे कर ..
ज़िन्दगी को ..
"दाखिल दफ्तर" करें !

किसी को चीटियों ने खाया ..
तो कोई गंगा की खाद बना !
वाकई
बादशाहों को भी ..
नँगे बदन और खाली हाँथ ..
जाना पड़ा !

ये तो -
ज़िन्दगी का निचोड़ है !

दूर की हर चीज़ ..
सोना लगती है और
उसकी चाह में ..
ये निरा पागल मानव ..
भागता रहता है ;
सारी उमर और -
जब भोगने का वक़्त ..
आता है तो -
डाइबिटीज और
हार्ट पेशेंट बना कर ..
सबसे पहले उसका
खाना पीना ..
हराम किया जाता है और ..
फिर धीरे से -
रवानगी रजिस्टर पर ..
दस्तखत करवा कर
उसे
RIP कह कर ..
निबटा दिया जाता है !

तू क्यों घबराता है ?
जरा उनकी भी सोच ..
जिनकी ज़िन्दगी में -
हर रात के बाद ..
सुबह नहीं ;
बल्कि रात ही आती है ??

ज़िन्दगी !
अपना दस्तूर निभाती है
और तुझे !
अपनी सीरत निभा कर ..
इस बेअदब ज़िन्दगी को ;
तहज़ीब और मोहब्बत सिखानी है !

"तू अपना काम कर और
वो तो -
अपना काम कर के ..
तुझे निबटा ही रही है !"


Tuesday, October 11, 2016

हम जल गए और रावण जिन्दा रह गए !

बहुत कोशिश की ...
बहुत बारूद डाली ..
लेकिन
जला न सका मैं ;
कल रात ..
देश के रावणों को !

अरे!
एक आध रावण होता ..
तो यूँ ही मार कर ;
फांसी पर चढ़ जाता ..
लेकिन
यहाँ तो -चारों और
रावण तो रावण ..
अरे उसके भी पितामह 
खड़े हुए हैं !

रावण के तो दस सर थे ..
इन आधुनिक रावणों के तो ..
सैकड़ों सर हैं !

बहुत ही शक्तिशाली हैं ..
ये रावण के वंशज !

न जाने कौन सा 
वरदान है ..
इन अताताइयों को जो ..
इनकी मोटी खाल में -
कुछ भी ..
असर ही नहीं करता ?

बेशर्मी ,निर्लजता और गद्दारी से
सराबोर ये रावण ..
शायद उस त्रेतायुगीन ..
रावण के ही ..
वंशज होंगे ;
तभी तो ..
हनुमान जी द्वारा ..
लगाई आग का बदला ..
लेने ये वंशज ..
लंका से आकर ..
सारे भारतवर्ष को ..
जला रहे हैं !

सच !
कभी कभी लगता है जैसे -
जलाना ..
हमें रावण को था;
और आज -
रावण हमें जला रहे हैं !!

इन रावणों ने बदल दिए हैं - बाणों के नाम !

कभी काश्मीर तो कभी आरक्षण और धर्मनिरपेक्षता जैसे ....
सर्वव्यापी बाणों से ..
भारत वर्ष का ..
संहार करते हैं !

न ये डरते हैं और ..
न ये मरते हैं !

यदि भारतवर्ष को ..
बचाना है तो -
सिर्फ एक ही रास्ता है ;
इन बुढाते ,लँगड़ाते और
खांसते - खंखारते ..
रावणों को -
चुनाव में इनकी औकात दिखलाओ और ..
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम से-
आग्रह करो कि -
हे प्रभु !
ऐसी कोई "इंटरनल स्ट्राइक"  चलाओ की ..
ये सारे रावण ...
देश हित में ..
थोड़ा जल्दी ..
नरकारोहण की और
पलायन कर जाएँ !

जन्मदिन पर बेटे को चिट्ठी !

ओ मेरे अक्स !
मेरे शिखर !
मेरे हिमाद्रि !
तुम धीरे धीरे ...
बड़े हो रहे हो !
सयाने घने और
गहरे हो रहे हो !

प्रतिबिम्बित ...
शक्ति सामर्थ्य और
सफलता के लिए ...
कृतसंकल्पित अधीर और
दृढ़प्रतिज्ञ हो रहे हो !

