Tuesday, August 30, 2016

गमगीन शहर -दिल्ली !


दिलवालों का शहर -दिल्ली !
आज हो गया है ..
बेतकुल्लफी का शहर -दिल्ली !
अकेलेपन से जूझता  .....
शहर दिल्ली !
और
गुमनाम शहर दिल्ली !

कभी कभी दिख जाता है  -
मोबाइल सेल्फी में ....
खुद की मुस्कुराहटों को .....
तलाशता ...
शहर दिल्ली !
लेकिन ..
मोबाइल कैमरा ...
ऑफ होने के बाद ...
निहायत बिलकुल मायूस ,
अकेला शहर -दिल्ली !

परेशान दिल्ली ..
हैरान बाशिंदे ...और
दर दर भटकते ..
उसके परिंदे !

न इंसानों को ...
दिलवालों के दिलों में ...
जगह और
न परिंदों को ...
दीवारों में पनाह !

सब अकेले ...
सब तन्हा और गुमसुम !
भटकते रहते -दिनभर ...
बस झांकते ...
अपने ख्वाब और नयी ख़ुशबुएं ..
एक अनजानी दौड़ के पीछे !
हैरान बदज़ुबान दिल्ली !

नकली दिल्ली !l
लिपस्टिक और डिओ से लदी दिल्ली !
चुन्नी फेंक दिल्ली !
जीन्स टॉप की दिल्ली !
बियर बार ढूंढती दिल्ली और 
हरकिसी पे शक करती ..
बेज़ुबान दिल्ली !
नमकीन दिल्ली और
नाज़नीन दिल्ली !
आह ये कैसी गमगीन दिल्ली !

["लेखक -भारत के एक छोटे से गाँव के वाशिंदे हैं अतः सोच और मानसिकता का मतैव्य .....हो सकता है! "]

Saturday, August 27, 2016

आओ आज संडे मनाएं !

आओ आज किचन में घुंस कर अपने हाथों की चाय माँ पापा को पिलायें !
आओ कुछ पल कुर्सी सोफे से उतर कर ज़मीन में पैर फैला कर बैठें और अखबार पढ़ें !
आओ बाज़ार से कैंथा या टमाटर खरीद कर चटनी सिल बट्टे पर पीस कर पकोड़ी के साथ ऊँगली से चाट चाट कर खाएं !
आओ घर पर पुलाव या तिहरी बनवा कर पालथी मार कर थाली में फैला कर फूंक फूंक फूंक कर खाएं !
आओ आज माँ पापा या घर के बुजुर्ग के बालों में शेम्पू करें !
आओ किसी गाये को हरा चारा खिलाएं !
आओ किसी पुराने मित्र के मोबाइल की घंटी बजाएं !
आओ ब्लैक एंड वाइट ज़माने के कुछ नग्में गुनगुनाएं !
आओ आज संडे मनाएं !

Sunday, August 21, 2016

फरमाईश!

ज़िंदा रहते ...
जीने नहीं दे रहे हो और
इस खुशफहमीं में
जी रहे हो कि -"नेस्तनाबूत कर के ही दम लेना है इसका वज़ूद !"
चलो मुबारक़ हो तुम्हें- तुम्हारी ख्वाईश ...
और कोई हो ...
तो वो भी बता देना - फरमाईश !"

कशमकश और किशमिश !

कसमकश भरी ...
ज़िन्दगी में ..
किशमिशों की चाह
न रही !

अब तो -
ये समझ लो ..
जो कसमकश में मज़ा है ..
वह किशमिशों में नहीं !

उठा पटक सही ...
बेवफाई हो या दोगलाई ..
गद्दारी हो या रस्साकशी ...
हर तरफ ...
उसीने पटकनी खाई ...
जिसने किशमिशों की ...
बात चलाई और ..
धुरन्धर निकाल ले गए
जीत का सेहरा ...
कशमकश के बीच ...
क्योंकि -
उसने भी कभी थी -
धूल और नाकामी खाई !

गाय !गऊ ! या आवारा पशु ! कहानी एक नस्ल का नाम बदलने की !

