"और मुहर्रम गुज़र गया !
मैं;सोचता रह गया ..
हाथों में नया रूमाल लिए ..
कि -
"वह आएगी ...
दुखी मन से ...
मुहर्रम पर तो -
मैं उसके आंसू पोंछ दूंगा !"
लेकिन ..
न वो आई न मेरे ख्वाब ..
सच हुए !
बस अब ...
ताज़िये हैं ;सुस्ताते हुए....
अगली मुहर्रम के इन्तिज़ार में ...
और मैं हूँ -
परेशां परेशां !"
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