Saturday, April 30, 2016

उपन्यास -परछाइयों का!

उपन्यास -परछाइयों का!
हम दोनों!
समुन्दर में डूबे नहीं...
पहाड़ों पर घूमे नहीं...
और
बरसती फ़िज़ाओं और महकती हवाओं में..
खोए नहीं...
और
यही कुछ बातें...
हमारे "उपन्यास" की..  किवदन्ती कहानिया..
और जीवन स्पंदन बन गई...
इस जनम के लिए!

मेरी तेरी...
कहानी  में
"हम" शब्द न आ पाया तो क्या हुआ...
यही नियति और उसका दस्तूर था...
जिसे हमने निभाया भी....
बड़ी ही पाकीजगी... और संजीदगी से...
और...
हम-दोनों की यही बात..  गवाह बन गई की -
दो परछाइयों ने कोशिश  तो की थी -
हम साया बनने की...
पर
ऐसा हो न पाया!

कुछ न कुछ...
रूहानी तो होता है...
जिसपर...
हमारा बस.
नहीं होता...
और
वही रूहानी वाक्या... बन जाता है...
एक पूरी ज़िन्दगी का तिलिस्म!

जब कुछ अच्छा हो जाता है...
तो यकीन नहीं होता न.. की ये हमने किया है???

मेरा तुम्हारा प्यार भी ... कुछ ऐसा ही...
हो गया था!
जिसे...
हम दोनों ने...
नहीं किया था...
इतना पावन और पुनीत...
बस...
यूँ ही...
हो गया था...
कुछ ऐसा की...
अब ..
हम जब कभी भी... मिलेंगे...
तो हमारी नज़रें....
न झुकेंगी....
एक दुसरे के सामने!

हमने नहीं किया -
प्रकृति को अनावृत...
सौंदर्य को सशंकित... और
प्रेम को कलंकित...
बस ..
हवा की मानिंद मिले...  और
पेड़ के झरते पत्तों की मानिंद...
दूर हो गए...
हमेशा के लिए -
अनछुए...
अनासक्त और अविचलित!

आज...
जब हमदोनों के बच्चे...
बड़े हो रहे हैं...
तो शुक्र है...
हम-दोनों...
अपने फूलों से...
वही सोंधी मिटटी की महक की उम्मीद...
कर सकते हैं...
जो कभी..
हमने अपने अंदर समेट कर...
रचाई और बसाई थी..
प्रेम की सार्थकता और पवित्रता की खातिर!!

Monday, April 25, 2016

मैं ; अविचलित!

सूनी काली रातें...
कुछ बीती बातें...
और मैं ;अविचलित!

बिछड़ते हुए अक्स...
कुछ बीतीं यादें...
और मैं ; अविचलित!

बड़े होते बच्चे...
कुछ शरारतें सुहानी...
और मैं ; अविचलित!

अपनों से दूर होता भरोसा...
कुछ गद्दारियां नमकीन..
और मैं ; अविचलित!

जर्जर होता शरीर...
बंज़र होते सपने...
और मैं ; अविचलित!

ईश्वर पर बढ़ती आस्था..
ज़िन्दगी की छूटती गाडी और मैं ;
अविचलित!

साथ साथ चलते..  गुज़रता सफर...
तेरा हाथ थामे चलती ... ज़िन्दगी..
कौन पहले?
रह रह कर डराता..  वक़्त..
हमारा शास्वत प्यार और मैं ; अविचलित! "

Thursday, April 21, 2016

Earth Day!

"प्यार रिश्ते और
मोहबतें...
सब बेमानी...
बिन तेरी..
दो बूँद पानी!

ऐ मालिक!
कर दे रहम
और बरसा दे...
अपनी रहमत...
इस बरसात!

सूखे कंठ से...
स्वीकार करो...
मेरा वंदन मेरा क्रन्दन!"

ज़िन्दगी की खिचड़ी!

चूल्हे की धीमी आंच में पक रही है-
ज़िन्दगी!
आहिस्ता आहिस्ता....
धीरे-धीरे...
बिलकुल -
अपनी मोहब्बत के जैसे...
तप रही है.. ज़िन्दगी!
खप रही है -ज़िन्दगी!
खिसक रही है -ज़िन्दगी
निचुड़ रही है -ज़िन्दगी!

हर बार -
"ज़िन्दगी की देगची"
के ढक्कन को उठा कर देख लेता हूँ....
की कितनी पकी?
और कितनी रह गई है ; अधपकी?
मेरी ज़िन्दगी की मेरी  खिचड़ी?

कभी ....
उँगलियों से मिथिलता
हूँ...
तो कभी जीभ से चखता हूँ....
खुशबू से भी सोचता
हूँ...
अब बहुत वक़्त हो चूका...
पक गई होगी
ज़िन्दगी!
पकते पकते थक न
गई हो -ज़िन्दगी!

