Tuesday, October 18, 2016

और मुहर्रम गुज़र गया !

"और मुहर्रम गुज़र गया !
मैं;सोचता रह गया ..
हाथों में नया रूमाल लिए ..
कि -
"वह आएगी ...
दुखी मन से ...
मुहर्रम पर तो -
मैं उसके आंसू पोंछ दूंगा !"

लेकिन ..
न वो आई न मेरे ख्वाब ..
सच हुए !

बस अब ...
ताज़िये हैं ;सुस्ताते  हुए....
अगली मुहर्रम के इन्तिज़ार में  ...
और मैं हूँ  -
परेशां परेशां !"

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