देर रात -
घर के बाहर बैठीं गायें ..
ताकती हैं मेरे दरवाज़े को ...
रोज़ जूठन की रोटी की
आस में ...
कि शायद .....
मकान मालिक को ...
आ जाए कुछ दया और ..
"गऊ माता" समझ कर ...
शायद फेंक दे ...
दो चार जूँठन की "बची खुची" रोटियां और
इस पॉलीथिन और गत्ते से भरे पेट में ...
अन्न के कुछ दाने
ही पहुँच जाएँ !

रोज़ रात -
घर का ताला ..
लगाने जाते हुए ...
जब देखता हूँ ...
इन प्राणियों को ..
देखते हुए ...
अपना दरवाज़ा तो
अपराध बोध से ...
ग्रसित थके कदमों से ...
लौट आता हूँ ...
अपने कमरे में और -
हाँथ फेरता हूँ ...
अपने सोते बच्चों पर ...
पर तभी -
आँखों में कोंध जाती हैं ...
घर के बाहर ..
रोटी की आस में बैठी ...
गाय और उसके बछड़े !

काश! होता कोई सिस्टम जहाँ -
ई मेल कर देता ऊपर वाले को कि -
कुछ नहीं कर सकते तो ..
कम से कम ...
इन बेसहारा गायों के -
पेट की ..
लम्बाई चौड़ाई तो ...
कम कर दो ...
जिससे भूंख
जल्दी शांत हो जाया करे ...
इन निरीह प्राणियों की !
और हमें भी ...
गाए की राजनीति से ..
मुक्ति मिल जाए !

अब तो ...
कोई भी परीक्षा में ..
कई बरस से -
छोटी कक्षा के ...
हिंदी के पेपर में -
"गौमाता" पर निबंध भी नहीं आता !

लगता है जैसे कि -
"सरकारों "ने रोक दिया है  ..
अध्यापकों को कि -'गौमाता" पर निबंध न दिया करें !
वरना -
अराजकता का माहौल बन सकता है !

धीरे धीरे भूलने लगे हैं हम ... -"गाये" को "गऊ माता" बोलना या फिर "बछड़े" को "नन्दी" बोलना !

बहुत तेज़ी से ..बदल रहे हैं हम ..
अपना शब्दकोश ...
और
दोस्तों के बीच ..
हम खुद अपने बाबूजी या पिताजी या पापा को
बोलने लगे हैं -
"डुकर या डैड या बूढ़े आदमीं/ओल्ड मैन "
तो फिर "गाये" जैसी -
आवारा चरने वाली ...
धरती की बोझ को हम कैसे -
"गऊ माता" बोल कर
अपने आधुनिक शब्दकोश की
डिक्शनरी के पन्ने भारी करें ?

कम से कम ..कुछ नहीं तो ...
सरकारें -सी.आर.एस सिस्टम -
(काऊ रिजर्वेशन सिस्टम) ही लागू कर दें -
तो शायद
गाये नस्ल को पुनः
बीता  स्वर्णम काल
नसीब हो जाए !

ज्यादा कुछ नहीं -
बस जिनके -आधार कार्ड में सी.आर.एस.चढ़ा होगा ...
उन्हें सरकारी नौकरियों में ५% आरक्षण का
प्रावधान होगा !

शायद ...
आरक्षण के चक्कर में .....
लोगबाग फिर से -
"गाये" को "गऊ माता" कह
उसकी कदर करने लगें !

Saturday, August 20, 2016

ज़िन्दगी में -नफा नुकसान

आज बारिशें हैं ...
तो खिसिया रहे हो !
कल सूखा था ...
तो गिगिया रहे थे !

आज पानी ही पानी है ..
तो मर रहे हो !
कल पानी नहीं था ...
तो मर रहे थे !

कल मोहब्बत थी तो..
औकात नहीं थी और
आज औकात है तो ..
मोहब्बत नहीं !

कल ख्वाइशें थीं तो ...
हम नंगे थे !
आज हम उजले है ...
तो ख्वाइशें ...
तफरीह करने निकल गईं !

बस ऐसे ही ...
चलता रहता है ...
ज़िन्दगी का पहिया !

जब धूप चाहिए ...
तो छाँव मिलती है और ..
जब छाँव चाहिए तो ...
धूप !

