महफूज़ रखा करो ..
"जज़्बातों" को ,
पुरानी चिट्ठियों के अंदर !
जमींदोज़ कर दो इसे ..
महफ़ूज़ियत से ..
किसी बर्तन के अंदर
कई दशकों के लिए !
जब कभी ..
सैकड़ों साल बाद ..
मोहब्बत जैसी -
किसी प्राचीन चीज़ की तलाश ...
मनोवैज्ञानिक करेंगे तो ...
ये चिठियाँ ...
उड़ेल देंगी ...
अपना सारा प्यार और पवित्रता ...
उन भटकते लोगों पर ...
जो खोज रहे होंगे ..
मोहब्बत और उसकी फितरत में ....
ईश्वर का वास !
क्योंकि ...
भगवान् भी मोहब्बत में ही बसते हैं !
अब कोई ...
मोहब्बत के नाम से ..
चिट्ठी नहीं लिखता !
न कोई कसमें खाता है ..
न वादों की भीड़ ..
लगाता है ;
और न -तड़प कर ..
आंसू बहाता है !
सिर्फ सेटिंग, प्लानिंग और मैनेज कर के ही ..
हो जाती है ..
डेटिंग और चैटिंग और
बेचारी मोहब्बत ...
बैठी रहती है ...
किसी मंदिर की ...
चौखट पर ...
अपनी पाकीजगी ..
बयां करती हुई !
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