जन्मदिन पर आज -
देना चाहता हूँ तुम्हें -
धूप ,उष्णता और उमस ..
तूफ़ान ,तपन और लगन ..
जिससे -
कल तुम्हें मिल सके ...
छाँव ,नमी और नमन !

बेटे !!
यही है जीवन का चलन !
थकन ,मिटन और फिर नमन !

"जो थका है ...
जिसने सर्वस्व ...
अर्पित किया है ;
वही कल नमित योग्य ..
होता है !"

बहुत सी शाखाएं -
तुम्हें बांधना चाहेंगी ...
कुछ लक्ष्य की और तो ..
कुछ कल्पनाओं की और ..
लपेटना चाहेंगी ..
पर साबित करना है तुम्हें ;
अपना चलन !
अपना पथ और अपना जनम !!

"सब्यसांची" @ अर्जुन !!
सरीखे बन ...
साबित करो तुम ...
तुम्हें पुकारने और ...
नामित करने का ..
मेरा चयन !

बेटे !!
तुम बड़े हो रहे हो !
चयन करो अपने स्वप्न ..
और कर्मठता से ..
भर दो उसमें ..
दिलेरी ,जीवटता
और तपन !

सब्यसांची @ का ..
मतलब ही होता है -
"पांच युद्ध कलाओं में -
पारंगत योद्धा द्वारा ...
लक्ष्य का दमन !!!!!!"

शुभ जन्मउत्सव के
आशीर्वाद सहित -

Sunday, October 9, 2016

अपना अपना दर्द ;अपने अपने हिस्से !

वक़्त लेता है ..
करवटें न जाने कैसे कैसे ..
उम्र इतनी तो नहीं थी जितने  सबक़
सीख लिए हमने ..!!

"जो जितना ...
जिसके हिस्से में है
वो उसको मिलता है !

जिसके साथ ...
जितना चलना लिखा हो ..
उतना ..
चलना ही पड़ता है !

कोई मायूस है ...
किसी का साथ ..
न मिलने पे और ...
कोई खुश है ..
किसी का साथ छूटने पे !

माना कि -
उम्र उतनी नहीं थी ..
लेकिन ,
उस उम्र में ..
दिल तो ..
लगा ही बैठे न  जनाब  ....?

अब जब सबकुछ ...
लगा ही दिया था ;दांव पे ..
तो बेफिक्री से ...
धुंआ धुंआ कर दो ...
उस ज़िन्दगी को ;
जिसने "खुशदिल इंसा " को ..
मयस्सर कर दीं ..
ये रुसवाईयाँ !

माना की -
उमर उतनी नहीं थी ..
हुजूरेआला की ..
लेकिन सबक भी तो ..
जल्दी जल्दी ..
पन्ने पलटा कर ..
पढ़े आपने ???"

Saturday, October 8, 2016

बेटियां सच में :एक पिता की सांस होतीं हैं !

                                                                      
और कुछ ऐसे ही ...
मेरे जैसे ही ...
मन में अनायास ...
घबराहटें होती है ..
जब बेटियां ..
थोड़ी बड़ी होती हैं !

पिता के चेहरे ..
बदलते देर नहीं लगती....
बड़ी बड़ी शख्शियतें ...
बदहवास होती हैं ;
जब बेटियां ...
थोड़ी बड़ी होती हैं !

छोटी सी उमर में ...
जब गले से चिपकती है ...
बेटियां तो ;
भविष्य के -
बिछड़ने के दर्द की आवाज़ ..
अनायास होती है !

सच !
बेटियां बड़ी होती हैं ...
तो घबराहटें ...
खरपतवार सी होती हैं ..
अनगिनित कयास होते हैं  ..
जिम्मेवारी ...
बेहिसाब होती है ...
क्यों की
एक पिता की बेटी ...
उसकी ...
श्नवास होती है !

बम्बरबैनी माता के श्रीचरणों में सैकड़ों भक्तों ने चढाई ५१ फुट की चुनरी ! "माँ जगदम्बे वीर जवानों को ऐसा वरदान दो ;कश्मीर के साथ साथ पूरा पाकिस्तान दो!" से गूंजा समूचा लवकुशनगर !