बहुत अधिक ...
किसी को चाहो तो ..
वो जुदा हो जाता है और ..
नफरत करो तो ....
ताउम्र आसपास ही
मंडराता है !

और यही ...
ज़िन्दगी का तसव्वुर
हमें सताता है कि -
कुछ भी हमारे हाथ ...
नहीं आता है !

बहुत ध्यान देने के बाद भी ...
ज़िन्दगी की देगची का ..
दूध उफ़न ही जाता है !

इसलिये बहुत अधिक ..
सौदा न करो ...
ज़िन्दगी से !

नफे नुक्सान की
उम्मीद में ..
कुछ भी हाँथ ...
नहीं आता है !

इंसा खाली हाँथ ....
आया था और ..
खाली हाँथ जाता था !

खोखली हंसी!


अब जो कुछ है -यथार्थ है !
निज स्वार्थ है !

नित रोज ..
बदलते चेहरे देख रहा हूँ ..
कुछ अपनों के ...
तो कुछ ..खुद के भी !

उन चेहरों के बीच ...
कोशिश करता हूँ ...
हँसने की या हंसाने की ..
क्योंकि ..
आज कल -
हंसते हुए चेहरे ...
बमुश्किल देखने को ...
मिलते हैं !

खौलता कश्मीर ..
खोखली कांग्रेस ..
खिसियाता सवर्ण ..
और
खामोश हिंदुस्तानी ...
हर तरफ दिख जाएंगे ..
परंतु
खिलखिलाता युवा मन ..
खिलखिलाता बचपन ...
और
खिलखिलाता यौवन ...
नहीं दिखेंगे !

तो चलो !
अकेले में ..
मोबाइल के कैमरे के सामने  ही ...
खिलखिला लें ...
कुछ पलों के लिए ...
अपनी खोखली हंसी के साथ !"

Wednesday, August 17, 2016

यार !इस राखी ! तुम फिर आ गईं ?

आज फिर तुम आ गई ?
ठहरे हुए पानी में ..
हलचल मचा गईं ..
बुझी हुई ...
चूल्हे की राख को ..
फिर कुरेद कर ...
सहला गईं ...
आज फिर तुम आ गईं ?

भले "राखी" के नाम से ..
अपने पीहर आ गईं ..
पर हम मुरझाये पेड़ों को  तो ...
बसन्त सी खुमारी में ..
फिर उलझा गईं ?
यार !
आज फिर तुम आ गईं ?

थोड़ी सी ..
बदल गई है सूरत ..
और थोड़ी सी ..
बिसरा बिसरा सी भी गईं है -तेरी मूरत ..
कुछ कुछ ...
बदल भी गई है -रंगत ..और
थोड़ी सी मुरझा भी गईं है -
चाहत !
यार ! आज फिर तुम आ गईं ?

हाँ ! इतना ज़रूर है कि -
मेरे पूरनमासी के चाँद में ...
कुछ कुछ ..
बदली सी छा गई !
लटों में लगी मेहँदी ने ..
अपनी रंगत दिखला दी !
सफेद होते बालों ने ..
गुज़रे दिनों की -
आँखों पे छाती लटों की ..
यादें ताज़ा करवा दी !
यार ! आज फिर तुम आ गई !

अब न वे दिन ..न वे रातें !
न वे मन ..न वे बातें !
बस !सूखी सूखी ज़िन्दगी ..
और बीती हुई बातें !
छिटके हुए ख्वाब और ..
बिन तेरे ...
तेरी ही बातें !

जो आँखें ..कभी उठती थीं ..
मेरी आवाज़ पे ..
जो होंठ ..कभी लरजते थे ..
मेरे अंदाज़ पे ..
आज ..
छिटक कर ..दबे पाँव ..
निकल गए ..बगल से ..
बेपरवाह से !
यार! आज ...
फिर तुम आ गईं ..
और उस बुझी बुझी सी ..
आग को ...
फिर सुलगा गईं ...
अपने
चिरपरिचित अंदाज़ में ?

