Monday, August 1, 2016

यादें दरख्तों और मुडेरों पर बसे जज़्बातों की !

कनखियों से ...
देख लेता हूँ ;आज भी ...
तेरे घर की मुढ़ेर ...
जब भी निकलती है -बस ;
तेरे शहर से !

मैं तो बदल गया ....पर
इन बेशर्म आँखों ने ..
नहीं छोड़ा ...
उस देहरी को तकना ...
जहां मिलती थी कभी ...
उन्हें बेशुमार पनाह !

माना कि -
अब ...न ..तू है ...
और न ...तेरी परछाईयाँ ...
जो अक्सर ...
टँगी रहती थीं ..
छत की मुडेरों पर ...
लाल पीली चुनरी बन ...
मेरे इन्तिज़ार में !

लेकिन -
मकान के सामने ..
पीपल के पेड़ के नीचे की मढिया ...
तो आज भी ज़िंदा है ...
अपने टूटे -फूटे रूप में -
जहां "हम दोनों" की ..
सलामती की चाह में ...
सैकड़ों बार तूने रखी थी -
"दिया और बाती" !

इंसा चला जाता है ...
प्यार चला जाता है ...
ख्वाब ...
ओझल हो जाते हैं ..
और यादें तक ...
सिमट जातीं हैं ...
लेकिन -
दरख्त नहीं बदलते !
मकान नहीं बदलते !
या यह कह लो की...
मोहब्बत में -
"फरयादी तो बदल जाते हैं ..
पर गवाह नहीं बदलते !"

वे खड़े रहते हैं ..
मूक बघिर बन ...
किसी के ...
सपनों के महल के ..
राख होने तक के ...
सबूत बन !

आगे आने वाले लोगों को ..
बताने के लिए की ..
यहां "दिलों की बस्ती" ...
भूल कर भी न बसाना ...
यह ज़मीन खंडित है !

कभी यहां ...
कुछ पंछियों ने ..
घोंसला बनाने का ...
ख्वाब देखा था ...
जो फिर ..
बन न सका और
बन गया ...
यहां श्मशान !

खंडहर में कुछ दिए हैं ...
टूटे हुए से ...
उन्हीं से काम चला रहा हूँ  ;
ऐ दोस्त !
सच !तेरे बिछड़ने के बाद ...
बहुत उदास हैं ....
ज़िन्दगी की रातें !"

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