Wednesday, October 19, 2016

करवे और चाँद के बदलते मिजाज !

न जाने कैसे ..
कुछ दशक पहले ..
उसके करवे का
चाँद बना था -
मैं !

लेकिन बस ..
वही ..
छुटपुट छुटपुट  -
कुछ पलों के लिए ही ..
उसका ...
भगवान् बना था ;
मैं !

अब सहा नहीं जाता ..
ये दस्तूर ..
ऐ दिल ;
उम्र के हर पहलू में ...
एक इम्तिहान बना था ;
मैं !

आज -
जब खड़ा होता हूँ ...
छत पर ...
जीवन साथी का चाँद बन ..
तो
क्यों याद आते हैं ..
वे अक्स ...
जिनके लिए कभी ..
मेहरबान बना था -
मैं !

बहुत कठिन होता है -
किसी के ..
जज्बातों से खेलना !
लेकिन ..
जब खेल और खिलाडी ..
दोनों रजामन्द हों तो ..
हार में भी और
जीत में भी ..
खुशियां तलाशनी पड़ती हैं !
और इन्हीं पलों में ....                                   जीवन का दस्तूर और ....                         इम्तिहान बना था मैं !

आह !
पता नहीं ..
तब श्मशान बना था; मैं ??
या अब ...
इंसान बना हूँ ; मैं ??

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