यार !तुम फिर :राखी" में आ गईं और
छत -मुडेरों और मन्दिरों की घण्टियों को बजा गईं ..
हरी हरी गद गद इस प्रकृति को फिर से सहला गईं ?
यार तुम फिर आ गईं ?

Saturday, August 13, 2016

मेरा साया !

ढूंढना अपने अंदर ..
आज भी ...
तुम्हारे भीतर ...
छुपा हुआ हूँ ;
मैं ...
इस जन्म का ..
कटु और बिसरा हुआ .....
अनुभव बन !

जब जब -
सच और झूंठ ...
कस्मे वादे ...
प्यार वफ़ा ..और ...
शिद्दत से ...
चाहतों की बातें होंगी ...
या टकराएंगी तुझसे ..
किसी भी रूप में ...
तुम्हें मैं ..
याद आऊंगा और ..
तुम्हारे हर फैसले के पीछे ..
मेरा साया होगा ..
एक अनुभव बन!

तुम अपने हर फैसले में ...
और फलसफे की नींव में ....
मुझे और मेरी कहानी को ...
शामिल पाओगी ...
हमेशा हमेशा !

जब भी तुम्हारा बेटा या बेटी .....
बड़ी हो रही होगी ..
और ..
थोड़ी थोड़ी ..
परेशान होगी ..
तुझे मैं जरूर ...
याद आऊंगा !

देखना तुम अपने घर में ..
सबसे पहले ..
अपने "बेटे-बेटी" के दर्द में ..
खुद को शामिल पाओगी .. और
उनकी परेशानियों में ...
मुझे तलाशोगी ...
मरहम भी लगाओगी....
क्योंकि -
अक्सर उस उम्र में ...
जिस उम्र में -"आज या कल" तुम्हारे बच्चे होंगे ..
ऐसी परेशानियों की निज़ात  ...
सिर्फ तुम्हारे ही बस की ...
बात होती थी !

जानती हो न ..
तुम तो -"बायो" की स्टूडेंट थी ...
प्यार के "अंकुर" भी ...
माँ बाप से औलादों को ...
ट्रांसफर होते हैं ..
डीएनए बन !
और ...
यही कुछ बातें होतीं हैं ...
जब हम ...
अपने बुढापे में कहते हैं कि ...
इस लड़के/लड़की ने तो ...
हद ही कर दी ..
बहुत समझाया ...
समझते ही नहीं !
पता नहीं ...
उस लड़के में क्या है ???

अरे भाई ...
"रिवर्स" का बटन दबाओ और ..
थोड़ी अपनी हरकतों ...
या अदाओं पर ...
भी नज़रें मार लो ..

तुम भी कुछ कुछ
ऐसी ही थीं ...
और तुम पर भी
कुछ ऐसी ही गुज़री थी

जैसा आक्रोश ..
आज इन बच्चों में है ..
उससे ज्यादा आक्रोश ...
और पागलपन ..
"तुममें" या "हम दोनों" में था
"पचीस से तीस" बरस पहले !

इस लिए ...
कोशिश करो की ..
"हमदोनों" की ...
पुनरावृत्ति न हो और ..
इन बच्चों की नांव ...
जिस दिशा में भी जाए ....
उस दिशा में ....
उन्हीं को खुद खेने दो और  ....और
फैसले करने दो ....
खुद की ज़िन्दगी के !

बस इतना करना कि -
"वासना और प्रेम" में अंतर ..
"प्रेम और समर्पण" में अंतर ..
"क्षणिक" "क्षणभंगुर' और "सात जन्मों" के ...
प्रेमपाश का अर्थ ....
जरूर समझा देना उन्हें ..
जिससे कभी ...
मुश्किल की घडी में ...
वे ये न सोंचें कि -
"मम्मी या पापा" ने ...
ये बात तो बताई ही नहीं थी और अब क्या करें ?

प्यार में भी होंसला चाहिए वर्ना
ज़िन्दगी सिमटते देर नहीं लगती !

Friday, August 12, 2016

भाई !

कल तक -जो ....
साथ साथ सोते थे ..
साथ साथ चलते !
साथ साथ हंसते थे ...
और मिलकर रोते !
समय के पहिये ने ....
रफ्तार क्या पकड़ी ...
तरक्की की ;
कि अब अपने ही ....
मोबाइल पर कहने लगे हैं -फोन रखें !