इसी उहापोह में...
उठा देता हूँ...
कभी कभी....
"ज़िन्दगी की खिचड़ी" का वजनी ढक्कन......
और देगची के..... ढक्कन के भीतर...
दिख जाते हैं.....
वे सारे स्वाद या परिदृश्य.....
जो मेरे ही कर्मों का.... प्रतिफल और प्रतिबिम्ब हैं....

ज़िन्दगी के.....
चूल्हे-चौंके में...
आंसूं तो बहुत आये..
पर
आंसूं के बाद....
कुछ ऐसे पल....
भी आये.....
जो ताउम्र....
मन को ; बहुत भाये!

तपती हुई लकड़ियों से  आंच भी बहुत लगी...
और कई बार तो..... जल भी गया.....फिर
जख्मों से उबर भी
गया...और
कुंदन बनने की.... कोशिश में......
चन्दन तो बन ही गया.... और -
अपनों  के जीवन में शीतलता देकर.....
संभल भी गया!

परन्तु....
आखिर में -
अब...
जब की मोटे लेंस के चश्मे ने...
आँखों पर...
अपना कब्ज़ा...
कर  लिया है.....
बालों ने भी...
अपनी रंगत...
बदल कर...
सफ़ेद रंग को...
अपना नया चेहरा..
बना लिया है...
और टूटते हुए...
दाँतों ने -
जीभ और मसूड़ों के  साथ....
नज़दीकियां बढ़ा ली हैं..  ज़िन्दगी में-
खिचड़ी के अलावा... कुछ खाने का... औचित्य रहा भी नहीं!

आप सोचोगे....
किसने सिखाया ये
खिचड़ी बनाने और खाने का हुनर?
सिर्फ एक जवाब -
मेरे -
प्यारे पापा!

"सच मैं कितना भाग्यशाली हूँ-की
मुझे.....
उस "ज़िन्दगी की.... थाली" में.....
खिचड़ी खाने का.... मौका मिला...
जिस थाली में......
मेरा छोटा सा परिवार... "प्यारे पापा" के साथ... बिना चम्मच के....  उँगलियों से खाते थे -खिचड़ी ; एक साथ!"

असल में खिचड़ी कुछ नहीं....
संस्कार हैं!
जीवन के मधुर.... चित्रहार हैं!
माँ-बाप द्वारा....
बच्चों को दिए.....
उपहार हैं!

आओ मित्र!
हम भी छोड़ें...
अपना हुनर...
अपनी खिचड़ी...
अपने बच्चों को...
पिरो कर-
भारतीयता के ज़मीनी संस्कारों में....
की कभी...
वे भी कहें की-"ये बातें उन्होंने अपने दादाजी या पापा से आत्मसात की थी! "
(Gaurav!)

अगर!

अगर...
तेरे नाम में....
जुड़ जाता...
मेरा नाम...
मेरी ख्वाइशों को भी.. 
मिल जाता.
इक मुकाम!

तेरे आँचल को...
ढंकने का...
न लगता इलज़ाम...
अगर...
मेरी शामों में....
खो जाती..
तेरी हर इक शाम!

तेरे माथे की ...
उड़ती सिमटती... घटाओं को...
सहेजने को...
बढ़ जाते...
मेरे हाँथ...
अगर...
मेरी ख्वाइशों को....
मिल जाता...
तेरा इक हाँथ !

तेरे जज्बातों को भी...
मिल जाती...
मेरी जुबां....
अगर ;
मेरी ख्वाइशों को.....
मिल जाता...
इक तेरे जैसा -
हम नुमा !

तेरे गिरते...
अश्कों को भी...
मिल जाता...
इक आंसू पोंछती....
 हथेली का किनारा....
अगर.
मेरी ख्वाइशों को...
मिल जाता...
इक तेरा सहारा!

Monday, April 18, 2016

आंबेडकर और  आरक्षण

आंबेडकर और  आरक्षण!
काश!
मेरे पूर्वज भी होते -
सदियों से सताए हुए -"दबे कुचले शोषित पीड़ित" और "जुल्म ओ सितम" के शिकार !
तो आज मैं भी उस जुलूस का हिस्सा होता जो...
बाबा साहिब की स्मृति में... निकला!

ढूंढता रहा बहुत -की
दिख जाए रैली में कोई "जनरल कैटिगिरी" का इंसान.. लेकिन मुझे दिखे
कुछ झंडे लिए कई पार्टियों के कार्यकर्ता... जो -
बेरोज़गारी और आरक्षण के बजाए.... दबी जुबां से -
उत्तर प्रदेश और बंगाल के चुनावों की
चर्चा कर रहे थे!