लवकुशनगर !
बुंदेलखंड की पावन स्थली लवकुशनगर की सुरम्य पहाड़ियों में स्थित माता बम्बरबैनी के मंदिर में आज सैकड़ों भक्तजनों ने ५१ फ़ीट की चुनरी चढाई। नगर के इतिहास में पहली बार दुर्गा माता मंदिर सिंचाई विभाग चंदला रोड से शुरू हुई ये चुनरी यात्रा माता बम्बरबैनी के पहाड़ पर विराजी माता के श्री चरणों पर अर्पित हो समाप्त हुई।बैंड बाजों एवम संगीत की धुनों पर थिरकते सभी धर्मों के अनुयाइयों का जोश देखते ही बनता था। भारत माता की जय , दुर्गा माता के जयकारों के साथ साथ -"माँ जगदम्बे वीर जवानों को ऐसा वरदान दो ;कश्मीर के साथ साथ पूरा पाकिस्तान दो" जैसे जोशीले गानों ने शोभा यात्रा को अविस्मरणीय बना दिया था।
यात्रा के संयोजक भाजपा युवामोर्चा के जिला महामंत्री दीपक खरे , वरिष्ठ नेता बाबूराम सिंह , बीरेंद्र सर्राफ, संजू बाबा  ,मनीष शुक्ल , महेश प्रजापति ,संदीप खरे , मयंक रिछारिया , अंकित शर्मा , शुभम बरनिया , कमलेश सिंह ,सोनू खरे ,शिवमंगल सिंह सेंगर ,श्याम स्वरुप खरे , दिनेश जड़िया ,संजय जड़िया , बीरेंद्र खरे ,धर्मेंद्र जैन  एवम जयकिरण सेन समेत सैकड़ों भक्तों ने यात्रा में शामिल हो कर कार्यक्रम को सफल बनाया।अस्सी वर्षीय वरिष्ठ पार्षद श्री रामस्वरूप खरे ने भी यात्रा का स्वागत किया एवम भक्तों से कहा कि -"उनकी मुरादें भी माता के चरणों में अर्पित करना। "
महिलाओं ने कलश लेकर यात्रा को सार्थकता प्रदान की। शासकीय कर्मचारी भी बढ़ चढ़ कर माता के कार्यक्रम में जुटे रहे। पुलिस बल पर्याप्त संख्या में रहा एवम प्रभारी नगर निरीक्षक श्री जादौन के नेतृत्व में पूरी तीन किलोमीटर की यात्रा में चप्पे चप्पे पर पुलिस व्यवस्था चुस्त दुरुस्त रही एवम जाम की स्तिथि नहीं निर्मित होने पाई। मीडिया भी शृद्धा के साथ माता की चुनरी के साथ कदम से कदम मिला कर चलता रहा।
यात्रा में उद्दघोषक जगदीश नामदेव रहे जिन्होंने अपने जोशीले नारों एवम उदगारों से माता की चुनरी यात्रा को ऐतिहासिक बना दिया।   

Monday, October 3, 2016

इस दिवाली ... एक छूटे हुए घर की पुकार !!

घर तो घर होते हैं ...
वे कभी दूर नहीं होते !

हाँ !ये अलग बात है कि -
ज़िन्दगी की दौड़ में ..
नए शहर और नए घरों में ...
वक़्त गुज़ारना पड़ता है !

हक़ीक़त में हम कभी उस घर को ..
भूलते ही नहीं ..
जहाँ कभी -
हम अपना बचपन छोड़ कर ..
जीवन समर में ..
आगे निकल आये !

माँ पापा या ...दादा दादी के ..
चारों और लहराती ..
छोटी छोटी बदमाशियां ...
तुलसीघरे के पास ..
माँ का ;
पूजा करता अक्स ...
बिजली की आंखमिचौली ..
और
माँ के पहलू में -सोने की जिद्द ;
ही तो -
वे उस बचपन के घर की ...
शास्वत दीवारें हैं ...
जो हम ..
ताउम्र सँजोये रहते हैं ...
सात समुन्दर पार भी !