अच्छा हुआ जो ...
गुज़रे ज़माने में ...
ये मोबाइल तो नहीं थे !
कम से कम ....
उनका दिल तो ..
नहीं टूटा....
ये सुन कर कि -
"फोन रखें" !

"देश काल और ज़िन्दगी में सफलता असफलता के बीच संस्कारों सभ्यताओं और सुविचारों का सामंजस्य बनता और बिगड़ता रहता है !"

Thursday, August 11, 2016

पन्द्रह अगस्त !


एक सब्र ही तो है जो एक आम हिंदुस्तानी के पास बेशुमार है:
  • काश्मीर को युद्ध का मैदान बंनने देने का सब्र।
  • भारत को गाली देने पर उसे सुनने की सब्र।
  • पाकिस्तानी झंडों को काश्मीर में लहराते देखने का सब्र !
  • दलित के नाम पे चुनाव की बिसात बिछने देने का सब्र।
  • आरक्षण के नाम पे नए माई-बापों के पैदा होने पर उन्हें झेलने का सब्र।
  • संसद में काश्मीरी बगावत को शह देने वालों के भाषण को सुनने का सब्र।
  • मोदी को बेइज़्ज़त करने की जगह तलाशते नेताओं को जबरदस्ती सहने का सब्र।
  • देश के दुश्मनों को देश का ही नमक खा कर नमक हरामी करते देखने का सब्र।
  • देश के रक्षक -सेना पर मिथ्या आरोप लगाते गद्दारों को सुनने का सब्र।

और
हमारा इतने सारे झूठों के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने का सब्र ।

जागो भारत जागो !
एक दिन तो सोचो इन गद्दारों के खिलाफ !








Monday, August 8, 2016

प्रेम के चिरन्तन सत्य !

अगर हो जाए दीदार ;आज ..
तुझ से मेरा ....
जुदाई के ...
पचीस बरस बाद ..
तो यकीनन ...
झुक जाएंगी तेरी नज़रें ...
मेरी सलामती और ...
बेफिक्री देख के !

बड़े बड़े कसीदे पढे थे ;
जो मैंने ...
तुझ से जुदा होने पर -
मिट जाने के ..
वो टूट जाएंगे ...
एक क्षण में ...
मुझे मुस्कराता देख कर !

हक़ीक़त तो यह है कि ...
मरता नहीं कोई ...
किसी की जुदाई में -
ये तो बस ...
उम्र के ...
दो पलों का फितूर है ....
जो जुबां को अपनी तरफ मिला कर ....
शब्दों का आकार ...
ले लेता है ...
और  ...
हम गुज़ार देते हैं ...
एक उम्र ;
कस्मे वादों की खातिर ..
किसी के -
इन्तिज़ार में !

फिर जब ...
मोहब्बत दोनों और से ..
होती है तो ..
फिर इन्तिज़ार ...
दोनों क्यों नहीं करते ???

एक गुज़ार देता है ...
सारी ज़िन्दगी ..
इस खुशफहमी में कि -किस्मत ने दिए धोके ...
वरना ...
वो होती तो ...
मेरी होती !!

और वहीँ दूसरी और ..
" तुम " चल देती ...
किसी और का ...
हाँथ थाम के कि -
यही है जीवन का दस्तूर ...
भले ही हमें हो वो नामंज़ूर !

और यही कुछ ...
चिरन्तन सत्य हैं ...
जो मैंने समझे और जाने ..
और आज ...
तुम्हें इतने सालों बाद ..
देख ..
लगा मैं -मुस्कुराने !!

Sunday, August 7, 2016

नागपंचमी!

इस नागपंचमी ..
सपेरों ने दर्शन नहीं कराये .....
उन देवताओं के -
जिन्हें हम -
नाग देवता कहते हैं !

पता नहीं ..
किसी डर से अथवा ...
अब अस्तित्व में नहीं रहे -नाग ....
और इस काल में ...
अब कोई नहीं देता -
नाग देवता के दर्शन पर ..
दक्षिणा !