गुजरात जल रहा है.. और हरयाणा भी अभी शांत नहीं है...
आओ आने वाले बीस बरस को -
जनरल केटेगरी को हटा देते हैं...
सारी नौकरियों से ;
और "दबे मैले कुचले"  अपने ही भाइयों को मौका देते हैं -
आरक्षण के माध्यम से ताजपोशी का...
लेकिन फिर -
२१ वे बरस में -
आरक्षण खत्म कर देना-बिलकुल से...
कम से कम..
हम न सही...हमारे नाती पंती तो सुकून से बिन आरक्षण...
जी सकेंगे!

Sunday, April 10, 2016

  कुछ रह  तो नहीं गया?

  कुछ रह  तो नहीं गया?

"अरे सब सामान ले लिया क्या? बस में किसी का कुछ रह तो नहीं गया?

"जी सर, सब ले लिया ।" स्कूल ट्रिप से वापिस आये सब बच्चे एक साथ चिल्लाये । और बस से उतरकर घरकी तरफ दौड़ गए ।

"सर, फिर भी बस में देख लेना ।"
हेडमास्टर जी का हुकुम होते ही सर वापिस बस में गए । बस में नजर घुमाते ही पता चला बहुत कुछ रह गया है पीछे । वेफर्स, चॉकलेट के रैपर्स और कोल्ड ड्रिंक पानी की खाली बोतले पड़ी थी । जबतक ये भरे थे, तबतक ये अपने थे । खाली होते ही ये अपने नहीं रहे । जितना हो सके, सर ने कैरी बैग में भर दिया और बस से उतरने लगे ,
"कुछ रह तो नहीं गया ?" हेडमास्टर के फिर से सवाल पूछने पर सर ने हँस के नहीं का इशारा किया ।
पर अब सर का मन "कुछ रह तो नहीं गया?" इस सवाल के इर्द गिर्द घूमने लगा । जिंदगी के हर मोड़पर अलग अलग रूप में यही सवाल परेशान करता है ।
इस सवाल की व्यापकता  इतनी बड़ी होगी ये सर को अभी पता चला ...
बचपन गुजरते गुजरते कुछ खेल खेलना रह तो नहीं  गया?

जवानी में किसी को चाहा पर जताने की हिम्मत नहीं हुई... कुछ रह तो नहीं  गया?

जिंदगी के सफ़र में चलते चलते हर मुकाम पर यही सवाल परेशान करता रहा.... कुछ रह तो नहीं गया?

3 महीने के बच्चे को दाई के पास रखकर जॉब पर जानेवाली माँ को दाई ने पूछा... कुछ रह तो नहीं  गया? पर्स, चाबी सब ले लिया ना?
अब वो कैसे हाँ कहे? पैसे के पीछे भागते भागते... सब कुछ पाने की ख्वाईश में वो जिसके लिये सब कुछ कर रही है ,वह ही रह गया है.....

शादी में दुल्हन को बिदा करते ही
शादी का हॉल खाली करते हुए दुल्हन की बुआ ने पूछा..."भैया, कुछ रह तो नहीं गया ना? चेक करो ठीकसे ।.. बाप चेक करने गया तो दुल्हन के रूम में कुछ फूल सूखे पड़े थे ।  सब कुछ तो पीछे रह गया... 25 साल जो नाम लेकर जिसको आवाज देता था लाड से... वो नाम पीछे रह गया और उस नाम के आगे गर्व से जो नाम लगाता था वो नाम भी पीछे रह गया अब ...

"भैया, देखा? कुछ पीछे तो नहीं रह गया?" बुआ के इस सवाल पर आँखों में आये आंसू छुपाते बाप जुबाँ से तो नहीं बोला....  पर दिल में एक ही आवाज थी... सब कुछ तो यही  रह गया...
बडी तमन्नाओ के साथ बेटे को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा था और वह पढ़कर वही सैटल हो गया , पौत्र जन्म पर बमुश्किल 3  माह का वीजा मिला था और चलते वक्त बेटे ने प्रश्न किया सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया ? क्या जबाब देते कि अब छूटने को बचा ही क्या है ....
60 वर्ष पूर्ण कर सेवानिवृत्ति  की शाम पी ए ने याद दिलाया चेक कर ले सर कुछ रह तो नही गया ; थोडा रूका और सोचा पूरी जिन्दगी तो यही आने- जाने मे बीत गई ; अब और क्या रह गया होगा ।
"कुछ रह तो नहीं गया?" शमशान से लौटते वक्त किसी ने पूछा । नहीं कहते हुए वो आगे बढ़ा... पर नजर फेर ली, एक बार पीछे देखने के लिए....पिता  की चिता की सुलगती आग देखकर मन भर आया । भागते हुए गया ,पिता के चेहरे की झलक तलाशने की असफल कोशिश की और वापिस लौट आया ।।
दोस्त ने पूछा... कुछ रह गया था क्या?
भरी आँखों से बोला...नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...और जो कुछ भी रह गया है वह सदा मेरे साथ रहेगा ।।
एक बार समय निकालकर सौचे , शायद पुराना समय याद आ जाए, आंखें भर आएं और आज को जी भर जीने का मकसद मिल जाए।।