एक हिंदुस्तानी ..
जब बाहर जाता है तो -
अपना सब कुछ ..
यहीं छोड़ जाता है ;
लेकिन
अपने घर को ...
जरूर ले जाता है ...
परदेश में ; और
फिर उस -
परदेशी नए घर को भी ...
वो सजाने की कोशिश ...
शुरू कर देता है ...
बिलकुल पुराने घर जैसा !

माँ पापा की फोटो ..
कहाँ लगेगी  ?
गणेश जी कहाँ विराजेंगे ?
कुल देवी / देवता की फोटो
कहाँ लगानी है ? और
बगीचे में कौन सा फूल लगाना है ?
जैसी -
बड़ी बड़ी से छोटी छोटी- बातें ...
तय कर देती हैं ..
एक हिंदुस्तानी की नींव ..
और उसकी बुलंदी !

हक़ीक़त में -
एक हिंदुस्तानी ...
चाहे संसार के ...
जिस कोनें में बस जाए ..
उसका हिंदुस्तानी वास्तुविद ....
और ज़िन्दगी में -
एक अदद घर ....
बसाने की "फ़िलॉसफ़ी"
कभी भी ख़त्म नहीं होती  !

हाँ !इतना जरूर है कि -
इस कश्मकश भरी दौड़ में ...
पूज्य माँ पापा को ...
चाहे जितने ..
अच्छे घर में रखो ...
जब कभी भी ....
घर की बात चलेगी तो
बरबस उन्हें
अपने हिंदुस्तान के ...
गाँव की याद आ जायेगी !

चलो दिवाली आ रही है ...
वे घर के गलियारे और बरामदे ...
तुम्हारी बाट जोह रहे है!

उन घरों के ..
कुछ वाशिंदे थे ...
जो अपना सफर पूरा कर ..
जा चुके हैं !

चलो इस दीपावली ..
हम सभी ..
अपनी जड़ों की तरफ ..
चलते हैं !

बचपन के घर की -
दीवारें ,देहरियां और आहते ...
इन्तिज़ार कर रहे हैं ...
अपने वारिसों की ...
कि वे कभी -
दिवाली में आएंगे और ...
प्रकाश के दिए जलाएंगे !

यही ज़िन्दगी है ...
रफ्ता रफ्ता ...
चलती जा रही है ...
सिगरेट की मानिंद ..
सुलगते सुलगते ...
राख बनने की दौड़ में !

चलो राख बनने से पहले ..
अपने गुमे हुए ..
बचपन के घर को ..
हल्का फुल्का ..
सवाँर लें !

Saturday, October 1, 2016

जलन तुम्हारे हीरो बनने की !


पाकिस्तान पर हमले में-
तुम्हारी ऐसी वाही वाही हुई ...
जैसे तुमने दिल्ली से ..
सीधे छलांग लगा कर ..
पीओके में -
खुद बमबारी कर दी हो ?

और फिर ..
हो भी क्यों न ?
आखिर -
"निर्णय नीति और निर्भयता" तो
तुम्हारी ही थी न ?

न तुम सोचते ...
न तुम बोलते और ..
न तुम खौलते ..
तो फिर तुम्हें तुम्हारे विरोधी
कैसे तौलते ??

बहुत ढूंढा ...
बहुत खोजा ...
बहुत मगज़मारी भी की ... लेकिन ..
एक नुक्स न मिला ...
तुम्हें नीचा दिखाने का !

न परिवार न आसक्ति ..
न धन न शक्ति ...
सिर्फ राष्ट्रभक्ति !

अरे ऐसी कैसी राष्ट्र भक्ति ??

बहुत कॊशिश की ...
कि कहीं से तुम ...
कमज़ोर दिख जाओ ...
लेकिन एक बार भी ..
एक अंश भी ...
एक अक्षर भी ...
और एक नुक्स भी
वे ढून्ढ न पाए !

तुम हीरो बन गए और ..
वे जीरो !
बड़ी गहरी माथापच्ची के बाद  ...
उन्हें कहना पड़ा कि -
"हम आपके साथ हैं !"

बस क्या कहूँ -
"न जाने कौन सज़दा करता है ;
तुम्हारे वास्ते ....
तुम कभी कभी डूबते भी हो .. तो
कमबख्त ..
समुन्दर उछाल देता है !"