फिर अब ...
नागों को पकड़ने और ..
बीन बजा कर ....
नागिन डांस के भी ...
दिन लद गए !

अब कहाँ वह ....
दादी अम्मा ...
जो देती थीं "सीधे" में गेहूं और गुड़ ....
और नातियों को ...
नाग देवताओं के दर्शन करवातीं थीं !

न वे बूढी ,जर्जर, ममतामयी दादियां ..
रहीं और ....
न वे नाती ...
जो इंतिज़ार करते थे -
ख़ौफ़ज़दा हो कर कि -
नागपंचमी आ रही है और शेषनाग भगवान् के वंशजों के दर्शन करेंगे !

आधुनिक मानवीय नागों ने ..
ले ली है -
जगह ...
उन पुरातन नागों की ....
और अब ये -
आधुनिक नाग ....
सिर्फ विषैले ही नहीं होते ...
वरन खूंखार और चालाक भी होते हैं !

आईये तय करें नागों का  पैमाना जहां ...
देश काल और मज़हबी रंगों ने  बदल दी है -एक नस्ल की पहचान !
बचाएं नागपंचमी के-
अंतर्निहित भाव को !
सपेरों की प्रजाति को !
बीन की तान को !
और
भारतीयता के रचे बसे प्राण को !

Saturday, August 6, 2016

हम खुद बन गए हैं सांप !


क्यों साँपों को करते हो बदनाम ...
उनकी डसने की कला पर ?
उनसे ज्यादा तो हम खुद ..
एकदूसरे को डसते रहते हैं ...
अपनी जहरीली कारगुज़ारियों से !

खुद ईश्वर ने -
किया था उनको ...लबालब ...
उस जहर से ...
जो आज ..
हमने छीन लिया है ...उनसे ...
और डसते रहते हैं ..
अपनों को ही ..
रात दिन !

वो तो बिचारे ..
तभी डसते हैं ...
जब कोई करता है ...
उन पर वार !
पर हम तो बस ...
यूँ ही डसते रहते हैं ...
रात दिन ...
उन सभी को ..
जो बढ़ गए हैं ...
आगे हमसे ..
अपनी मेहनत ..
और लगन से !

साँपों के जहर से खतरनाक है हमारा जहर !
उनके जहर का ...
तो इलाज़ है !
या एक लाठी का प्रहार कर देता है  उनका काम तमाम !
पर
काश्मीर के साँपों का ...
नक्सलवाद के साँपों का ..
राजनीति में घुसे ...
आपराधिक प्रवित्ति के साँपों का ..
दलित राजनीति करने वाले साँपों का ..
असहिष्णु साँपों का ..
भारतीय पुरूस्कार लौटाते साँपों का ..
क्या उपचार है ??

आज नागपंचमी है !
आओ पूजें ...
इन कलयुगी साँपों को ...
और निवेदन करें -
कि ये लौट जाएँ ...
अपने अपने बिलों मैं वापस ...
अपने अराजक जहर के साथ ...
और न डसें ...
हमारी "बची - खुची" ....
भारतीयता को ;
जिससे ज़िंदा रहे भारत !!!

बदलते बदलते!

दोस्त बदले ...
मोहब्बत बदली ..
घर बदले ..
शहर बदले ...
लक्ष्य बदले ..
और आखिर में ..
ख्वाब भी बदले !
हे भगवान् !
सब कुछ बदला सिर्फ तेरे सिवा !
एक बार बस एक बार ..
मुझे भी बदल दे ...
मेरे मौला !!!

Thursday, August 4, 2016

मकान मालिक!

एक मकान मालिक सी गुज़र गई ज़िन्दगी ..
लोग मिले ..
कुछ दिन "दिल" में ठहरे ...
और बिना "किराया" चुकाए चलते बने !

जब जब "किराया" चुकाने की बारी आई ..
और मैंने उनकी "आँखों" में झांक कर किराए के रूप में अपने को तलाशा ...
उन्होंने "मकान" खाली कर दिया !

जब "घर" में कदम रखा था तो -
"सात जन्मों" से "सात फेरों" तक ...
साथ देने की शर्तें ...
आसानी से मानते थे लोग  !
और जरा सी हवा क्या लगी शहर की ...
मैं और मेरा "नाज़ुक घर" दुत्कार दिया गया कोई इल्ज़ाम लगा कर !

