Monday, October 24, 2016

मिटटी के मानुस का मिटटी से उचटता मन !

कितनी अच्छी होती थी ..
वो चिल्लर ..
जो भर देती थी ...
बचपन में ..
उमंगों की गुल्लक और -
रात में ...
जब हम सोते थे तो ...
बड़े आदमीं होते थे !

रोज़ सुबह ..
हाँथ फेर कर ..
जायज़ा लेते थे ..
उस बुलन्दी का ...
जो मिटटी से बनीं ..
हमारी गुल्लक होती थी !

अब समय के साथ ...
कुम्हारों ने भी -
बन्द कर दिया है ..
मिटटी की गुल्लकों को
बनाना ....
क्योंकि अब ...
बच्चों ने -
पैसों को छोड़ ...
रुपयों से दोस्ती कर ली है !
और
मिटटी की गुल्लकों ने ,,,
ले लिया है -
ड्राइंग रूम या बैठक में
करीने से प्राचीनता दर्शाती संग्रहित की गई
नायाब धरोहरों में स्थान !

ये कैसी दुनिया है मेरे भाई ???
जो ज़िन्दगी की आदतें थीं ..
वे क्यों बनतीं जा रहीं हैं -धरोहरें ??...
और मज़बूरियां ..
क्यों बनतीं जा रहीं हैं -आदतें ??

दीपावली में मिटटी के दिए छूटे ...
मिटटी की गुल्लकों का चलन छूटा और -
मिटटी के मटके या घड़े भी ...
जोह रहे है ..
अपनी उपलब्द्धता और चलन की
अंतिम साँसें !

मिटटी से दूर होता इंसान ...
आखिर में ...
मिटटी ही तो बन जाता है !

लेकिन उस मिटटी से ...
कतराता है ...
जो अंगीकार कर लेती है;
उसका वज़ूद ...
उसकी साँसें उखड़ने के बाद !!

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