Wednesday, August 17, 2016

यार !इस राखी ! तुम फिर आ गईं ?

आज फिर तुम आ गई ?
ठहरे हुए पानी में ..
हलचल मचा गईं ..
बुझी हुई ...
चूल्हे की राख को ..
फिर कुरेद कर ...
सहला गईं ...
आज फिर तुम आ गईं ?

भले "राखी" के नाम से ..
अपने पीहर आ गईं ..
पर हम मुरझाये पेड़ों को  तो ...
बसन्त सी खुमारी में ..
फिर उलझा गईं ?
यार !
आज फिर तुम आ गईं ?

थोड़ी सी ..
बदल गई है सूरत ..
और थोड़ी सी ..
बिसरा बिसरा सी भी गईं है -तेरी मूरत ..
कुछ कुछ ...
बदल भी गई है -रंगत ..और
थोड़ी सी मुरझा भी गईं है -
चाहत !
यार ! आज फिर तुम आ गईं ?

हाँ ! इतना ज़रूर है कि -
मेरे पूरनमासी के चाँद में ...
कुछ कुछ ..
बदली सी छा गई !
लटों में लगी मेहँदी ने ..
अपनी रंगत दिखला दी !
सफेद होते बालों ने ..
गुज़रे दिनों की -
आँखों पे छाती लटों की ..
यादें ताज़ा करवा दी !
यार ! आज फिर तुम आ गई !

अब न वे दिन ..न वे रातें !
न वे मन ..न वे बातें !
बस !सूखी सूखी ज़िन्दगी ..
और बीती हुई बातें !
छिटके हुए ख्वाब और ..
बिन तेरे ...
तेरी ही बातें !

जो आँखें ..कभी उठती थीं ..
मेरी आवाज़ पे ..
जो होंठ ..कभी लरजते थे ..
मेरे अंदाज़ पे ..
आज ..
छिटक कर ..दबे पाँव ..
निकल गए ..बगल से ..
बेपरवाह से !
यार! आज ...
फिर तुम आ गईं ..
और उस बुझी बुझी सी ..
आग को ...
फिर सुलगा गईं ...
अपने
चिरपरिचित अंदाज़ में ?

यार !तुम फिर :राखी" में आ गईं और
छत -मुडेरों और मन्दिरों की घण्टियों को बजा गईं ..
हरी हरी गद गद इस प्रकृति को फिर से सहला गईं ?
यार तुम फिर आ गईं ?

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