दुःख ....
किराया न मिलने का नहीं है  .....बल्कि
दुःख ...
इस बात का है कि -"इतने गज़ब" किरायेदारों के साथ चलते चलते ...
बिचारे घर की हालत बहुत जर्जर हो गई है ...
खिड़की दरवाज़े और दीवारों पर ....
खोद खोद कर ....
भाई लोगों ने गोद दिए हैं ... अपने नाम और पते !

अब चाहे जितनी पुताई या पोलिश करवाओ ..
कमबख्त "निशाँ" नहीं मिटते ....
और नए किरायेदार तो अब दूर से ही मुस्करा कर निकल जाते हैं ...
पतली गली से !

इतनी आंधी बारिशें और तूफान ...
झेल चुका हैं ये ....
"खंडित खंडहर" कि अब ... लगता है कि -
"खता और खफा ' समझने में गुज़र गयी "ज़िन्दगी" और मैं खड़ा रह गया उस "किरायेदार" की खोज और इन्तिज़ार में जो कभी नहीं आया !

और अंतिम प्रहर में "वो" जो आया भी तो गंगाजल की भांति आया ...
छिड़क कर अपनी "गंगाजली बूंदें " ....
कर दिया उसने ...
"पावन और पवित्र" उस ... 
अंतर्मन को जिसे देख कर लोग "हंस" ....
कर आगे बढ़ जाते थे !

अंतिम किरायेदार ! भी उस "मिटटी के दिए" की भाँती आया कि -....
जिसने "सोख" लिये अपनी दीवारों में मेरे सारे "रन्जो गम" और बना दिया मेरे जर्जर मन को मज़बूत किला !

Monday, August 1, 2016

यादें दरख्तों और मुडेरों पर बसे जज़्बातों की !

कनखियों से ...
देख लेता हूँ ;आज भी ...
तेरे घर की मुढ़ेर ...
जब भी निकलती है -बस ;
तेरे शहर से !

मैं तो बदल गया ....पर
इन बेशर्म आँखों ने ..
नहीं छोड़ा ...
उस देहरी को तकना ...
जहां मिलती थी कभी ...
उन्हें बेशुमार पनाह !

माना कि -
अब ...न ..तू है ...
और न ...तेरी परछाईयाँ ...
जो अक्सर ...
टँगी रहती थीं ..
छत की मुडेरों पर ...
लाल पीली चुनरी बन ...
मेरे इन्तिज़ार में !

लेकिन -
मकान के सामने ..
पीपल के पेड़ के नीचे की मढिया ...
तो आज भी ज़िंदा है ...
अपने टूटे -फूटे रूप में -
जहां "हम दोनों" की ..
सलामती की चाह में ...
सैकड़ों बार तूने रखी थी -
"दिया और बाती" !

इंसा चला जाता है ...
प्यार चला जाता है ...
ख्वाब ...
ओझल हो जाते हैं ..
और यादें तक ...
सिमट जातीं हैं ...
लेकिन -
दरख्त नहीं बदलते !
मकान नहीं बदलते !
या यह कह लो की...
मोहब्बत में -
"फरयादी तो बदल जाते हैं ..
पर गवाह नहीं बदलते !"

वे खड़े रहते हैं ..
मूक बघिर बन ...
किसी के ...
सपनों के महल के ..
राख होने तक के ...
सबूत बन !

आगे आने वाले लोगों को ..
बताने के लिए की ..
यहां "दिलों की बस्ती" ...
भूल कर भी न बसाना ...
यह ज़मीन खंडित है !

कभी यहां ...
कुछ पंछियों ने ..
घोंसला बनाने का ...
ख्वाब देखा था ...
जो फिर ..
बन न सका और
बन गया ...
यहां श्मशान !

खंडहर में कुछ दिए हैं ...
टूटे हुए से ...
उन्हीं से काम चला रहा हूँ  ;
ऐ दोस्त !
सच !तेरे बिछड़ने के बाद ...
बहुत उदास हैं ....
ज़िन्दगी की रातें !"